Mahua Moitra : तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा से पहले 2005 में इन 11 सांसदों को किया गया था निष्कासित

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कैश फॉर क्वेरी मामले में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा को संसद से निष्कासित कर दिया गया है. मामले की जांच के बाद संसद की एथिक्स कमेटी ने महुआ मोइत्रा की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की थी, जिसपर लोकसभा में बहस के बाद महुआ मोइत्रा की संसद सदस्यता समाप्त कर दी गई है. महुआ मोइत्रा ने सांसदी जाने के बाद यह कहा है कि उनके खिलाफ बिना सबूतों के कार्रवाई की गई है. एथिक्स कमेटी ने निष्पक्ष जांच नहीं की है. वहीं बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने महुआ के निष्कासन को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है और कहा है कि यह संसदीय इतिहास का काला दिन है. उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है, जिसके खिलाफ महुआ मोइत्रा जनता की अदालत में जाएंगी.

2005 में 11 सांसदों का हुआ था निष्कासन

महुआ मोइत्रा के खिलाफ कार्रवाई पर विपक्ष उनके साथ खड़ा है, लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अब महुआ मोइत्रा के पास विकल्प क्या हैं? इससे पहले यह जानना भी जरूरी है कि क्या इससे पहले एथिक्स कमेटी ने कभी इस तरह की कोई सिफारिश की थी जिसमें किसी सांसद की सांसदी चली गई. गौरतलब है कि साल 2005 में कोबरा पोस्ट के स्टिंग आपरेशन में यह दिखाया गया था कि 11 सांसदों ने संसद में सवाल पूछने के एवज में पैसे लिए थे. इन 11 सांसदों में छह बीजेपी के थे, जबकि तीन बीएसपी के और एक-एक आरजेडी और कांग्रेस के थे. इन सांसदों को निष्कासित करने के लिए उस वक्त सदन के नेता प्रणब मुखर्जी ने प्रस्ताव पेश किया था और इसके बाद 11 सांसदों को निष्कासित कर दिया गया था जिनमें से बीजेपी के छह सांसद थे वाई जी महाजन, छत्रपाल सिंह लोढ़ा, अन्ना साहेब एम के पाटिल, चंद्र प्रताप सिंह, प्रदीप गांधी और सुरेश चंदेल. इसके अलावा जो पांच और सांसद थे उनमें से तीन बीएसपी के थे जिनके नाम हैं-नरेंद्र कुशवाहा, लाल चंद्र कोल और राजा रामपाल. कांग्रेस और आरजेडी के एक-एक नेता थे जिनके नाम हैं रामसेवक सिंह और मनोज कुमार. बीजेपी सांसद छत्रपाल सिंह लोढ़ा राज्यसभा के सांसद थे और उनके निष्कासन के लिए राज्यसभा में प्रस्ताव पेश किया गया था.

ममता ने कहा-जनता की अदालत में जाएंगी महुआ मोइत्रा

महुआ मोइत्रा के निष्कासन के बाद अब क्या होगा? यह बताना अभी थोड़ा कठिन इसलिए भी है क्योंकि यह मामला बहुत गंभीर है और संसद की कार्रवाई के बाद महुआ मोइत्रा कुछ भी कदम उठाने से पहले बहुत विचार करेंगी और विशेषज्ञों की राय के बाद ही कोई कदम उठाएंगी. महुआ मोइत्रा के बारे में ममता बनर्जी ने यह कहा कि वे जनता की अदालत में जाएंगी, इसकी वजह यह है कि अगले साल लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं.

एथिक्स कमेटी का गठन कब हुआ

लोकसभा में एथिक्स कमेटी का गठन 16 मई 2000 में हुआ था जबकि राज्यसभा में एथिक्स कमेटी का गठन 4 मार्च 1997 को हुआ था. एथिक्स कमेटी सांसदों के खिलाफ अनैतिक आचरण की जांच करती है, जिसमें भ्रष्टाचार प्रमुख है. एथिक्स कमेटी की जरूरत तब महसूस हुई जब सांसदों की नैतिकता में गिरावट दर्ज की गई. एथिक्स कमेटी के सदस्यों की संख्या 15 है. एथिक्स कमेटी के सदस्यों को लोकसभा के अध्यक्ष ने नामित किया है.

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