Kaagaz 2 Review: फिल्म आम आदमी के अधिकारों की है कहानी

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फिल्म – कागज 2
निर्माता – वीनस फिल्म्स
निर्देशक – वी के प्रसाद
कलाकार -सतीश कौशिक, अनुपम खेर, दर्शन कुमार, नीना गुप्ता,अनंग देसाई, किरण कुमार, स्मृति कालरा और अन्य
प्लेटफार्म -सिनेमाघर
रेटिंग – ढाई

Kaagaz 2 Review: 2021 में रिलीज हुई पंकज त्रिपाठी अभिनीत कागज फिल्म के साथ अभिनेता सतीश कौशिक ने निर्देशन में एक अरसे बाद वापसी की थी. कागज 2 ने इन दिनों सिनेमाघरों में दस्तक दी है. एक बार फिर एक आम आदमी के सिस्टम से संघर्ष को कहानी की आत्मा बनाया गया है. हालांकि संवेदनशील मुद्दे पर बनी कागज 2 से दिवंगत अभिनेता सतीश कौशिक निर्देशन से नहीं जुड़े हैं. उन्होंने अभिनेता के तौर पर फिल्म को आधार दिया है. वह उनके अभिनय की आखिरी फिल्म कही जा रही है, जो कागज 2 को एक जरूरी फिल्म भी बना गया है.

आम आदमी के अधिकारों की है कहानी
फिल्म की कहानी की बात करें तो यह उदय प्रताप सिंह (दर्शन कुमार) से शुरू होती है, जो आर्मी में ट्रेनिंग कर कर रहा है, लेकिन जल्द ही अनुशासनहीनता की वजह से आर्मी की ट्रेनिंग से उसे बाहर निकल दिया जाता है. वह इन सबके लिए अपने पिता राज नारायण (अनुपम खेर) को जिम्मेदार समझता है क्योंकि उन्होंने उसको और उसकी मां (नीना गुप्ता) को बचपन में अकेले छोड़ दिया था और वह बचपन से एक आर्मी की ट्रेनिंग से निकलने के बाद घर पहुंचता है और उसे उसके पिता का सालों बाद कॉल आता है कि वह बीमार है. वह ना चाहते हुए पिता से मिलने जाता है. उसके पिता पेशे से वकील है और वह एक पिता (सतीश कौशिक) को इंसाफ दिलाने के केस से जुड़े हैं, क्योंकि उनकी बेटी राजनीतिक रैली की वजह से समय पर इलाज के लिए अस्पताल नहीं पहुंच पाती है और उसकी मौत हो गयी है. क्या यह केस उदय और उसके पिता के रिश्ते को नयी दिशा देगा. इस केस में राजनारायण क्या असहाय पिता को इंसाफ दिला पायेंगे. यही आगे की कहानी है.

फिल्म की खूबियां और खामियां
यह फिल्म सवाल उठाती है कि क्या जो कागजों पर लिखें कानून हैं वह वाकई आम लोगों की ताकतवर लोगों के खिलाफ मदद कर सकते हैं या फिर सत्ता में बैठे लोग इसका दुरुपयोग कर हमेशा आम आदमी के अधिकारों की अनदेखी करेगा. फिल्म अहम मुद्दे को उठाती है कि राजनैतिक रैलियों में किस तरह से आम जन जीवन प्रभावित होता है. कोर्ट की बहस रोचक है. फिल्म में सोशल मीडिया के पॉवर को फिर से दिखाया गया है. फिल्म के आख़िर में सतीश कौशिक का कोर्ट वाला दृश्य फिल्म को और प्रभावी बना गया है. खामियों की बात करें तो राज नारायण और उदय प्रताप वाला ट्रैक थोड़ा मैलोड्रामैटिक बन गया है. एक्शन दृश्यों की फिल्म को जरूरत नहीं थी. फिल्म की एडिटिंग पर थोड़ा और काम किया जा सकता था. फिल्म में जरूरत से ज़्यादा गाने है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी कहानी के अनुरूप है. संवाद अच्छे बन पड़े हैं .

सतीश कौशिक और अनुपम खेर का अभिनय है खास
अभिनय की बात करें तो यह फिल्म अनुपम खेर की है और उन्होंने अपने किरदार को पूरे विश्वास के साथ जिया है. फिल्म में सतीश कौशिक की एंट्री थोड़ी देर से होती है, लेकिन परफॉरमेंस में उन्होंने अहम उपस्थिति दर्शायी है. अपनी बेटी को खो चुके पिता की असहाय भूमिका में उन्होंने उसके दर्द, दुख और जद्दोजहद को उन्होंने बखूबी जिया है. अनुपम खेर के साथ उनकी जुगलबंदी खास बनी है. दर्शन कुमार अपनी भूमिका में छाप छोड़ जाते हैं. नीना गुप्ता, स्मृति कालरा,अनंग देसाई, किरण कुमार भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय कर गये हैं.

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