स्टार्टअप कंपनियों ने रोजगार के बेशुमार मौके दिया हैं

पांच साल में शुरू हुईं स्टार्टअप कंपनियों में से 90 फीसद या तो बंद हो गई हैं या बंदी की कगार पर

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नई दिल्ली। जिस देश में किसी दौर में सरकारी नौकरियों को ही सबसे ज्यादा सुरक्षित माना जाता था, उस देश में बीते 5-6 वर्षो में स्टार्टअप कंपनियों ने रोजगार के बेशुमार मौके देकर और कामयाबी की नई इबारतें लिखकर देश के विकास और बाजार, दोनों का रुख बदलकर रख दिया। इनकी सफलताओं की इतनी कहानियां देश ने सुनी हैं कि हाल तक ज्यादातर युवा जोखिम लेते हुए अपना कोई स्टार्टअप शुरू करना रुतबे की बात मान रहे थे, लेकिन वर्ष 2014 से शुरू हुए इस ट्रेंड को मानो इधर ग्रहण लगने लगा है। बीते पांच साल में शुरू हुईं स्टार्टअप कंपनियों में से 90 फीसद या तो बंद हो गई हैं या बंदी की कगार पर हैं। हालत यह है कि बड़े पूंजीपति भी अब स्टार्टअप के नाम से कतराने लगे हैं और चेतावनी देने लगे हैं कि स्टार्टअप के नाम पर हर दूसरे कारोबार को जिंदा रखने के लिए पैसे जलाने का सिलसिला अंतहीन समय तक कायम नहीं रखा जा सकता है।

असल में इधर स्टार्टअप को लेकर चौकन्ना करने वाली कुछ खबरें नैसकॉम, जिनोव और टीमलीज के हालिया अध्ययनों से निकली हैं। इनके अध्ययन बताते हैं कि आइटी पेशेवरों का अब स्टार्टअप कंपनियों से मोहभंग होने लगा है और वे स्टार्टअप को छोड़कर बड़ी आइटी कंपनियों की नौकरी की तरफ वापस जा रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष 2014-2019 के बीच देश में 8900-9300 स्टार्टअप कंपनियां बनीं, जिनमें आकर्षक वेतन और हिस्सेदारी मिलने की वजह से युवा पेशेवर इनसे जुड़ने को प्रेरित हुए थे, लेकिन आर्थिक सुस्ती के चलते इन स्टार्टअप कंपनियों को मिलने वाले कामकाज में गिरावट आई है, जिससे ऐसी कंपनियों के बंद होने का खतरा भी पैदा हो गया है।

हालिया चेतावनी की बात करें तो इसे लेकर एक तीखा बयान मशहूर उद्योगपति रतन टाटा ने दिया है। उन्होंने कहा है कि निवेशकों के पैसों को उड़ाने वाले स्टार्टअप को दूसरा या तीसरा मौका नहीं मिलेगा। उनका यह बयान पहले से उलट है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नई कंपनियां पुरानी कंपनियों की जगह लेंगी और नए लोग भारतीय उद्योग जगत के भविष्य को तय करेंगे। असल में स्टार्टअप को लेकर नजरिये में आ रहे बदलाव के कुछ खास कारण हैं। इनकी एक अहम वजह यह है कि स्टार्टअप कंपनियां जो उत्पाद बना रही थीं, उन उत्पादों की मांग में तेजी से तब्दीली आ रही है।

स्टार्टअप छोड़ने वाले आइटी इंजीनियरों का तर्क है कि कई स्टार्टअप कंपनियां अपने उत्पादों को बाजार में उतारने में देरी करती हैं। उनके पास कोई पक्की योजना नहीं होती, जिससे उनके भविष्य के बारे में कोई मुकम्मल राय बनाई जा सके। चूंकि स्टार्टअप तेज तरक्की नहीं कर रहे हैं, इसलिए कर्मचारियों से लेकर निवेशकों तक में उन्हें लेकर मोहभंग की स्थितियां बनने लगी हैं। मुनाफा कमाने और ग्रोथ के मामले में चूंकि स्टार्टअप बड़ी कंपनियों का मुकाबला नहीं कर पाते हैं, ऐसे में उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है। इसलिए स्टार्टअप के धराशायी होने के मामले भी बढ़ गए हैं।

स्टार्टअप की नाकामियों के बारे में इन्फोसिस के पूर्व निदेशक टीवी मोहनदास पई कई साल पहले चेता चुके थे। उन्होंने दावा किया था कि नई पीढ़ी की केवल 10 फीसद कंपनियां (स्टार्टअप) आगे चलकर बेहतरीन ढंग से सफल होंगी, जबकि ज्यादातर स्टार्टअप कंपनियां विफल हो जाएंगी। स्टार्टअप कंपनियों के ढहने के कारणों की तह में जाने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर बड़ी कंपनियां तमाम खर्चो और घाटे के बावजूद लंबे समय तक अच्छे दौर के इंतजार में कैसे टिकी रहती हैं। बिहार सरकार का बड़ा आदेश- राज्‍य में रोकी एक लाख शिक्षकों की बहाली प्रक्रिया

असल में परंपरागत कारोबारियों ने बिजनेस के बुरे दौर को झेलने के लिए कई व्यवस्थाएं बना रखी हैं। उनका निवेश कई स्तरों पर होता है और वे कई उद्यमों से पैसा कमाते हुए घाटे में चल रही इकाइयों में तब तक पैसा लगाते हैं, जब तक कि वे अपने बल पर खड़ी न हो जाएं। इनके मुकाबले में नए कारोबारी अक्सर इस दौर में लड़खड़ाने लगते हैं।

स्टार्टअप्स चाहते हैं कि उनके लिए पैसे जुटाने के नियम आसान हों, लेकिन खुद वे खर्च पर नियंत्रण रखने वाली व्यवस्था नहीं बनाते हैं। वे बड़ी कंपनियों की तरह बेशुमार मौके चाहते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि सतत घाटे की स्थिति में उनमें निवेश के रास्ते बंद हो सकते हैं।

वैसे यह सही है कि स्टार्टअप के मामले में अमेरिका और ब्रिटेन के बाद भारत का तीसरा स्थान है। कॉलेजों से निकले छात्र भी इस तरफ बड़ी संख्या में आ रहे हैं। दावा है कि पिछले वर्ष 350 नए उद्यम युवा विद्यार्थियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि स्टार्टअप कंपनियों की वजह से भारत में शिक्षा और रोजी-रोजगार को लेकर सोच बदली है।

पहले व्यवसाय करने को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था, लेकिन सरकारी नौकरियों के कम होने और निजीकरण के बढ़ने के साथ माहौल बदला है। मध्यवर्ग समृद्ध हुआ है और इसके युवाओं में नौकरी के बजाय अपना कारोबार शुरू करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, लेकिन मुश्किल है कि इस नई पीढ़ी के पास कारोबार करने का ज्यादा अनुभव नहीं है। उन्हें यह मंत्र सीखने की जरूरत है कि खर्च पर अंकुश रखकर और नवाचार के बल पर ही वे कोई सफलता हासिल कर सकते हैं, अन्यथा नहीं। हमारे जो स्टार्टअप यह समझदारी दिखाएंगे, उन्हें कामयाब होने से कोई नहीं रोक पाएगा।