ZEE Entertainment: सोनी के साथ मर्जर रद्द होने की खबर से 30% तक टूटा शेयर, BSE एक्सचेंज ने लिया बड़ा फैसला

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ZEE Entertainment Share Price: जी एंटरटेनमेंट की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. एक तरफ जहां सोनी ने जी के साथ मर्जर को रद्द कर दिया है. वहीं, इस खबर के बाद, कंपनी के शेयर में लोअर सर्किट लग गया है. जी एंटरटेनमेंट के शेयर आज दोपहर 12 बजे के करीब 30 प्रतिशत के आसपास टूट गया है. वहीं, 12.30 बजे कंपनी के शेयर 26.64 प्रतिशत यानी 61.65 रुपये के नुकसान के साथ 169.75 पर कारोबार कर रहा था. इस बीच, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) ने जी एंटरटेनमेंट के शेयरों के डायनेमिक प्राइस बैंड को 10 से 15 प्रतिशत कर दिया है. एक्सचेंज की तरफ से जारी नोटिस में कहा गया है कि अगर और छूट की आवश्यकता होगी तो यह 15 मिनट के अंतराल पर किया जाएगा. Zee Entertainment ने एक्सचेंज को जानकारी दी है कि Sony ने डील रद्द किए जाने के बदले 90 मिलियन डॉलर टर्मिनेशन फीस की मांग की है. कंपनी के शेयर में जनवरी 2019 के बाद से ये सबसे बड़ी गिरावट है. जी ने अपने बयान में कहा है कि उसने सोनी के साथ हुए समझौते की शर्तों खा उल्लंघन नहीं किया है. हालांकि, वो स्थिति से निपटने के लिए हर विकल्प की तलाश कर रहे हैं.

सोनी ने जी के साथ सौदा क्यों रद्द कर दिया?

सोनी ने सौदा रद्द करने का कारण अधूरी शर्तों को बताया है. रिपोर्ट के अनुसार, मर्जर प्रोपर्टी के नेतृत्व को लेकर कंपनियों के बीच गतिरोध के कारण हुई है. इसमें मामले में विशेष रुप से ज़ी के सीईओ पुनीत गोयनका शामिल हैं, जिनकी पूंजी बाजार नियामक सेबी द्वारा जांच चल रही है. दोनों कंपनियों के मर्जर का उद्देश्य नेटफ्लिक्स इंक और Amazon.com इंक जैसे वैश्विक दिग्गजों के साथ प्रतिस्पर्धा करने और सक्षम $ 10 बिलियन का मीडिया पावरहाउस स्थापित करना था.

विलय योजना पर 2021 में हुआ था समझौता

Sony और ZEEL के बीच विलय के लिए समझौता 2021 के दिसंबर में हुआ था. नयी बनने वाली जाइंट मीडिया हाउस में सोनी की अप्रत्यक्ष रूप से सबसे ज्यादा 50.86 प्रतिशत की हिस्सेदारी होगी. जबकि, जी के फाउंडर्स की कंपनी में 3.99 प्रतिशत की हिस्सेदारी होगी. वहीं, जी के शेयरधारकों की 45.15 प्रतिशत की हिस्सेदारी होगी. 2021 में दोनों कंपनियों की विलय प्रक्रिया पूरी होने में 8 से 10 महीने का वक्त लगने की उम्मीद की जा रही थी. हालांकि, कई कारणों से तय वक्त में विलय नहीं हो सका. इसकी वजह यह है कि जी को कर्ज देने वाले कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने इस विलय के खिलाफ याचिका दाखिल कर दी.

कैसे एक कंपनी दूसरे कंपनी से मर्ज होती है

कंपनी एक दूसरी कंपनी का अधिग्रहण (मर्जर और अक्कर्ता) करने के लिए दोनों कंपनियों में पहले वार्ता होती है. अधिग्रहण की योजना बनाने के लिए दोनों कंपनियों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स एक समझौते पर सहमत होते हैं. इसमें अधिग्रहण के विवरण, समयसीमा, सम्पत्ति का मूल्यांकन, स्टॉक मुद्रा आदि का समायोजन होता है. एक बार योजना बनने और समझौते के बाद, नौबत (फॉर्म 23C और फॉर्म 1 नौबत) जारी किया जाता है. इसमें अधिग्रहण की प्रक्रिया और विवरण शामिल होते हैं. नौबत जारी करने के बाद, उसे सर्वोच्च न्यायालय या नौबत स्वीकृति अधिकारी को प्रस्तुत किया जाता है. स्वीकृति प्राप्त करने के बाद, योजना के मुताबिक अधिग्रहण का कार्यान्वयन शुरू किया जाता है. इसमें एक कंपनी दूसरी कंपनी के सम्पत्ति, स्टॉक, और सम्पत्ति का नियंत्रण प्राप्त करती है. अधिग्रहण के बाद, दोनों कंपनियों के विभिन्न प्रक्रिया, उत्पादन, वित्त, और प्रबंधन की प्रणालियों को एकीकृत किया जाता है. विभिन्न विभाजित संरचना को एक समेकित और संगठित संरचना में बदला जाता है.

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