पिता की पगड़ी का मान बढ़ाने के लिए दोनों हाथों से दान-धर्म करता है यह युवा समाजसेवी

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बापे पूत परापत घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा… ये लाइनें चाहें जिस वजह से लिखीं गई हो पर बात बहुत पते की है। दिल्ली का केवल पार्क इलाका। आज भी इस इलाके में आप किसी से मूलचन्द ठेकेदार यानि प्रधान जी के घर का पता पूछ लीजिये… पता बताने की जगह आपको लोग-बाग घर तक ससम्मान पहुंचाकर आएंगे। इलाके में सामाजिक रूप से नेताओं से भी ऊंचा रूतबा रखते थे मूलचन्द ठेकेदार। कभी किसी गरीब को दरवाजे से निराश होकर जाने नहीं देते थे। अपने पिता की पगड़ी का मान उसी तरह बढ़ा रहे हैं उनके सुपुत्र अरविन्द मूलचन्द।

अरविन्द का जन्म 20 जनवरी 1980 को केवल पार्क के अतिविशिष्ठ व्यक्ति मूलचन्द प्रधान के यहां हुआ। मूलचन्द जी आरडब्ल्यूए के प्रधान होने के साथ-साथ बेहद परोपकारी स्वभाव के व्यक्ति थे। गवर्नमेन्ट कांट्रैक्टर का काम था इसलिए कभी संसाधनों की कमी नहीं हुई। अरविन्द उच्च शिक्षा (ग्रेजुएट) प्राप्त बेहद मिलनसार व्यक्ति हैं। हालांकि 10वीं करने के बाद ही अरविन्द ने अपने पिता के साथ कारोबार में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। सबकुछ ठीक चल रहा था कि इसी बीच 1991 में इनकी माताश्री और सितम्बर 2016 में प्रधान जी का स्वर्गवास हो गया। ये अरविन्द के जीवन का सबसे बुरा दौर था। खैर! अरविन्द ने खुद को संभाला और पिताजी के जाने के बाद उनके सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ाया।

2017 में केवल पार्क में निवासियों ने सर्वसम्मति से केवल पार्क वैलफेयर एसोसिएशन के प्रधान पद की जिम्मेवारी से सुशोभित किया। सन् 2017 से अबतक इस पद पर कार्य करते हुए अरविन्द मूलचन्द ने पार्कों के सौन्दर्यीकरण, सीवरेज, सड़कों व नालियों का निर्माण, मंदिरों की देखभाल आदि में काफी काम किया। जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर गलियों-नालियों व सड़कों का काम कराया। बिजली, पानी और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर रेजीडेन्स वैलफेयर एसोसिएशन के प्रधान के तौर पर भी अरविन्द उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।

अपने पिताजी को अपना जीवन आदर्श मानने वाले अरविन्द मूलचन्द वर्तमान में आदर्श नगर कला केन्द्र, केवल पार्क अग्रवाल सभा, हनुमान मंदिर केवल पार्क व जनता भवन केवल पार्क में महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गरीबों की मदद करना, जरूरतमंदों को राशन बांटना, लोगों के राशन कार्ड, पहचान पत्र, आधार कार्ड बनाने से लेकर विधवाओं व बुजुर्गों के पेंशन बनवाने तक के कार्य अरविन्द अपने पिताजी की ही तरह पूरी तन्मयता से करते हैं। पिताजी की याद में इन्होंने केवल पार्क श्मशान घाट में पिछले ही वर्ष रेफ्रीजरेटेड शव वाहन दान किया था व विकलांग बच्चों के बीच ट्राईसाईकिल आदि वितरित की थी।

समाजसेवा को समर्पित रहने वाले अरविन्द कहते हैं कि मुझे पिताजी एक बहुत बड़ा सबक मिला था। एक बार मुझे पिताजी को साथ लेकर लाखों की पेमेन्ट के सिलसिले में कहीं जाना था। घर से निकलते वक्त एक साधारण-सी दिखने वाली महिला किसी काम को लेकर पिताजी से मिलने आयी। पिताजी मुझे छोड़कर उस महिला को साथ लेकर उसका काम कराने निकल गये। उस वक्त तो मुझे बहुत गुस्सा आया पर बाद में मुझे अहसास हुआ कि मैं एक ऐसे व्यक्ति की संतान हूं जो अपनों से अधिक दूसरों के लिए जीता है। और उसके बाद मेरे जीवन का पूरा नजरिया ही बदल गया।