लाल बहादुर शास्त्री जी और सिनेमा

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किस्सा प्रसिद्ध है कि लेखक, निर्माता, निर्देशक व अभिनेता मनोज कुमार को बुला कर अपने नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर फिल्म बनाने की प्रेरणा खुद शास्त्री जी ने दी थी. उनका मानना था कि सिर्फ नारे लगाने से कुछ नहीं होगा और जिस तरह से आम लोगों में सिनेमा की लोकप्रियता व स्वीकार्यता है, वैसे में यदि कोई फिल्म इस बारे में बात करेगी तो लोग उसे गहराई से समझ पाएंगे.

आज है दो अक्तूबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान, आज के दिन दो फूल खिले हैं, जिनसे महका हिंदुस्तान…’’ साल 1967 के अंत में निर्देशक केवल पी कश्यप की जीतेंद्र, नंदा अभिनीत फिल्म ‘परिवार’ के इस गाने में गीतकार गुलशन बावरा महात्मा गांधी के साथ लाल बहादुर शास्त्री को भी याद करते हैं. इस गीत में दो अक्तूबर को जन्मे इन दो महानायकों का जिक्र ‘एक का नारा अमन, एक का जय जवान-जय किसान’ के तौर पर होता है. फिल्म की नायिका दो अक्तूबर को जन्मे अपने बेटे का जन्मदिन मनाते हुए इस गीत को गा रही है, जिसमें कहा जाता है-‘लाल बहादुर जिसने हमको गर्व से जीना सिखलाया, सच पूछो तो गीता का अध्याय उसी ने दोहराया…’ . यह हैरानी की बात है कि गांधी जी पर जहां ढेरों फिल्में बनीं, उनकी शिक्षाओं की बात हुई, वहीं शास्त्री जी का जिक्र हमारे सिनेमा में इक्का-दुक्का बार ही हुआ.

दो अक्तूबर, 1904 को एक गरीब परिवार में जन्मे और मात्र डेढ़ वर्ष की आयु में अपने पिता को खो देने वाले लाल बहादुर अपने छोटे-से कद के भीतर कितना बड़ा बुत रखते थे, इसकी मिसाल उन्होंने देश का प्रधानमंत्री बन कर दी. प्रधानमंत्री के रूप में मात्र डेढ़ साल के अपने कार्यकाल में उन्होंने एक लंबी और अमिट लकीर खींची. 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जब देश खाद्यान्न की कमी से भी जूझ रहा था, तो उन्होंने सेना और किसानों को प्रेरित करने के लिए ‘जय जवान-जय किसान’ जैसा अमर नारा दिया. 10 जनवरी, 1966 को रूस के ताशकंद शहर में पाकिस्तान के साथ हुए एक समझौते के अगले दिन वहीं उनकी संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी.

शास्त्री जी के जाने के बाद सिनेमा वालों को उनका महत्व समझ आया, जिसका नतीजा फिल्म ‘परिवार’ के उपरोक्त गीत के तौर पर दिखा. लेकिन इस फिल्म से पहले शास्त्री जी के नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर आधारित एक फिल्म ‘उपकार’ मनोज कुमार के निर्देशन में आ चुकी थी. इसके बारे में किस्सा प्रसिद्ध है कि लेखक, निर्माता, निर्देशक व अभिनेता मनोज कुमार को बुला कर अपने नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर फिल्म बनाने की प्रेरणा खुद शास्त्री जी ने दी थी. उनका मानना था कि सिर्फ नारे लगाने से कुछ नहीं होगा और जिस तरह से आम लोगों में सिनेमा की लोकप्रियता व स्वीकार्यता है, वैसे में यदि कोई फिल्म इस बारे में बात करेगी, तो लोग उसे गहराई से समझ पायेंगे. यह दिलचस्प है कि जहां महात्मा गांधी सिनेमा को एक बुराई समझ उससे दूर रहे, वहीं शास्त्री जी ने सिनेमा के महत्व व प्रभाव को समझा.

‘उपकार’ ही वह पहली फिल्म थी, जिसने मनोज कुमार को पर्दे पर ‘भारत कुमार’ की छवि दी. इस कालजयी फिल्म में मनोज कुमार ने एक ऐसे किसान की भूमिका निभाई थी जो पहले खेतों में हल थामता है और वक्त आने पर हाथों में बंदूक लिए सरहद पर जा डटता है. इस फिल्म में गुलशन बावरा के लिखे गीत ‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ में ‘रंग हरा हरिसिंह नलवे से, रंग लाल है लाल बहादुर से…’ कह कर शास्त्री जो को याद किया गया. इसके बाद साल 1970 में आयी मनोज कुमार की ही फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ में इंदीवर के लिखे गीत ‘दुल्हन चली…’ में भी शास्त्री जी का जिक्र ‘चाचा जिसके नेहरू-शास्त्री, डरें न दुश्मन कैसे…’ के साथ आता है. वैसे साल 1967 में एस सुखदेव ने फिल्म प्रभाग के लिए 27 मिनट का एक वृत्तचित्र ‘होमेज टू लाल बहादुर शास्त्री’ भी बनाया था. ‘अपने शास्त्री जी’ समेत दो-एक और वृत्तचित्र भी बने. ‘प्रधानमंत्री’ नाम की एक टीवी शृंखला में उन पर भी एक एपिसोड था. एक बड़ा काम शास्त्री जी पर तब हुआ, जब दूरदर्शन पर कई साल पहले ‘धरती का लाल’ नाम से शंकर सुहेल निर्देशित एक धारावाहिक आया, जिसमें उनके पूरे जीवन को विस्तार से दिखाया गया. साल 2021 में मिलन अजमेरा निर्देशित एक फिल्म ‘जय जवान-जय किसान’ भी आयी, लेकिन उसके बारे में ज्यादा नहीं सुना गया. यह भी आश्चर्यजनक है कि लंबे समय तक शास्त्री जी की रहस्यमयी मृत्यु पर भी फिल्म वालों ने कुछ नहीं बनाया. दो-एक डॉक्यू-ड्रामा किस्म की चीजें बनीं, लेकिन चर्चित हुई 2019 में निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’. मगर दर्शकों को बड़े पर्दे पर शास्त्री जी के बारे में कुछ और बड़ा देखने का अब भी इंतजार है.

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