जयहिंद: सुनहरी रेशमी साड़ी संग सोना बुन बना रहे आर्थिक समृद्धि का नव-कीर्तिमान

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 सोने के महीन तार से सजाकर सुनहरी रेशमी साड़ी बुनने वाले महेश्वर और चंदेरी के बुनकरों व कारीगरों की लगन और संकल्प का ही सुपरिणाम है कि जब समूचा विश्व कोरोनाजनित मंदी से जूझ रहा है, तब महेश्वरी- चंदेरी उत्पाद देशभर में नए शोरूमों के सृजन का कारक बन आर्थिक समृद्धि का नव-र्कीतिमान बना रहे हैं। कभी राजघरानों के लिए बुनी जाने वाली मध्य प्रदेश के महेश्वर और चंदेरी की रेशमी साड़ी की आज भी अपनी अलग पहचान कायम है।

यह कमाल यहां के बुनकर ही कर सकते हैं कि उनके द्वारा बुनी गई मलमल की साड़ी अंगूठी से भी निकल जाती है। यहां की सुनहरे कंगूरे बार्डर वाली सिल्क की साड़ी देश-दुनिया के शोरूमों में स्थान बनाती है। इनकी कीमत लाखों तक में होती है। मध्य प्रदेश की हस्तशिल्प कला की अपनी पहचान है। हथकरघे पर चंदेरी, महेश्वर, पंढाना, आष्टा, सौंसर के बुनकर अपनी कला का जादू दिखाते हैं। इन सभी हस्तशिल्पियों के सपनों को प्रदेश का हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम इन दिनों साकार करने में जुटा हुआ है। बुनकरों की कला और निगम का प्रबंधन इस साल उत्पादन और बिक्री का र्कीतिमान बनाने में सफल रहा है।

 

मप्र की चंदेरी और महेश्वर की साड़ियों का इतिहास सौ साल से भी पुराना है। चंदेरी की साड़ियां जहां राजपूत शासकों और मराठा राजघरानों के लिए तैयारी की जाती थीं, तो वहीं महेश्वरी साड़ी होल्कर घराने के लिए बनाई जाती थीं। यह साड़ियां ऐसे कुशल बुनकरों द्वारा तैयार की जाती हैं, जिनके पूर्वज कभी ढाका के मलमल से ऐसी साड़ी तैयार करते थे, जो अंगूठी में से निकल जाती थी। यही कारीगरी आज चंदेरी और महेश्वर के बुनकरों के हाथों में कायम है। यहां के बुनकर आज भी साड़ी इतने बारीकी से बुनते हैं कि इनका वजन डेढ़ सौ से दो सौ ग्राम तक भी रहता है। समय के साथ यहां के बुनकरों ने खुद को भी आधुनिकता से जोड़ा है।

हथकरघा विकास निगम तो इन बुनकरों से उत्पाद लेता ही है, बुनकर सीधे भी अब देशविदेश के बाजार में जगह बना चुके हैं। यहां की साड़ियां कई देशों में निर्यात होती हैं। यहां के हस्तशिल्पी तुलसीराम कोली ने 1980 में घूघरा बार्डर साड़ी बनाई थी, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति के हाथों 1985 में नेशनल अवॉर्ड देकर सम्मानित किया गया था। बुनकर तुलसी राम बताते हैं कि उसके बाद इस कला को आगे बढ़ाने के लिए दतिया में भी 10 हैंडलूम लगाकर बुनकरों को दो वर्ष तक प्रशिक्षण दिया।

73 वर्षीय तुलसीराम की इस विरासत को उनके दो बेटे आगे बढ़ रहे हैं। व्यापारी बांकेबिहारी चतुर्वेदी के पिता दिवंगत जयकिशोर चतुर्वेदी कोल्हापुर के राजघराने, बड़ोदरा महाराज सहित मराठा राजवंशों में चंदेरी की साड़ियां देने जाते थे। आज उनके बेटे इन साड़ियों को कोल्हापुर के राजपरिवार को पहुंचाते हैं। उधर, सिंधिया राजपरिवार की महिलाओं की पहली पसंद चंदेरी की साड़ी है। बांकेबिहारी चतुर्वेदी का कहना है कि चंदेरी की साड़ी प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर, अभिनेत्री करीना कपूर और अनुष्का शर्मा भी पहनती हैं।

बिक्री में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: हथकरघा विकास निगम अब इनकी बिक्री के लिए अपने मृगनयनी शोरूमों की संख्या देशभर में तेजी से बढ़ा रहा है। बीते कुछ महीनों में रायपुर, मुंबई, गुजरात, हैदराबाद, नागपुर के अलावा मप्र में बैतूल, होशंगाबाद, सागर, छिंदवाड़ा, भोपाल, मण्डीदीप में 13 नए शोरूम खोले गए हैं। साथ ही तीन शोरूमों का निर्माण चल रहा है और दस का प्रस्ताव तैयार है। इस साल सभी ने मिलकर आठ सालों की बिक्री का रिकॉर्ड 20 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ तोड़ा है। जिसके परिणाम स्वरूप बुनकरों के मेहनताने में 25 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। निगम के शोरूम में साड़ियों के साथ सिल्क बाय नेचर, आयुर्वस्त्र, इम्युनिटी बढ़ाने हर्बल कपड़े, चांदी के पशुपतिनाथ, प्राकृतिक शिवलिंग और उनके लॉकेट, स्टोन क्राफ्ट आइटम भी उपलब्ध होते हैं, जिन्हें मप्र के हस्तशिल्पी तैयार करते हैं।

मध्य प्रदेश के हथकरघा विकास निगम प्रबंध निदेशक राजीव शर्मा ने बताया कि देश के एक बड़े वर्ग में हथकरघा के उत्पादों की तेजी से मांग बढ़ी है। इस मांग के अनुरूप परंपरागत के साथ ही आधुनिकता की दृष्टि से भी हस्तशिल्पी उत्पाद तैयार कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर कारीगरों को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। बढ़ती मांग और कारोबार को देखते हुए अब बुनकरों की युवा पीढ़ी भी इस क्षेत्र में दिलचस्पी ले रही है