कोरोना वायरस से लड़ने के लिए वैज्ञानिकों के आठ प्रहार, इंसानों में ऐसे आती है इम्युनिटी.

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नई दिल्ली,  कोरोना वायरस से लड़ने के लिए दुनिया में 90 से अधिक टीके विकसित किए जा रहे हैं। शोधकर्ता विभिन्न तकनीकों का परीक्षण कर रहे हैं। इनमें से कुछ तकनीक ऐसी हैं, जिन्हें पहले से लाइसेंस प्राप्त टीके में इस्तेमाल नहीं किया गया था। नेचर के अनुसार कम से कम छह समूहों ने पहले से ही सुरक्षा परीक्षणों में वॉलेंटियर्स को फॉर्मूले के तहत इंजेक्शन लगाना शुरू कर दिया है। वहीं दूसरों ने जानवरों पर परीक्षण शुरू कर दिया है। प्रकृति का ग्राफिकल गाइड प्रत्येक वैक्सीन डिज़ाइन की व्याख्या करता है। कोरोना वायरस पर वैज्ञानिकों के इन आठों प्रहारों की जानकारी दो किस्तों में दी जाएगी। आज पेश है पहली किस्त:

इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया विशेष एपीसी वायरस को घेरते हैं और इसके प्रदर्शन करने वाले भाग से टी हेल्पर सेल एक्टिवेट हो जाते हैं। टी हेल्पर सेल अन्य इम्यून प्रतिक्रियाओं में सक्षम: बी सेल एंटीबॉडीज बनाती हैं जो कि वायरस द्वारा संक्रमित कोशिकाओं को रोक सकती हैं। यहां तक की यह वायरस को नष्ट करने में भी सक्षम है। सीटॉक्सिक टी सेल वायरस से प्रभावित सेल को पहचानकर उन्हें नष्ट करती हैं। लंबे समय तक जीवित रहने वाली बी और टी कोशिकाएं वायरस को पहचानती हैं। वे महीनों और वर्षों तक शरीर को इम्यूनिटी प्रदान करती रहती हैं।

 

कमजोर वायरस: पशु अथवा मानव कोशिकाओं से गुजारे जाने के बाद वायरस कमजोर हो जाता है, जब तक की यह म्यूटेट नहीं होता है। जो इसे बीमारी का कारण बनाने में सक्षम बनाता है। न्यूयॉर्क के फार्मिंगडेल स्थित कोडाजेनिक्स और भारत के पुणे स्थित वैक्सीन निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने कोरोना वायरस को कमजोर करने के लिए इसके आनुवांशिक कोड में बदलाव किया है, ताकि वायरल प्रोटीन का उत्पादन कम दक्षता से हो।