ज्योतिरादित्य सिंधिया की ताकत का अंदाजा नहीं लगा पाई पार्टी, सरकार पर संकट का नहीं था अनुमान

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नई दिल्ली/ सवांददाता। मध्यप्रदेश में 15 महीने पुरानी कांग्रेस सरकार संकट में है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के बागी होने के साथ ही 22 विधायक इस्तीफा दे चुके हैं। बीजेपी का तो दावा है कि यह संख्या 30 तक पहुंच सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस इस स्थिति तक पहुंची कैसे? दरअसल, पार्टी संधिया की ताकत का अंदाजा लगाने में बुरी तरफ विफल रही। सीएम कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को यह उम्मीद नहीं थी कि सिंधिया का खेमा इतना मजबूत है कि सरकार पर खतरा बन सकता है।

सिंधिया का रुख पिछले कई महीनों से बागी हो चला था, लेकिन प्रदेश कांग्रेस को विश्वास था कि वह ग्वालियर और गुना बेल्ट के 5 से अधिक विधायकों का समर्थन हासिल नहीं कर पाएंगे। इसी भरोसे के तहत कमलनाथ और दिग्विजय ने सिंधिया को वह कदम उठाने पर मजबूर किया, जो वह सामान्य परिस्थितियों में नहीं करते।

गणित यह लगाया गया था कि यदि सिंधिया पार्टी छोड़ भी देते हैं तो वह सरकार नहीं गिरा पाएंगे। उनके साथ यदि कुछ विधायक जाएंगे भी तो इसकी भरपाई बीजेपी के ऐसे कुछ विधायकों को तोड़कर पूरी कर ली जाएगी, जो कमलनाथ के संपर्क में हैं। हालांकि, हकीकत पूरी तरह अलग है। सिंधिया के साथ 20 से अधिक विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और वे बीजेपी जॉइन करने जा रहे हैं। इससे अब राज्य इकाई सदमे में है।

कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का भी विश्वास था कि सिंधिया बागी रुख के साथ कुछ समस्याएं पैदा कर सकते हैं, लेकिन पार्टी छोड़कर बीजेपी में नहीं जाएंगे। लेकिन सिंधिया ने ऐसा सोचने वालों को गलत साबित किया और पार्टी को होली के दिन असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।

समस्या की शुरुआत दिसंबर 2018 में प्रदेश में कांग्रेस की जीत के साथ ही हो गई थी। दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ को समर्थन दिया और सिंधिया दरकिनार कर दिए गए। इसके बाद 2019 में लोकसभा चुनाव में भी हार के बाद सिंधिया बेचैन हो उठे। इसके बाद उन्होंने राज्यसभा सीट और प्रदेश कांग्रेस पर अपना दावा किया। हालांकि, इस बार भी उन्हें नाथ-सिंह की जोड़ी ने निराश किया। पिछले सप्ताह पार्टी के कुछ विधायक गायब हुए तो इसे राज्यसभा सीट के लिए दावे के रूप में देखा गया। माना जाता है कि प्रियंका गांधी को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव भी सिंधिया का पत्ता साफ करने के लिए ही दिया गया।

राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद प्रदेश कांग्रेस को खुलकर खेलने का मौका मिला। नेतृत्व के अभाव में उन्हें AICC की अधिक चिंता नहीं रही। पार्टी से पूरी तरह दरकिनार किए जाने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने को मजबूर हो चुके थे।