Delhi Coronavirus News Update: कातिल कोरोना से जमकर लड़ा राजीव गांधी सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल

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नई दिल्ली Delhi Coronavirus News Update: ताहिरपुर स्थित राजीव गांधी सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल पर सफेद हाथी का तमगा लगा हुआ था। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हुए इस सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल में लोगों को वह सुविधाएं नहीं मिल पा रही थीं, जिसके लिए इसे बनाया गया था। एकमात्र हृदय रोग का विभाग ही संपूर्ण रूप से कार्य कर रहा था। इसके अलावा कुछ विभाग हाल ही में शुरू किए गए थे, लेकिन कोरोना के संक्रमण काल में इस अस्पताल ने राजधानी दिल्ली के बड़े-बड़े अस्पतालों को पीछे छोड़ दिया।

दिल्ली सरकार द्वारा अस्पतालों में कोरोना से मौत के मामलों का विश्लेषण करने के लिए गठित समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, जून के महीने में जब कातिल कोरोना हर अस्पताल में कहर बनकर टूट रहा था। तब भी इस अस्पताल में मौत की दर छह फीसद के आसपास ही थी।

बता दें कि कोरोना से संक्रमित हुए स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पहले इसी अस्पताल में 15 जून को दाखिल हुए थे।मरीजों को तीन श्रेणियों बांटकर शुरू किया गया इलाजअस्पताल के निदेशक डॉ. बीएल शेरवाल इसका श्रेय अस्पताल के डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को देते हैं जिन्होंने शुरू से ही इलाज के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान दिया। सबसे पहले यहां मरीजों को तीन श्रेणियों में बांटा गया। संदिग्ध मरीजों को अलग वार्ड में रखा गया। संक्रमित मरीजों के लिए अलग वार्ड में व्यवस्था की गई। इसके अलावा गंभीर मरीजों को तुरंत आइसीयू में या वेंटिलेटर पर रखा गया। संक्रमित मरीजों में भी उन पर ध्यान अधिक दिया गया जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थे।

डॉ. बीएल शेरवाल ने बताया कि हमारी कोशिश यह थी कि किसी की मौत वार्ड में न हो और वह वेंटिलेटर तक न पहुंचे। यानी समय रहते मरीज को आइसीयू (इंटेंसिव केयर यूनिट) में पहुंचा दिया जाए। डॉ. अजीत जैन की देखरेख में इसमें हम काफी हद तक सफल रहे।

डॉ. अजीत जैन के बारे में बता दें कि कोविड अस्पताल घोषित होने के बाद वह अपने घर नहीं गए। करीब साढ़े चार महीने से वह अस्पताल को ही उन्होंने घर बना लिया। मरीजों में विश्वास जगाने की कोशिश की गईडॉ. अजीत जैन ने बताया कि जब कोरोना का दौर शुरू हुआ तो खौफ हर किसी के मन में था। इसलिए शुरू से ही हमने मरीजों में विश्वास जगाने की कोशिश की। मरीजों को यहां आने के बाद यह महसूस नहीं होने दिया गया कि वे सरकारी अस्पताल में हैं।

जून महीने में हमारे पास 45 आइसीयू थे। इनमें 32 डॉक्टरों सहित करीब डेढ़ सौ स्वास्थ्यकर्मियों की टीम तैनात थी। चार पाली में यहां स्वास्थ्यकर्मी छह-छह घंटे पीपीई किट में तैनात रहते थे। इसकी वजह से आइसीयू में निगरानी कड़ी थी। हर मरीज पर ध्यान दिया गया। वार्ड में भर्ती मरीजों को घर जैसा माहौल देने की कोशिश की गई। उनके लिए खान-पान का बेहतर प्रबंध किया गया। खेल सामग्री उपलब्ध कराई गई। नियमित कसरत और योग शुरू कराया गया। इससे मरीजों का बीमारी से ध्यान बीमारी से हटा और उनके स्वस्थ होने की संभावनाएं बढ़ीं।