क्या विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव से गिर जाएगी NDA की सरकार? 5 प्वाइंट में समझें पूरा समीकरण

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No Confidence Motion In Lok Sabha : लोकसभा में कांग्रेस ने वर्तमान सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया. सदन के पहले दिन से विपक्ष की ओर से यह मांग की जा रही है मणिपुर मामले पर पीएम मोदी के द्वारा सदन में बयान दिया जाए. इसी मामले को लेकर विपक्षी दलों का हंगामा जारी है. अब लोकसभा में कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस भी दिया है, इस नोटिस पर लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने अपनी अनुमति दे दी है. लेकिन, क्या इस प्रस्ताव से वर्तमान सरकार को नुकसान होगा? अगर हां तो कैसे और अगर नहीं तो विपक्ष ने यह दांव क्यों खेला? पांच प्वाइंट में समझें पूरा मामला…

1. कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता

आपको बता दें कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को वर्तमान केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. साथ ही लोकसभा अध्यक्ष ने यह भी कहा है कि सभी दलों से बातचीत करने के बाद बहस की तिथि और समय तय किया जाएगा. आपको बता दें कि अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए सदन के कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है. इस प्रस्ताव पर सदन में 50 से अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त था.

2. अविश्वास प्रस्ताव से सरकार को नुकसान की गुंजाइश नहीं

बता दें कि विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A. के नेताओं के द्वारा बीते दिन मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मणिपुर हिंसा पर संसद में बोलने के लिए प्रस्ताव लाने का फैसला किया था. हालांकि, एनडीए के पास लोकसभा में अभी भी बहुमत हासिल है. ऐसे में यह उम्मीद जतायी जा रही है कि इस अविश्वास प्रस्ताव से सरकार को कोई भी नुकसान नहीं होने जा रहा है. फिर आखिर विपक्ष ने यह प्रस्ताव क्यों पेश किया?

3. लोकसभा में एनडीए की कुल ताकत 332 सांसद

सीटों की अगर बात करें तो 2019 में बीजेपी ने अकेले 303 सीटें जीतकर 37.3 वोट शेयर हासिल किया था. हालांकि, अभी की स्थिति की अगर बात करें तो एकनाथ शिंदे की शिवसेना के 13 सांसद, अपना दल (सोनेलाल) के 2 और लोजपा के 6 लोकसभा सांसद हैं. एनसीपी के अजित पवार की एंट्री के बाद एनडीए की कुल संख्या 332 तक पहुंच चुकी है. ऐसे में यह तो साफ है कि इस प्रस्ताव से सरकार को कोई नुकसान नहीं होने वाला है.

4. विपक्ष ने क्यों लाया यह प्रस्ताव ?

कई राजनीतिक सलाहकारों और पूर्व में लाए गए प्रस्तावों के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि अविश्वास प्रस्ताव का इस्तेमाल अक्सर विपक्ष द्वारा विशेष मुद्दों पर सदन में चर्चा के लिए मजबूर करने के लिए एक टूल के तौर पर किया जाता है. साथ ही चूंकि, साल 2024 में लोकसभा के चुनाव होने वाले है ऐसे में यह विपक्ष की ओर से एक चुनावी माहौल बनाने की भी कोशिश कही जा सकती है.

5. 2018 में एनडीए ने जीता था अविश्वास प्रस्ताव

जानकारी हो कि लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव 20 जुलाई, 2018 को पेश किया गया था. हालांकि, उस समय राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 325 सांसदों के साथ भारी बहुमत से जीत हासिल की और अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में केवल 126 वोट पड़े. लेकिन बहस ने विपक्ष को कृषि संकट, धीमी आर्थिक वृद्धि और मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं सहित कई मुद्दों पर सरकार पर हमला करने का मौका दिया.

केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है अविश्वास प्रस्ताव, जानें कारण

अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है. इसे राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता. लोकसभा का कोई भी सदस्य अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है. लेकिन प्रस्ताव को सदन के कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन होना चाहिए. अविश्वास प्रस्ताव को पेश करने वाले सदस्य द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए और लोकसभा अध्यक्ष को प्रस्तुत किया जाना चाहिए. इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष निर्णय लेता है कि प्रस्ताव को चर्चा के लिए स्वीकार किया जाए या नहीं. यदि स्वीकार किया जाता है, तो अध्यक्ष अक्सर सभी दलों के परामर्श से चर्चा के लिए तारीख और समय तय करता है.

विगत नौ वर्षों में यह दूसरा अवसर होगा जब मोदी सरकार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करेगी. इससे पहले, जुलाई, 2018 में मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाया था. इस अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में सिर्फ 126 वोट पड़े थे, जबकि इसके खिलाफ 325 सांसदों ने मत दिया था. इस बार भी अविश्वास प्रस्ताव का भविष्य पहले से तय है क्योंकि संख्याबल स्पष्ट रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पक्ष में है. लोकसभा की 543 सीटों में से पांच अभी रिक्त हैं. इनमें से 330 से अधिक सांसद भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के अन्य घटक दलों के हैं. कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के उसके साथी दलों के सदस्यों की संख्या 140 से अधिक है. करीब 60 सांसदों का संबंध उन दलों से है जो दोनों गठबंधनों का हिस्सा नहीं है.

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