एसआईटी जांच में फंसेंगे दिल्ली सरकार के अधिकारी, कोआपरेटिव बैंक में हुआ बड़ा घोटाला

सहकारिता मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम पर लापरवाही का आरोप

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शराब घोटाला, जल बोर्ड घोटाला, डीटीसी बस घोटाला और फिर स्कूलों के क्लासरूम निर्माण में घोटाला सामने आने के बाद कट्टर ईमानदार मुख्यमंत्री और उसके विधायकों के खिलाफ जांच एजेंसियां अपनी कमर कस चुकी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पानी पी-पीकर रोजाना कोसने वाले इस कट्टर ईमानदार ने अपनी पहली सरकार भी कांग्रेस के समर्थन से ही बनाई थी। आम आदमी पार्टी को हमेशा से कांग्रेस की बी पार्टी माना जाता रहा है। परन्तु, आज हम एक ऐसे घोटाले के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जिसमें आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ने मिलकर दिल्ली की जनता का “चु” काटा है।

आज के इस घोटाले की कहानी में जो भी आरोप लगाए जाएंगे वो सभी आरोप अदालती दस्तावेजों के माध्यम से लगाए जाएंगे। इसलिए राजनीतिक चापलूस और चमचे क़िस्म के लोगों से अनुरोध है की कृपया मेरी वीडियो देखकर अपना खून ना जलाएं। तो चलिये शुरू करते हैं आज का यह खास एपिसोड …

दोस्तों, आज की कहानी में दो अहम किरदार हैं … पहला, दिल्ली की नांगलोई विधानसभा से कांग्रेस के कई दफा विधायक रह चुके दबंग नेता डॉक्टर बिजेन्द्र सिंह और दूसरी महान शख्सियत हैं सीमापुरी विधानसभा से आम आदमी पार्टी विधायक और पेशे से वकील राजेन्द्र पाल गौतम। पूर्व कांग्रेसी विधायक पर आरोप है दिल्ली की स्टेट कोआपरेटिव बैंक में चेयरमैन रहते हुए अनगिनत घोटाले करने का और आम आदमी पार्टी के विधायक पर आरोप है इन सभी घोटालों की जानकारी होते हुए आँखे मूंदे रखने का। इससे पहले की आप दर्शक मुझे कमेंट सेक्शन में गालियों से नवाज़े उससे पहले आपको बता दूँ की आपके कट्टर ईमानदार मुख्यमंत्री के चहेते विधायक राजेन्द्र पाल गौतम दिल्ली के पूर्व कोआपरेटिव मिनिस्टर रह चुके हैं और दिल्ली की स्टेट कोआपरेटिव बैंक में हुए सभी घोटाले उनके कार्यकाल में ही अंजाम दिए गए। जबकि, पूर्व कोआपरेटिव मिनिस्टर राजेन्द्र पाल गौतम ने बक़ायदा प्रेस इंटरव्यू में इस कांग्रेसी घोटालेबाज के कब्जे से इस स्टेट कोआपरेटिव बैंक को निकालने का दावा भी किया था। तो चलिये पहले आपको पूर्व कोआपरेटिव मिनिस्टर के उस दावे को सुना देते हैं।

तो दोस्तों ये थे आम आदमी पार्टी के पूर्व कोआपरेटिव मिनिस्टर राजेन्द्र पाल गौतम जिन्होंने सितम्बर 2017 में कोआपरेटिव इंडियन वेबसाइट को दिये इंटरव्यू में दावा किया था की वो यहां सालों से कोऑपरेटिव सेक्टर में कब्ज़ा करके बैठे राजनेताओं के कब्ज़े छुड़ाने आये हैं। प्रकाशित ख़बर में भी साफ़ तौर पर दिल्ली स्टेट कोआपरेटिव बैंक में कांग्रेसी नेता बिजेन्द्र सिंह की चेयरमैन के तौर पर लगातार चुने जाने पर उन्होंने जांच की बात कही थी। लेकिन बिजेन्द्र सिंह पर कोआपरेटिव मिनिस्टर का रडार होने के बावजूद ये कांग्रेसी अपनी पूरी बोर्ड के साथ साल 2020 में फिर से काबिज हो गया। इससे पूर्व 2014 में भी ये कांग्रेसी घोटालेबाज़ नैफेड में हुए एक घोटाले में रिकवरी का आरोपी रहते हुए बैंक की बोर्ड पर काबिज हो गया था।

अब आप सभी सोच रहे होंगे की हो सकता है की पूर्व कोआपरेटिव मिनिस्टर राजेन्द्र पाल गौतम को बिजेन्द्र सिंह के करतूतों की जानकारी ही नहीं हो। तो चलिये आपका यह भ्रम भी दूर किये देता हूँ। उसके लिए आपको एक और बयान सुनना चाहिए। तो दोस्तों, ये महाशय हैं ललित कुमार जिनकी शिकायत भले ही कोआपरेटिव मिनिस्टर राजेन्द्र पाल गौतम और रजिस्ट्रार कोआपरेटिव सोसाइटी ने सालों तक दबाये रखा परन्तु इसी ललित कुमार की शिकायत पर दिल्ली के उपराज्यपाल ने फैक्ट फाइंडिंग इन्क्वायरी का आदेश दिया जिसमें डायरेक्टर ऑफ़ विजिलेन्स ने बिजेन्द्र सिंह और उनके बोर्ड मेम्बर्स को कई घोटालों में लिप्त पाया और वर्तमान में इसी ललित कुमार की शिकायतों की बदौलत दिल्ली हाई कोर्ट ने 12 दिसम्बर 2023 को बिजेन्द्र सिंह के नेतृत्व वाली मैनेजिंग कमेटी को बर्खास्त करके रिटायर्ड जस्टिस माननीय वी.के. जैन को एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में इस बैंक की जिम्मेवारी सौंपी जा चुकी है। आज हम आपको दिल्ली हाई कोर्ट के इसी मुकदमे में रजिस्ट्रार कोआपरेटिव सोसाइटीज की तरफ से दाखिल हलफ़नामे में दर्ज आरोपों के बारे में बताएंगे जिसमें ललित कुमार की शिकायतों से दिल्ली सरकार के वकील ने सहमति जताई। इसलिए कट्टर ईमानदार और न्याय यात्रा आयोजित कर जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली पार्टियों के बेईमान गठजोड़ को उजागर करने वाले इस घोटाले पर आधारित इस एपिसोड को अन्त तक जरूर देखें। तो चलिये शुरू करते हैं इस कांग्रेसी घोटालेबाज़ के घोटालों की फ़ेहरिस्त …

आरोप नम्बर एक : इस कांग्रेसी घोटालेबाज़ पर पहला गंभीर आरोप है इस बैंक पर पिछले दो तीन चुनावों में धांधली करके इस बैंक की मैनेजमेंट कमेटी पर कब्ज़ा किये रखना। कोर्ट में दिल्ली सरकार के वकील की तरफ से दाखिल हलफनामे के मुताबिक़ इस कोआपरेटिव बैंक में सदस्य सोसाइटियों की वास्तविक संख्या 2414 थी जिसमें से 2000 से अधिक सदस्यों को नियमों के खिलाफ हटा दिया। मसलन 2014 में इस घोटालेबाज कांग्रेसी ने 2020 सदस्यों में से महज 283 सोसाइटियों के वोट से चुनाव करवाया। फिर 2017 में सदस्यों की संख्या 2025 हो गयी जिसमें सिर्फ 312 सदस्यों ने ही चुनाव में वोट कास्ट किया और 2020 के चुनाव में सदस्यों की संख्या महज 383 रह गयी जिसमें महज 221 सदस्यों ने चुनाव में अपना वोट कास्ट किया।

ये अजीबोग़रीब चुनाव कैसे साल 2014, 2017 और 2020 में हुए इसका जवाब तो उस वक़्त के चुनाव अधिकारी ही दे सकते हैं। सबसे मज़ेदार बात तो यह है की चुनाव अधिकारी की नियुक्ति चीफ सेक्रेटी दिल्ली सरकार करती है और पूरा चुनाव रजिस्ट्रार कोआपरेटिव सोसाइटीज की देख रेख में होता है। परन्तु, इस दफा यानी नये चुनाव अधिकारी विजय सिंह मलिक ने इस कांग्रेसी घोटालेबाज़ की यह धांधली पकड़ ली। और बैंक से ओरिजिनल मेम्बरशिप रजिस्टर मांग लिया। परन्तु, सबसे मजेदार बात यह है की बैंक के पास ओरिजिनल मेम्बरशिप रजिस्टर ही नहीं पाया गया। जिसके बाद मौजूदा चुनाव अधिकारी ने चुनाव कराने से हाथ खड़े कर लिए। इसके बाद मामला दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष गया जहां दिल्ली सरकार के वकील के हलफ़नामे के बाद सभी 2414 सदस्यों की ऑडिट और उसके बाद निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने 12 दिसम्बर 2023 को बिजेन्द्र सिंह के नेतृत्व वाली मैनेजिंग कमेटी को बर्खास्त करके रिटायर्ड जस्टिस माननीय वी.के. जैन को एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में इस बैंक की जिम्मेवारी सौंप दी।

आरोप नम्बर दो : इस कांग्रेसी घोटालेबाज़ पर दूसरा गंभीर आरोप है एक महिला कर्मचारी को अवैध तरीके से बैंक की मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त करने का। जी हां, चौकने की जरुरत नहीं है। आपके कथित कट्टर ईमानदार मुख्यमंत्री की नाक के नीचे उन्हीं के स्टेट कोआपरेटिव बैंक में अप्रैल 2016 से फर्जी एमडी अनीता रावत काबिज़ है। जिसकी नियुक्ति को डायरेक्टरेट ऑफ़ विजिलेन्स अवैध ठहरा चुकी है। फर्जी एमडी की नियुक्ति के सन्दर्भ में कथित कट्टर ईमानदार मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, कोआपरेटिव मिनिस्टर राजेन्द्र पाल गौतम, विधानसभा पेटिशन कमेटी के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज को खुद दिल्ली न्यूज़24 ने कई बार शिकायत की। परन्तु कट्टर ईमानदार सरकार ने दिल्ली न्यूज़24 की शिकायत को बस एक-दूसरे को कार्रवाई के लिए फारवर्ड करते रहे जिसके बाद दिल्ली न्यूज़24 ने बैंक प्रबंधन, आरसीएस, मुख्य सचिव दिल्ली सरकार, रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया, नाबार्ड, नैफेड और पीजीसी की लापरवाही और मिलीभगत के खिलाफ एसआईटी जांच की मांग के साथ जुलाई 2021 में जनहित याचिका दायर कर दी। जिसमें बार-बार झूठ बोलने के बाद 27 अप्रैल 2023 की सुनवाई में आरसीएस ने हलफनामा दाखिल करके हमारे सारे आरोपों को सही माना जिसमें अनीता रावत की नियुक्ति भी अवैध मानी गयी। लेकिन, फिर बैंक ने एक अलग से मुकदमा दायर किया और फिर दिल्ली सरकार के पैनल के एक अन्य वकील की मदद से अनीता रावत के मामले में स्टे हासिल कर लिया। जबकि, एलजी के आदेश पर हुई फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में दिए गए प्रावधानों के मुताबिक अनीता रावत के खिलाफ आरसीएस को पुलिस एफआईआर दर्ज कराना चाहिए था।

ख़ैर ! अब ये मुद्दा फिर से जनहित याचिका में दिल्ली न्यूज़24 उठाएगा लेकिन मार्च 2024 की निर्धारित सुनवाई में। इसलिए अब चलते हैं मौजूदा हलफ़नामे में दर्ज अन्य आरोपों की तरफ। हालांकि, इस हलफ़नामे में आरसीएस की तरफ से जनहित याचिका में उठाये गए मुद्दों की भी चर्चा की गयी है।

आरोप नम्बर तीन : इस कांग्रेसी घोटालेबाज़ पर तीसरा गंभीर आरोप नाबार्ड की तरफ से लगाया गया है। जिसे मैं आपकी सुविधा के लिए स्क्रीन पर स्क्रॉल कर देता हूँ क्यूंकि नाबार्ड ने बिजेन्द्र सिंह के नेतृत्व वाली मैनेजिंग कमेटी पर काफी गंभीर आरोप लगाये हैं।

  • मसलन, नाबार्ड की तरफ से यह कहा गया है की इस बैंक के पास पर्याप्त संख्या में लाइसेन्स ही नहीं हैं। मतलब यह की एक ब्रांच के लिए एक लाइसेंस ही इस कोआपरेटिव बैंक के पास है परन्तु बिजेन्द्र सिंह ने एक लाइसेंस पर 49 ब्रांच खोल रखे हैं। यहां यह भी दिलचस्प है की आरबीआई ने तो बाकायदा इस बैंक को सेकेण्ड सिडुअल कोआपरेटिव बैंक का भी दर्जा दे रखा है। जबकि, बिना पर्याप्त लाइसेंस के 49 ब्रांच खोलने वाले बैंक को यह दर्जा किस तरह दिया गया अब तो यह भी जांच का विषय है।
  • दूसरा, याचिकाकर्ता बैंक के पास संदिग्ध लेनदेन की पहचान करने के लिए अद्यतन केवाईसी कार्यान्वयन नीति और सॉफ्टवेयर नहीं है। बैंक के पास अनुपालन और गैर-अनुपालन वाले केवाईसी खातों की सूची नहीं है, और खाते को एनपीए के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यानी बैंक प्रबंधन पर फर्जी लोन देने और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच के लिए यह पर्याप्त आधार बन सकता है।
  • तीसरा, बैंक ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35(1) का अनुपालन नहीं किया है। अब इसका मतलब भी बता देता हूँ। आरबीआई द्वारा आम तौर पर बैंकिंग कंपनियों को या विशेष रूप से किसी भी बैंकिंग कंपनी को निर्देश जारी करना आवश्यक है, आरबीआई   समय-समय पर ऐसे निर्देश जारी कर सकता है जैसा वह उचित समझे, और बैंकिंग कंपनियों या बैंकिंग कंपनी, जैसा भी मामला हो ऐसे निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होंगे। अब यहां भी सवाल पैदा होता है की आखिर आरबीआई ने 2019 में इस बैंक को कैसे सेकेण्ड सिडुअल कोआपरेटिव बैंक का दर्जा दे दिया जबकि यह स्टेट कोआपरेटिव बैंक बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35(1) का अनुपालन ही नहीं करती।
  • चौथा, बैंक से जुड़ी चार शाखाओं में धोखाधड़ी के मामले निस्तारण हेतु लंबित है।
  • पांचवा, बैंक के पास लेखांकन नियमावली तथा खरीद मैनुअल नहीं है।
  • छठा, बैंक ने धोखाधड़ी रोकथाम के लिए एक निगरानी समिति गठन किया था, लेकिन कोई बैठक संचालित नहीं हुई।
  • सातवां, बैंक की  कोर बैंकिंग सिस्टम में डुप्लिकेट ग्राहक आईडी पायी गई, जो बैंक की विभिन्न शाखाओं में सक्रिय और क्रियाशील थे।
  • आठवां, बैंक द्वारा फिक्स्ड डिपॉजिट रिसीप्ट मैन्युअल तरीके से बनाई जाती है जबकि इसे कोर बैंकिंग सिस्टम द्वारा जारी होना चाहिए। साथ ही, ऋण और टर्म डिपॉजिट निकासी के लिए ब्याज की दर मैन्युअल तरीके से एन्ट्री की जाती है। जिसमे बड़े वित्तीय नुकसान का जोखिम है।
  • नौवां, बैंक की शाखाओं में कंप्यूटर पुराने हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम भी बिना लाइसेंस वाले इस्तेमाल होते हैं जिनसे साइबर फ्रॉड का खतरा बढ़ जाता है। बैंक के पास ना तो आईटी संसाधन खरीद के लिए कोई पॉलिसी है और ना ही बैंक नये बैंकिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है।
  • दसवां, मैनेजिंग डायरेक्टर की नियुक्ति दिल्ली कोआपरेटिव सोसाइटी रूल के प्रावधान संख्या 58 का उल्लंघन करके हुई है। बैंक प्रबंधन ने मैनेजिंग डायरेक्टर की नियुक्ति के पूर्व न तो सरकार से कोई अनुमति ली और ना ही सलाह मशविरा किया। जबकि, जनहित याचिका में नाबार्ड ने बाकायदा हलफनामा देकर कहा है कि एमडी की नियुक्ति से उसका कोई सरोकार नहीं। दोस्तों, इसमें सबसे मजेदार बात तो यह की अनीता रावत से पूर्व के तीन एमडी लगातार नाबार्ड से प्रतिनियुक्ति पर आते रहे हैं। और तो और इस बैंक की बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में नाबार्ड का एक प्रतिनिधि भी चुना जाता है हर बार। जब अनीता रावत को बिजेन्द्र सिंह के नेतृत्व वाली मैनेजमेंट ने एमडी बनाया था तब भी नाबार्ड के ए.के. मोहन्ती इस मैनेजमेंट में नाबार्ड की तरफ से प्रतिनिधि थे। यानी हमाम में सभी के सभी …  समझ गए। समझ ही गए होंगे।
  • ग्यारहवां, 19 दिसंबर 2022 को आरबीआई ने इस कोआपरेटिव बैंक पर बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 के सेक्शन 27, 35 ए, सेक्शन 46 और 47 ए के उल्लंघन के लिए 30 लाख 85 हजार का जुर्माना भी लगाया था।
  • बारहवां, बैंक ने पांच शाखाओं के कर्मचारियों द्वारा अंजाम दिये गए धोखाधड़ी और गबन के मामलों की फाइनेंसियल मैनेजमेंट सिस्टम में शिकायत नहीं की। जबकि, नाबार्ड ने पूर्व के ऑडिट रिपोर्ट में इस बारे में बैंक को ताकीद की थी। यानी, जनहित याचिका में बैंक की तरफ से नाबार्ड से बेस्ट ऑडिट मिलने वाली बात भी कोरी गप्पबाज़ी ही थी।
  • तेरहवां, बैंक एनपीए का वर्गीकरण भी मैनुअल तरीके से करता है। जांच में तो कुछ लोन एकाउंट्स का एनपीए वर्गीकरण ही Income Recognition and Asset Classification नॉर्म्स के खिलाफ पाया गया।
  • चौदहवां, बैंक प्रबंधन की लागत 1.5% की जगह 3.74% है, जोकि निर्धारित बेंचमार्क से कहीं अधिक पाया गया।

दोस्तों, इस एपिसोड में इतना ही … पर कहानी अभी बाकी है। आज सिर्फ कुछ मुख्य आरोपों की चर्चा की है। अगले एपिसोड में बताऊंगा की कैसे कथित कट्टर ईमानदार सरकार ने इस कांग्रेसी घोटालेबाज़ को लगातार झूठ बोलकर बचाने की साजिश रची और जब जनहित याचिका दायर हुई तो कैसे कैसे अदालतों में झूठे हलफनामे पेश किये गए। लेकिन, जब दिल्ली न्यूज़24 ने दस्तावेजों के आधार पर काउंटर करना शुरू किया तो कथित कट्टर ईमानदार सरकार के कल-बल ढीले पड़ गये। यदि आपको हमारा यह प्रयास पसन्द आया हो तो जनहित में इस वीडियो को अधिक से अधिक शेयर करें ताकि कथित कट्टर ईमानदार और न्याय यात्रा निकालकर जनता को गुमराह करने वालों का असली घिनौना चेहरा जनता जनार्दन पहचान सके। तो मिलते हैं अगले एपिसोड में तब तक के लिए जय हिन्द, जय भारत।

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