ऋषि कपूर का बचपन से लेकर Teenage की दहलीज पारकर रोमांटिक हीरो बनने तक का सफर.

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नई दिल्ली,  कहते हैं कि पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं, लेकिन ऋषि कपूर के पांव तो खाट पर दिखे थे जब उन्होंने बचपन में ही अपने दादा पृथ्वीराज कपूर निर्देशित नाटक ‘पठान’ में अभिनय किया था। जिसने फिल्मों के सेट पर शूटिंग के दौरान चलना सीखा हो, जिसके लिए सेट पर लगाए गए सामान खिलौने की तरह हों, जो अपने बचपन में फिल्मों के सेट को ही वास्तविक दुनिया समझता हो उसके लिए फिल्मों में काम करना सहज और स्वाभाविक है। ऋषि कपूर का बचपन भी फिल्म ‘श्री 420’ और ‘मुगल ए आजम’ के सेट पर अपने भाई बहनों के साथ खेलते हुए बीता था। ‘मुगल ए आजम’ के सेट पर वो तलवार से खेलते थे। उन्होंने कहा भी था कि ‘सेट पर तलवारबाजी करना मळ्झे बचपन में बहुत पसंद था’।

स्कूल से भागकर एक्टिंग: फिल्मों और फिल्मकारों के बीच गुजर रहे बचपन से जब ऋषि किशोरावस्था में पहुंचे तो उनके पिता खुद उनको स्कूल से भगाकर फिल्म में काम करने ले जाने लगे। ये भी एक दिलचस्प तथ्य है कि राज कपूर साहब अपने बेटे को स्कूल से भगाकर फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में काम करवाने ले जाते थे। जाहिर सी बात है जो अभिनय उनकी रगों में दौड़ रहा था वो इस तरह का वातावरण और सहयोग पाकर निखरने लगा था। तब किसे पता था कि एक ऐसा नायक गढ़ा जा रहा है जो हिंदी सिनेमा के इतिहास में पैंतालीस साल से अधिक समय तक दर्शकों के दिलों पर राज करेगा। अगर हम इसको थोड़ी सूक्ष्मता के साथ देखें तो पाते हैं कि 1973 में ‘बॉबी’ के रिलीज होने से लेकर 1998 की फिल्म ‘कारोबार’ तक यानी पच्चीस साल तक ऋषि कपूर एक रोमांटिक हीरो के तौर पर दर्शकों के दिलों पर राज करते रहे। उसके बाद उन्होंने अपने लिए अलग तरह की भूमिकाएं चुनीं।

मासूम छवि का मोहपाश : साल 1973 को हिंदी फिल्मों के इतिहास में इस वजह से याद किया जाएगा कि उसने एक साथ हिंदी फिल्मों को एंग्री यंगमैन भी दिया और एक ऐसा हीरो भी दिया जिसकी मासूम रोमांटिक छवि के मोहपाश में दर्शक पचीस साल तक बंधे रहे। 1973 में जब ‘बॉबी’ फिल्म रिलीज हुई थी तो ऋषि कपूर एक रोमांटिक हीरो के तौर पर स्थापित हो गए थे, इस फिल्म में उनका किरदार युवाओं में मस्ती और मोहब्बत की दीवानगी का प्रतीक बन गया था। इस फिल्म में ऋषि कपूर और डिंपल के चरित्र को इस तरह से गढ़ा गया था कि वो उस दौर में युवाओं की बेचैनी और कुछ कर गुजरने की तमन्ना को प्रतिबिंबित कर सके। किशोरावस्था से जवानी की दहलीज पर कदम रख रहे युवा प्रेमी जोड़े के कास्ट्यूम को भी इस तरह से डिजायन किया गया था ताकि ऋषि और डिंपल युवा मन आकांक्षाओं को चित्रित कर सकें।

जिस तरह से डिंपल के बालों में स्कार्फ और उसके ब्लाउज को कमर के ऊपर बांधकर ड्रेस बनाया गया था या फिर ऋषि कपूर को बड़े बड़े चश्मे पहनाए गए थे उसमें एक स्टाइल स्टेटमेंट था। इस फिल्म के बाद पोल्का डॉट्स के कपड़े खूब लोकप्रिय हुए थे। फिल्म में इन दोनों के चरित्र को किशोर प्यार और उस प्यार को पाने के लिए विद्रोही स्वभाव का प्रतिनिधि बनाया गया था। ऋषि कपूर और डिंपल की ये जोड़ी इस सुपर हिट फिल्म के बाद जुदा हो गई क्योंकि फिल्म के हिट होते ही डिंपल और राजेश खन्ना ने शादी कर ली थी। दोनों फिर करीब बारह साल बाद एक साथ फिल्म ‘सागर’ में आए। बारह साल बाद भी इस जोड़ी ने सिल्वर स्क्रीन पर प्रेम का वही उत्साह पैदा किया और दर्शकों ने दिल खोलकर फिल्म को पसंद किया।

जब आए निराशा के पल: ऋषि कपूर अपनी फिल्म ‘बॉबी’ की सफलता के बाद सातवें आसमान पर थे। 1974 में उनकी और नीतू सिंह की फिल्म आई ‘जहरीला इंसान’ जो फ्लॉप हो गई, लेकिन इस जोड़ी के काम को सराहना मिली। उसके बाद इन दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया। पर ‘बॉबी’ जैसी सफलता नहीं मिल पाई। ‘कर्ज’ को जब अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो वो गहरे अवसाद में चले गए। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ में माना है कि ‘उनको कभी भी संघर्ष करने की जरूरत नहीं पड़ी। बहुत कम उम्र में ही ‘बॉबी’ फिल्म मिल गई और वो बेहद सफल रही। जब असफलताओं से उनका सामना हुआ तो वो लगभग टूट से गए। वो अपनी असफलता के लिए नीतू सिंह को जिम्मेदार मानने लगे थे इस वजह से पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव आ गया था। यह उस वक्त हो रहा था जब नीतू सिंह गर्भवती थी।

गीता सार ने उबारा अवसाद से: ऋषि के तनाव को दूर करने का बीड़ा राज कपूर ने उठाया और ऋषि को बैठाकर गीता का उपदेश देना शुरू किया। राज कपूर के प्रयासों से ऋषि इस अवसाद से उबर पाए। अवसाद से उबरने के बाद ऋषि कपूर ने ‘नसीब’ और ‘प्रेम रोग’ जैसी फिल्में की जो बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट रहीं। इसके पहले जब वो अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के साथ फिल्म ‘अमर अकबर एंथोनी’ में काम कर रहे थे तो उनके सामने चुनौती थी कि दो बड़े अभिनेताओं के सामने अपनी उपस्थिति को बचा भी पाएंगें या नहीं, लेकिन अकबर के रूप में जिस तरह से उन्होंने एक टपोरी चरित्र को निभाया उसने अमिताभ और विनोद खन्ना के समानांतर खुद को खड़ा कर लिया।

बसूरत परिभाषा: फिर आया 1989 का साल जब ऋषि कपूर और यश चोपड़ा दोनों ने एक बेहद शानदार और सुपरहिट फिल्म से धमाकेदार मौजूदगी दर्ज कराई। धमाकेदार इसलिए कि सालभर पहले ही यश चोपड़ा की फिल्म ‘विजय’ में ऋषि ने काम किया था जो फ्लॉप हो गई थी। ‘चांदनी’ का रोल भी पहले अनिल कपूर को ऑफर हुआ था, लेकिन बाद में ऋषि को मिला। ऋषि भी इस रोल को लेकर हिचक रहे थे, लेकिन यश चोपड़ा के आश्वासन के बाद मान गए थे। इस फिल्म से ऋषि कपूर की लवर बॉय की इमेज पुख्ता हुई। आज भी दर्शकों को वो दृश्य याद है जब ऋषि कपूर हेलीकॉप्टर से अपनी प्रेमिका श्रीदेवी पर गुलाब की पंखुड़ियां उड़ाते हैं। लोगों को प्रेम का पाठ पढ़ाने वाला, अपने प्रेम को हासिल करने के लिए विद्रोह करने वाला नायक अब नहीं रहा। उसके जाने से हिंदी फिल्मों का ये सृजनात्मक कोना सूना हो गया।