ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, जानें क्या पड़ेगा इसका प्रभाव

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अमानवीय गतिविधियों के कारण ग्रीनहाउस गैसों का बेहिसाब उत्सर्जन दुनिया के तापमान में वृद्धि का कारण बना है. इस वजह से चरम मौसम भी अपना प्रभाव दिखा रहा है. प्रलयंकारी बारिश, बाढ़, लू , सूखा, हिमनदों के पिघलने, समुद्र जलस्तर में वृद्धि जैसी प्राकृतिक घटनाओं से उपजी समस्याएं मानव समेत तमाम जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर संकट बन मंडरा रही हैं. हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने वायुमंडल में गर्मी को बढ़ाने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर एक रिपोर्ट जारी की है. आइए जानते हैं इस रिपोर्ट से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में…

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ)द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2022 के दौरान वायुमंडल में वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों- कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड- की सघनता रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गयी और इसमें निकट भविष्य में कमी आने के कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं. डब्ल्यूएमओ के प्रमुख पेटरी टालस का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता का वर्तमान स्तर इस शताब्दी के अंत तक पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्य से भी अधिक तापमान में वृद्धि का संकेत दे रहा है. इस वृद्धि के साथ चरम मौसम की अधिक घटनाएं देखने को मिलेंगी. ऐसे में हमें तत्काल जीवाश्म ईंधन की खपत को कम करने की आवश्यकता है.

सीओ2 की सघनता पूर्व औद्योगिक स्तर से 50 प्रतिशत अधिक

बीते वर्ष कार्बन डाइऑक्साइड की वातावरण में वैश्विक औसत सघनता पहली बार पूर्व औद्योगिक युग से 50 प्रतिशत अधिक पायी गयी और 2023 में भी इसके उत्सर्जन में बढ़त जारी है. वर्तमान में वायुमंडल में सीओ2 का जो स्तर है, वैसा पृथ्वी ने तीन से पांच मिलियन वर्ष पहले देखा था जब तापमान तुलनात्मक रूप से दो से तीन डिग्री और समुद्र का स्तर 10 से 20 मीटर अधिक था.

तुलनात्मक रूप से देखें, तो कार्बन डाइऑक्साइड की सघनता में 2021-2022 में हुई वृद्धि 2020-2021 तथा बीते दशक के औसत वार्षिक वृद्धि दर की अपेक्षा मामूली कम रही. डब्ल्यूएमओ की बुलेटिन के अनुसार, ऐसा संभवतः कार्बन चक्र में प्राकृतिक, अल्पकालिक परिवर्तन के कारण हुआ और औद्योगिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप नये उत्सर्जन में वृद्धि जारी रही.

मीथेन की सघनता में वृद्धि की बात करें, इसमें 2020-2021 की तुलना में 2021-2022 में मामूली कमी आयी, परंतु बीते दशक के औसत वार्षिक वृद्धि दर की तुलना में यह बहुत अधिक रही.

नाइट्रस ऑक्साइड की सघनता में 2021 से 2022 तक रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज हुई. इस गैस की सघनता में हाल के समय में कभी भी इतनी बढ़त दर्ज नहीं हुई थी.

उत्सर्जन के दुष्प्रभाव से संकट में दुनिया

डब्ल्यूएमओ की मानें, तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण बढ़ते तापमान का जलवायु पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ रहा है. इस कारण चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो अविलंब ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कटौती की आवश्यकता जता रही हैं. भीषण बाढ़ से लेकर गर्म हवा के थपेड़े, सूखा व जलवायु संबंधी आपदाओं ने 2022 में लाखों-करोड़ों को प्रभावित किया और अरबों डॉलर की क्षति पहुंचायी है. मौसमी आपदाओं के कारण न केवल अनेक जिंदगियां और आजीविकाएं बर्बाद हुईं, बल्कि स्वास्थ्य, भोजन, ऊर्जा, जल सुरक्षा व बुनियादी ढांचे पर भी असर पड़ा.

हिमनदों पर अभूतपूर्व असर

  • वर्ष 2022 में यूरोप के आल्प्स स्थित हिमनदों (ग्लेशियरों) पर अभूतपूर्व असर हुआ है. सर्दियों में कम बर्फबारी, मार्च 2022 में सहारा रेगिस्तान में उत्पन्न होने वाली धूल (सहारन डस्ट) के उड़कर यहां आने और मई व सितंबर की शुरुआत के दौरान लू चलने से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि यहां के हिमनद ने पिघलने के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये.

  • स्विट्जरलैंड में, 2021 और 2022 के दौरान हिमनद बर्फ की मात्रा छह प्रतिशत नष्ट हो गयी.

  • उच्च पर्वतीय एशिया, पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और आर्कटिक के कुछ हिस्सों में भी हिमनद को काफी नुकसान पहुंचा. हालांकि, आइसलैंड और उत्तरी नॉर्वे में औसत से अधिक वर्षा और अपेक्षाकृत कम गर्मी के कारण कुछ लाभ हुआ.

  • आइपीसीसी के अनुसार, वैश्विक स्तर पर हिमनदों ने 1993-2019 के बीच 6000 गीगाटन से अधिक बर्फ खो दी.

  • ग्रीनलैंड में बर्फ की चादर का द्रव्यमान लगातार 26वें वर्ष घटा है, और बीते वर्ष सितंबर में पहली बार चोटी पर बर्फ पड़ने के बजाय बारिश हुई.

  • 25 फरवरी, 2022 को अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ घटकर 1.92 मिलियन किमी स्क्वायर (किमी2) रह गयी, जो रिकॉर्ड सबसे निचला स्तर है. जून-जुलाई में रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर पर रहने के साथ ही यह वर्ष के बाकी महीनों में भी लगातार औसत से नीचे बनी रही.

  • गर्मियों के अंत में सितंबर में आर्कटिक समुद्री बर्फ में भी अत्यधिक कमी आयी.

समुद्री जलस्तर में वृद्धि

ग्रीनहाउस गैस के कारण समुद्री जलस्तर 1993 के बाद से दोगुना हुआ है और महासागरीय ताप व अम्लीकरण भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं. बीते वर्ष महासागर की गर्मी एक नये स्तर पर पहुंच गयी. पिछले दो दशकों में महासागरों के गर्म होने की दर विशेष रूप से अधिक रही है. ला नीना की स्थिति जारी रहने के बावजूद, 2022 के दौरान समुद्र की सतह के 58 प्रतिशत हिस्सों में कम से कम एक समुद्री लू अवश्य आया. वैश्विक औसत समुद्री स्तर (जीएमएसएल) में भी 2022 में वृद्धि जारी रही और यह एक नयी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गयी. वर्ष 2005-2019 की अवधि में हिमनदों, ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से पिघल चुके कुल लैंड आइस ने जीएमएसएल वृद्धि में 36 प्रतिशत और महासागर की गर्मी में 55 प्रतिशत का योगदान दिया.

लू ने दुनिया को झुलसाया

वर्ष 2022 रिकॉर्ड पांचवा या छठा गर्म वर्ष दर्ज हुआ है. इस वर्ष उत्तरी गोलार्द्ध के कुछ हिस्से असाधारण रूप से शुष्क व सूखे रहे.

बीते आठ वर्ष वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड सर्वाधिक गर्म वर्ष दर्ज हुए हैं. इसका कारण लगातार बढ़ती ग्रीनहाउस गैस सघनता (सांद्रता) और संचित गर्मी थी.

भारत और पाकिस्तान ने मार्च व अप्रैल में चिलचिलाती गर्मी व लू का प्रकोप झेला, इस कारण लोगों को तो परेशानी हुई ही, पैदावार में भी कमी आयी.

बीते वर्ष चीन ने भी अभूतपूर्व गर्मी का सामना किया. यहां मध्य जून से अगस्त के अंत तक लू चलती रही. इससे यहां की गर्मी रिकॉर्ड दूसरी सबसे शुष्क दर्ज हुई.

रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने यूरोप को भी काफी परेशान किया. ग्रीष्म मौसम के दौरान कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी के साथ-साथ असाधारण शुष्क परिस्थितियां भी उत्पन्न हो गयी थीं. यूरोप में गर्मी के कारण अत्यधिक लोगों की मृत्यु भी हुई, जिनमें 15,000 लोगों की अकेले स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और पुर्तगाल में ही हुई.

अर्जेंटीना का मध्य-उत्तरी क्षेत्र, दक्षिणी बोलिविया, मध्य चिली, पराग्वे और उरुग्वे के अधिकांश हिस्सों में भी बीते वर्ष नवंबर व दिसंबर के महीनों में रिकॉर्ड तापमान दर्ज हुआ और लू ने लोगों को परेशान किया.

पूर्वी अफ्रीका में औसत से कम बारिश

लगातार पांचवें वर्ष पूर्वी अफ्रीका में औसत से कम बारिश दर्ज हुई और बीते 40 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ जब इतने लंबे समय तक लगातार बारिश में कमी आयी. इस कारण इस क्षेत्र को सूखे ने जकड़ लिया है. इससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं, कृषि बर्बाद हो गयी है और मवेशियों की मौत हुई है, विशेष रूप से इथियोपिया, केन्या व सोमालिया में.

पाकिस्तान में बारिश-बाढ़ से तबाही

बीते वर्ष जुलाई (सामान्य से 181 प्रतिशत अधिक) व अगस्त (सामान्य से 243 प्रतिशत अधिक) में रिकॉर्डतोड़ बारिश से पाकिस्तान में भयंकर बाढ़ आयी. इस दौरान पाकिस्तान का एक तिहाई हिस्सा जलमग्न रहा. प्रलंयकारी बाढ़ के कारण इस पड़ोसी देश में 1,700 से अधिक मौतें हुईं और 3.3 करोड़ लोग प्रभावित हुए. लगभग 80 लाख लोग विस्थापित हो गये. आकलन है कि इस आपदा से पाकिस्तान को कुल 30 बिलियन डॉलर की क्षति पहुंची.

चरम मौसमी घटनाओं ने 50 वर्षों में ली 20 लाख से अधिक की जान

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार बीते 50 वर्षों में चरम मौसमी घटनाओं के कारण 20 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई और 4.3 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा.

12,000 के करीब आपदाएं आयीं 1970 से 2021 के बीच मौसम, जलवायु और जल से जुड़े संकटों के कारण और इससे सबसे अधिक प्रभावित विकासशील देश हुए. यहां 10 में से नौ मौतें हुईं और जलवायु झटकों और चरम मौसम के कारण हुए कुल आर्थिक नुकसान का 60 प्रतिशत इन्हें ही उठाना पड़ा. अल्प विकसित देशों और छोटे विकासशील द्वीपीय देशों को अत्यधिक आर्थिक क्षति उठानी पड़ी.

30 प्रतिशत तक जीडीपी का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है कम विकसित देशों को, आधी शताब्दी में आयी अनेक आपदाओं के कारण.

5 में से एक आपदा का छोटे विकासशील द्वीपीय देशों पर जीडीपी के पांच प्रतिशत से अधिक के बराबर प्रभाव पड़ा. कुछ आपदाओं ने तो देशों की संपूर्ण जीडीपी ही नष्ट कर दी.

10 लाख के आसपास मौतें हुईं एशिया में बीते 50 वर्षों में चरम मौसम, जलवायु व जल से जुड़ी विभिन्न घटनाओं के कारण, जिनमें से आधे से अधिक अकेले बांग्लादेश में हुईं.

95 प्रतिशत मौत सूखे के कारण हुई अफ्रीका में, 733,585 जलवायु आपदा मौतों में से.

2023 धरती का सर्वाधिक गर्म वर्ष

इस वर्ष अक्तूबर में तापमान के चरम पर पहुंचने के साथ 2023 का रिकॉर्ड सबसे गर्म वर्ष होना लगभग तय माना जा रहा है. वहीं दूसरी ओर पारा (मरकरी) के बढ़ते जाने से अल नीनो का प्रभाव अगले वर्ष (2024 में) भी देखने को मिलेगा, नतीजा गर्मी भी खूब सतायेगी. डब्ल्यूएमओ प्रमुख पेटरी टालस ने चेतावनी दी है कि गर्मी के बढ़ने से लू, सूखा, जंगल की आग, भारी बारिश और बाढ़ जैसी चरम मौसम की घटनाएं कुछ क्षेत्रों में भारी तबाही मचायेंगी. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जब तक उत्सर्जन जारी रहेगा, तब तक वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की सघनता बनी रहेगी, परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान में वृद्धि भी जारी रहेगी. इतना ही नहीं, सीओ2 के वातावरण में लंबे समय तक बने रहने के कारण पहले हुई तापमान में वृद्धि कई दशकों तक बनी रहेगी, यहां तक कि यदि उत्सर्जन को कम कर शून्य तक ले आया जाए तब भी.

सबसे गर्म रहा 2023 का अक्तूबर

इस वर्ष अक्तूबर का महीना रिकॉर्ड अब तक का सबसे गर्म अक्तूबर रहा, जो 1991-2020 के औसत से 0.85 डिग्री सेल्सियस अधिक और पिछले सबसे गर्म अक्तूबर से 0.40 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म था.

अक्तूबर लगातार छठा महीना रहा जब अंटार्कटिका समुद्री बर्फ का स्तर वर्ष में रिकॉर्ड निम्न स्तर पर बना रहा.

इस वर्ष अक्तूबर में आर्कटिक समुद्री बर्फ का स्तर अपने सातवें सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, जो औसत से 12 प्रतिशत कम है.

वर्ष 2023 अक्तूबर में, यूरोप के अधिकांश हिस्सों में कुल वर्षा औसत से अधिक रही. तूफान बाबेट ने उत्तरी यूरोप, जबकि तूफान एलाइन ने पुर्तगाल और स्पेन पर अपना प्रभाव दिखाया, जिससे इन क्षेत्रों को भारी बारिश और बाढ़ का सामना करना पड़ा.

भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में अल नीनो की स्थितियां बनती रहीं, हालांकि इस दौरान 1997 और 2015 की तुलना में असामान्य घटनाएं कम दर्ज हुईं.

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