Explainer: दिल्ली सर्विस बिल लोकसभा में पेश, BJD के समर्थन से AAP का बिगड़ा खेल, राज्य सभा में सरकार मजबूत

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दिल्ली सर्विस बिल मंगलवार को लोकसभा में पेश किया गया. निचले सदन में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने गृह मंत्री अमित शाह की ओर से विधेयक पेश किया. दिल्ली में समूह-ए के अधिकारियों के स्थानांतरण एवं पदस्थापना के लिए एक प्राधिकार के गठन के लिहाज से लागू अध्यादेश का स्थान लेने के लिए लाया गया है. इधर बीजू जनता दल (बीजेडी) ने अध्यादेश के समर्थन का ऐलान कर दिया है, जिससे आम आदमी पार्टी की मुश्किलें बढ़ गयी हैं.

बीजू जनता दल ने किया बिल का समर्थन

बीजू जनता दल (बीजद) के पिनाकी मिश्रा ने कहा कि सरकार जो विधेयक लेकर आई है, वह पूरी तरह से विधायी शक्ति के अधीन है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत भी ऐसा किया जा सकता है. मिश्रा ने विरोध करने वाले दलों के सदस्यों से कहा कि आप इसके (विधेयक) खिलाफ मतदान कर सकते हैं लेकिन इसे पेश करने को चुनौती नहीं दे सकते हैं.

बीजेडी के समर्थन से दिल्ली सेवा बिल का राज्य सभा में पारित होना तय

दिल्ली सेवा बिल हो बीजेडी के समर्थन मिलने से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को उच्च सदन में भी मजबूती मिल गयी है. बीजेडी के लोकसभा में 12 सांसद हैं, जबकि राज्य सभा में 9 सांसद हैं. इसके साथ ही दिल्ली सेवा बिल के समर्थन में अब कुल 128 वोट पक्के हो गये हैं. यह आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा झटका है. राज्य सभा में बीजेपी के कुल 93 सांसद हैं. जबकि सहयोगी दलों को मिलाकर यह संख्या 105 हो जाती है. बताया जा रहा है कि पांच मनोनित और दो निर्दलीय सांसदों का भी सरकार को समर्थन मिलना तय है. हालांकि इसके बावजूद बहुमत से यह आंकड़ा 8 कम है. दूसरी ओर विपक्ष के साथ कुल 105 सांसद हैं.

लोकसभा में मोदी सरकार मजबूत

लोकसभा में मोदी सरकार काफी मजूबत है. बीजेपी के लोकसभा में कुल 301 सांसद हैं. सहयोगी दलों को मिलाकर एनडीए के कुल 333 सांसद हैं. जबकि विपक्ष के पास केवल 142 सांसद हैं. ऐसी स्थिति में मोदी सरकार दिल्ली सेवा बिल को लोकसभा में आसानी से पास करा लेगी.

दिल्ली सेवा बिल का इन सांसदों ने किया विरोध

विधेयक पेश किये जाने का कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी, शशि थरूर एवं गौरव गोगोई, आरएसपी के एन के प्रेमचंद्रन, तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय और एआईएमआईएम के असदुद्दीन औवैसी आदि ने विरोध किया. विधेयक पेश किये जाने का विरोध करते हुए लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि वह सदन के नियमों एवं प्रक्रियाओं के नियम 72 के तहत इसका विरोध कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत सेवा संबंधी विषय राज्य के अधीन होना चाहिए, ऐसे में यह विधेयक अमल में आने पर दिल्ली राज्य की शक्ति को ले लेगा. चौधरी ने कहा कि यह सहकारी संघवाद की कब्रगाह बनने वाला है. आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन ने कहा कि वह इस विधेयक को पेश किये जाने का तीन बिन्दुओं पर विरोध कर रहे हैं. इसमें पहला सदन के नियमों एवं प्रक्रियाओं के नियम 72 के तहत है. उन्होंने कहा कि इस सदन को इस प्रकार का कानून बनाने की विधायी शक्ति नहीं है. उन्होंने कहा कि यह संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ है और दिल्ली राज्य की शक्तियों को कमतर करने वाला है. प्रेमचंद्रन ने कहा कि इस विधेयक को लाने का मकसद सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने का प्रयास है.

ओवैसी ने चुटीली टिप्पणी की, टीएमसी सांसद ने बिल का किया विरोध

विधेयक पेश किये जाने का विरोध करते हुए एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने चुटीली टिप्पणी की कि सबसे पहले वह विपक्ष के शुक्रगुजार हैं कि बगैर प्रधानमंत्री के सदन में आए, उन्होंने सदन चलने दिया. उन्होंने कहा कि एक सामान्य विधेयक के माध्यम से संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता है तथा यह अधिकारों के विभाजन के सिद्धांतों के भी खिलाफ है. वहीं तृणतूल कांग्रेस के सौगत राय ने कहा कि वह इस विधेयक को पेश किये जाने का विरोध कर रहे हैं क्योंकि यह संसद की विधायी शक्ति से बाहर का विषय है.

अमित शाह ने कहा, संविधान के तहत बिल लाया गया

विधेयक पर लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि संविधान ने सदन को संपूर्ण अधिकार दिया है कि वह दिल्ली राज्य के लिए कोई भी कानून ला सकता है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हवाले से इसे पेश किये जाने का विरोध किया जा रहा है लेकिन उसी आदेश के पैरा 6, पैरा 95 में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि संसद, दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र के लिए कोई कानून बना सकती है. शाह ने कहा कि विधेयक पेश किये जाने के खिलाफ सारी आपत्तियां राजनीतिक हैं और इनका कोई संवैधानिक आधार नहीं है, संसद के नियमों के तहत भी इनका कोई आधार नहीं है. इसके बाद सदन ने ध्वनिमत से विधेयक पेश किये जाने की मंजूरी दे दी.

क्या है मामला

केंद्र सरकार 19 मई को अध्यादेश लाई थी. इससे एक सप्ताह पहले सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार को सेवा से जुड़े मामलों का नियंत्रण प्रदान कर दिया था, हालांकि उसे पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और भूमि से जुड़े विषय नहीं दिये गए. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में ‘राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक’ को स्वीकृति दी थी. जिसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी ने अध्यादेश का कड़ा विरोध किया है. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी इस अध्यादेश के विरुद्ध हैं.

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