हबीब तनवीर का अंतिम इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने कहा- वालिद की वसीयत पूरी करने का सुकून…

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आखिरी वक्त में वालिद की दो ही इच्छाएं थीं. पहली का जिक्र वे अक्सर करते थे कि उस सूदखोर हिम्मतलाल के 19 रुपये 75 पैसे लौटा देना. अब्बा ने यह पैसा सूद पर लिया था. वे सूद पर पैसा लेना और देना दोनों को गुनाह मानते थे और हिम्मतलाल के सूद के कारण वे खुद को पूरी उम्र गुनहगार मानते रहे. वसीयत में अब्बा ने कहा था कि पेशावर जरूर जाना. हिम्मतलाल तो कभी मिले नहीं, लेकिन पेशावर जाने के लिए कई कोशिशें की. 1958 के बाद पेशावर जाने के लिए जद्दोजहद करते रहे. 1972 में काबुल तक गया. तब सांसद था. काबुल से पेशावर बहुत करीब है. उस वक्त बंग्लादेश अलग हो गया था. मेरे देखते-देखते कई लोग भाग रहे थे, परेशान होकर, स्वात से. यह सब देखा था उसी दौर में. माहौल में तनाव घुला हुआ था. पेशावर जाना नामुमकिन हो गया था. बड़े भाई अक्स पेशावर के खूबसूरत बाजार किस्सा खानी और चने और मेवे का जिक्र बड़े चाव से करते थे. सुना था कि वहां पिस्ता-बादाम जेब में भरकर लोग काम पर निकलते थे. पेशावर जाने की इच्छा तेज हो रही थी, लेकिन पाकिस्तान में कराची तक का वीजा था. वहां लेखकों ने कई कोशिशें कीं, लेकिन नहीं जा सके. एक बार जलालाबाद गये थे. वहां खान अब्दुल गफफार से पेशावर और स्वात के बारे में कई बातें हुई, लेकिन वहां से भी पेशावर नहीं जा पाए. 1990 में भारत सरकार ने एक प्रतिनिधिमंडल लाहौर, कराची और इस्लामाबाद में थियेटर गतिविधियों के माकूल माहौल तलाशने के लिए भेजा था. हमें ‘आगरा बाजार´ के प्रदर्शन के लिए जगह देखनी थी. उन जगहों में पेशावर का जिक्र नहीं था. पेशावर के थियेटर के बारे में मैंने सुन रखा था. वहां बहुत बेहतर थियेटर स्टेज हैं, वह देखना चाहते हैं. पाकिस्तानी अथॉरिटी ने बार्डर सुलगने का हवाला दिया और कहा कि हम वहां नहीं भेज सकते. मुझे आगरा बाजार के लिए बड़ा स्टेज चाहिए था, जिसमें 52 लोग आ सकें. सुन रखा था कि पेशावर का ऑडिटोरियम इसके लिए बेहतर है. साथ ही वालिद की इच्छा पूरी करने की हसरत भी फिर सिर उठा रही थी. अथॉरिटी को बताया तो उन्होंने दो दिन के लिए पेशावर जाना मुमकिन किया. अब्बा कहते थे कि पेशावर जाना तो चप्पली कबाब खाना मत भूलना. हमने पेशावर के दोस्तों से जिक्र किया, तो वे बोले कि आप दो दिन के लिए यहां आएं हैं और अफसोस ये दो दिन मीट लैस हैं. पेशावर में इतना गोश्त खाया जाता है कि अगर दो दिन के लिए सरकारी रोक न हो तो ईद पर कमी पड़ जाए. बहरहाल, हमारी किस्मत नहीं थी कि चप्पली कबाब खायें, लेकिन फिर भी बाप की वसीयत पूरी कर दी इसका सुकून था.´´

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