तो इसलिए जरूरी नहीं करोड़ों रुपये की लागत वाली Central Vista Project…

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कोरोना संकट के समय देश में जारी लॉकडाउन की वजह से भारत आर्थिक चुनौती के सबसे कठिन समय से गुजर रहा है। ऐसे में तमाम आर्थिक विशेषज्ञ भारत के आर्थिक भविष्य के हालातों पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। सरकार कई माध्यमों से देश के आर्थिक हालात को संभालने में सक्षम है। सरकार चाहे तो तमाम गैर-जरूरी खर्चो को तत्काल रोक कर उस राशि का उपयोग इस आपदा के लिए कर सकती है।

केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते में वृद्धि को रोक दिया। इससे लाखों सैनिकों, कर्मचारियों और पेंशनरों के वेतन एवं पेंशन से सालाना करोड़ों रुपये की कटौती होगी, जबकि सरकार ने लगभग 25,000 करोड़ रुपये की लागत वाली सेंट्रल विस्टा परियोजना निलंबित नहीं की, न ही उसने 1,10,000 करोड़ रुपये की लागत वाली बुलेट ट्रेन परियोजना बंद की। सरकार ने फिजूल के खर्चो में कटौती की घोषणा भी नहीं की जिससे ढाई लाख करोड़ रुपये सालाना बच सकते हैं।


सरकार ने कई ऐसे कार्यो को जारी रखा है जो गैर-जरूरी हैं। इनमें सबसे प्रमुख है संसद भवन के निर्माण और सौंदर्यीकरण के लिए 25,000 करोड़ की राशि का व्यय। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट साउथ ब्लॉक और नार्थ ब्लॉक को बंद कर सैकड़ों नए कार्यालयों के निर्माण का प्रोजेक्ट है। इसमें प्रधानमंत्री के लिए नया घर बनाना भी शामिल है। संसद भवन, केंद्रीय सचिवालय और इसके आसपास राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक फैले हरित क्षेत्र में मौजूद सेंट्रल विस्टा के पुनर्विकास की योजना को आकार दिया जाना है। इसके तहत राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट के बीच लगभग तीन किमी क्षेत्र में 100 एकड़ से अधिक जमीन पर संसद भवन, केंद्रीय सचिवालय आदि के पुनर्विकास की योजना है।

कोरोना जैसी विश्वव्यापी महामारी के समय इन पर खर्च होने वाली रकम का इस्तेमाल देश में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए किया जा सकता था। देश संसाधन के मामले में गंभीर संकट का सामना कर रहा है और विश्व बैंक एवं एशियाई विकास बैंक से कर्ज ले रहा है। अभी देश में अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा की स्थिति में सुधार की जरूरत है। भवनों के निर्माण पर होने वाले खर्चो को थोड़े समय के लिए रोका जा सकता था जब तक हम इस आपदा से निपट न लें। सरकार बहुत जल्दबाजी में इस प्रोजेक्ट को बढ़ा रही है।

इस परियोजना पर जनता के बीच व्यापक विमर्श, यहां तक कि वास्तुकला और शहरी नियोजन के विशेषज्ञों से भी परामर्श नहीं लिया गया है। पिछले कुछ दिनों में सेंट्रल विस्टा परियोजना को पर्यावरण मंत्रलय के एक्सपर्ट कमेटी और सेंट्रल विस्टा कमेटी से स्वीकृति भी दिला दी गई है। इस परियोजना से जुड़ी विशेषज्ञ समिति की बैठक लॉकडाउन के बीच 23 अप्रैल को बुलाई गई जिसमें कई वरिष्ठ लोग नहीं आए, मगर परियोजना की महत्ता बताकर बैठक बुलाई गई।

देश में व्याप्त संकट से निपटने में खर्च करने के बजाय सेंट्रल विस्टा सरकार की प्राथमिकता में क्यों है? राजपथ पर प्रधानमंत्री का नया भवन इस आपदा से उबरने के बाद भी बन सकता है। प्रधानमंत्री के दूसरे आवास के लिए खर्च करने से पहले इस महामारी से निपटना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इस राशि के उपयोग का पहला अधिकार बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा का है जिस कारण देश में इस महामारी से लड़ने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। हमारे कोरोना योद्धाओं की सुरक्षा और जरूरी चिकित्सकीय उपकरण पर इस राशि को खर्च करना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

अनेक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस संकट ने लाखों गरीब भारतीयों को और गरीब बना दिया है, उन्हें तुरंत केंद्र सरकार से वित्तीय मदद की जरूरत है। क्या सेंट्रल विस्टा योजना के लिए आवंटित धन को उनकी हालत सुधारने के लिए नहीं दिया जा सकता? इस आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकट का बोझ राज्य उठा रहे हैं। उन्हें तत्काल धन की जरूरत है, कम से कम वह धन तो उन्हें दिया जाना चाहिए जो उनके हिस्से का है। जीएसटी राजस्व के हिस्से के रूप में राज्यों का 30,000 करोड़ रुपये केंद्र सरकार के पास बकाया है। अब तक इसका भुगतान नहीं किया गया है।

देश की अर्थव्यवस्था को सामान्य स्तर पर आने में कम से कम एक वर्ष का समय लग सकता है। सामाजिक व्यवस्था बहाली में तो और भी लंबा वक्त लग सकता है। ऐसे में सरकार की ऊर्जा को इस आर्थिक और सामाजिक पुनर्निर्माण में लगाया जाना चाहिए। महामारी के बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधनों में बार-बार नागरिकों से त्याग करने की अपील की है। अब प्रधानमंत्री को सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट सहित कई गैर-जरूरी व्यय को तत्काल रोक कर उस रकम का उपयोग देश को इस तात्कालिक संकट से बचाने में करना चाहिए। सरकार ने अब तक करोड़ों रुपये की लागत वाली सेंट्रल विस्टा परियोजना पर रोक नहीं लगाई है। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में देश की निधि का उपयोग ऐसे गैर-जरूरी कार्य में लगाया जा रहा है जिसकी अनिवार्यता वर्तमान में नहीं है