समाज में सौहार्द्र और एकता की कहानी कहती है शॉर्ट फिल्म ‘रंग’, लोगों को पसंद आ रहा मानवेंद्र का किरदार

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मनीष कुमार, पटना. सिनेमा, टेलीविजन और रंगकर्म में सक्रिय रहने वाले गोपालगंज (बिहार) के मानवेंद्र त्रिपाठी इन दिनों अपनी शॉर्ट फिल्म ‘रंग’ को लेकर काफी चर्चा में हैं. इस फिल्म के निर्देशक सुनील पाल और स्क्रिप्ट राइटर जितेन्द्र नाथ जीतू हैं. जबकि अभिनेता और रंगकर्मी मानवेंद्र त्रिपाठी इस फिल्म में अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं. प्रभात खबर के साथ विशेष बातचीत में मानवेंद्र त्रिपाठी ने ‘रंग’ के बारे में बताया कि यह एक पिता व बेटे के इमोशन के ताने-बाने के साथ बुनी एक शानदार कहानी है, जो 1989 में हुए दंगा के दौर की है.

(बता दें कि 24 अक्तूबर 1989 में हुआ यह दंगा उस समय स्वतंत्र भारत में हिंदू-मुस्लिम हिंसा का सबसे खराब उदाहरण था. भागलपुर शहर और उसके आसपास के 250 गांव प्रभावित हुए थे )

इस फिल्म में दिखता है नब्बे के दशक का परिवेश

उन्होंने बताया कि निर्देशक सुनील पाल और लेखक जितेन्द्र नाथ जीतू ने इस फिल्म में नब्बे के दशक का परिवेश रखा है. फिल्म की कहानी कुछ ऐसी है- एक दिन एक ब्लॉक में हिंदू-मुस्लिम के बीच दंगा हो जाता है. घटना के बाद प्रशासन द्वारा कर्फ्यू लगा दी जाती है. हालांकि कुछ दिनों तक कर्फ्यू रहता है, पर कुछ दिनों के बाद बीच-बीच में थोड़े समय के लिए छूट भी दी जाती है.

कर्फ्यू के बीच स्कूल जाने की जिद करता है बच्चा

दंगा और कर्फ्यू के बीच मुस्लिम गांव के एक बच्चे की जिद स्कूल जाने की होती है, पर उसका पिता अशरफ डरा और सहमा रहता है. वह सोचता है कि ऐसे माहौल में वे आखिर कैसे अपने बच्चे को स्कूल लेकर जाये? फिर भी बेटे की जिद और उससे किये गये वादे को पूरा करने के लिए अगले दिन बेटे को लेकर स्कूल के लिए निकल पड़ता है. रास्ते में हिंदुओं और मुस्लिमों का गांव आता है, तो वो आत्मरक्षा के लिए दो रंगों केसरिया और हरे रंग का इस्तेमाल करता है. पर जब स्कूल पहुंचता है, तो बाप अशरफ को याद आती है कि बच्चे को लेकर जिस मकसद से स्कूल पहुंचा हूं, वो पूरा ही नहीं हो रहा. दरअसल 26 जनवरी को (गणतंत्र दिवस) झंडा लेकर बच्चे को स्कूल पहुंचना होता है. फिर पिता उसी केसरिया और हरे रंग का इस्तेमाल कर बेटो को झंडा बनाकर देता है.

15 मिनट की है शॉर्ट फिल्म, पा चुकी हैं कई प्रसिद्धी

अभिनेता ने बताया कि 15 मिनट की यह फिल्म आज भगवा और हरे के बीच बंट चुके सामाजिक माहौल में उन्हीं दो रंगों को एक साथ लाकर तिरंगे में ढाल देने की बात करती है. ऐसी कहानियां आज के नफरत भरे माहौल की सबसे बड़ी जरूरत है, जिसके जरिए समाज में सौहार्द और एकता का अलख जगा कर दुनिया को और खूबसूरत बनाया जा सके. हिंदू मुस्लिम दंगे के बीच एक बेटे और उसके पिता की घर से बाहर निकलने की जद्दोजहद कहानी का मूल केंद्र है. निर्देशक सुनील पाल ने कहानी की मूल भावना को जिस खूबसूरती के साथ दृश्यों में पिरोया है, वह वाकई काबिले तारीफ है.

रंगमंच के जमाने में मिली थी रंग की पृष्टभूमि

फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर जितेन्द्र नाथ जीतू ने प्रभात खबर से बात करते हुए कहा कि मैं राईटर हूं इस शार्ट फिल्म का. जब मैं और मानवेंद्र पटना में रंगमंच कर रहे थे, तो आये दिन पटना बंद या बिहार बंद होता रहता था. हमें थियेटर परिसर में रिहर्सल के लिए जाने में दिक्कत होती थी. यूं कहें कि उस दिन हम कहीं निकलते नहीं थे या फिर निकले थे तो आसपास ही निकल पाते थे. मुझे आईडिया वहीं से आया कि जो पार्टी बिहार बंद करे, उसी का झंडा लगा के साईकिल पर निकलों. सब समझेंगे कि ये अपनी पार्टी का है. बस इन दिनों आलम यह है कि रंगों पर भी पार्टी का कब्जा हो गया है. आप कोई कलर के कपड़े पहने तो लोग कहेंगे कि का जी फलाने पार्टी के सपोर्टर हो . जब कि सब एक है. निर्देशक सुनील पाल ने कहा कि हमारा देश विविधता ओ वाला देश है. कई रंगों वाला देश हैं. हमने यह दिखाया है कि आपस में न बंटे सब मिल के रहे देश सर्वोपरि है.

अनुरेखा ने निभाया है मां का किरदार

बता दें कि यह फिल्म अबतक जागरण फिल्म फेस्टिवल, मुंबई अयोध्या फिल्म फेस्टिवल, अयोध्या, दादा साहब फाल्के फिल्म फेस्टिवल के अलावा कई अन्य फिल्म फेस्टिवल में दिखायी जा चुकी है. फिल्म में पिता की भूमिका में अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी ने किरदार की आत्मा को बड़ी खूबसूरती से पर्दे पर उकेर दिया है. भावनात्मक दृश्यों में चेहरे का भाव संप्रेषण मानवेंद्र के संजीदा अभिनय का प्रमाण देता है. बेटे की भूमिका में बाल कलाकार कामरान ने भी उनका भरपूर सहयोग किया है. मां का किरदार अनुरेखा ने निभाया है.

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