Dahaad Review: महिलाओं के प्रति अपराध की इस कहानी में विजय वर्मा की शानदार परफॉरमेंस

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वेब सीरीज – दहाड़

निर्देशक – रीमा कागती और रुचिका ओबेरॉय

निर्माता – एक्सेल एंटरटेनमेंट और टाइगर बेबी

कलाकार – सोनाक्षी सिन्हा,विजय वर्मा,गुलशन देवैया,सोहम शाह और अन्य

प्लेटफार्म – अमेज़न प्राइम वीडियो

रेटिंग -तीन

क्राइम-थ्रिलर जॉनर ओटीटी का पसंदीदा जॉनर रहा है. इसमें ऐसी कई कहानियां रही हैं, जिनकी कहानी के केंद्र में साइको किलर रहे हैं. दहाड़ इसी की अगली कड़ी है, लेकिन यहां इसे अलग तरह से पेश किया गया है. यह सीरीज साइको किलर को ढूंढती नहीं है, क्योंकि वह तो सामने है, लेकिन पुलिस और किलर के बीच चूहे-बिल्ली वाला खेल जारी है. वैसे यह सिर्फ मर्डर मिस्ट्री भर नहीं है, बल्कि समाज के कई मुद्दों पर भी रोशनी डालती है, जो इस सीरीज को खास बनाता है. कलाकारों के शानदार परफॉरमेंस वाली इस कहानी में थोड़ा और ट्विस्ट एंड टर्न जोड़ा जाता और एडिटिंग पर काम होता, तो यह एक सिर्फ मनोरंजनक ही नहीं बल्कि यादगार सीरीज बन सकती थी.

Dahaad Review: सीरियल किलिंग की है कहानी

सीरीज की कहानी को राजस्थान के मंडावा पुलिस स्टेशन से शुरू होती है, जहां कुछ दबंग लोग पुलिस स्टेशन के बाहर हंगामा कर रहे हैं,क्योंकि एक मुस्लिम लड़के और ठाकुर की बेटी में प्यार हो गया है और दोनों शादी करने के लिए घर से भाग गए हैं. लड़की के परिवार वाले अपने फायदे के लिए इसे लव जिहाद का रंग दे रहे हैं. ठाकुर की बेटी और मुस्लिम युवक को ढूंढते हुए पुलिस ऑफिसर अंजलि भाटी (सोनाक्षी सिन्हा) को ये दो प्रेमी तो मिल जाते हैं, लेकिन 29 लड़कियों की गुमशुदगी की भयावह सच्चाई सामने आ जाती है. जिससे हर कोई अब तक अनजान था.

यह सच भी सामने आता है कि एक सीरियल किलर घूम रहा है, जो लड़कियों को प्यार के जाल में फंसाकर उनकी हत्या कर देता है, लेकिन हत्या ऐसी, जो आत्महत्या सी लगती है. एपिसोड़ बढ़ने के साथ अंजलि की शक की सुई आनंद (विजय वर्मा) तक बढ़ तो जाती है, लेकिन उसके पास कोई सबूत नहीं है. क्या अंजलि जरूरी सबूत जुटा पाएगी कि आनंद इन लड़कियों की हत्या क्यों की है? वह हत्याओं को आत्महत्या में कैसे बदल देता है?क्या आनंद और लड़कियों को अपना शिकार बनाने वाला है. क्या अंजलि उन्हें बचा पाएगी और आनंद को सलाखों तक पहुंचा पाएगी. यही आगे की कहानी है.

Dahaad Review: स्क्रिप्ट की खूबियां और खामियां

सीरीज के पहले दो एपिसोड कहानी को बिल्डअप करते ही नजर आए हैं.सीरीज मूल कहानी पर तीसरे एपिसोड़ में आती है और उसके बाद सीरीज का रोमांच भी बढ़ जाता है, जो छठे एपिसोड तक पूरी तरह से आपको बांधे भी रखता है.आखिर के दो एपिसोड़ में कहानी की पकड़ ढीली हुई है. पुलिस और सीरियल किलर के बीच चूहे बिल्ली का खेल राजस्थान से मुंबई और फिर वहां से गोवा पहुंच जाता है, लेकिन रोमांच का लेवल वह कहानी में नहीं जोड़ पायी है, जिसकी जरूरत थी. आनंद का अतीत सामने आता है,लेकिन वह उसके सीरियल किलिंग के मोटिवेशन से मेल नहीं खा पाता था, जो थोड़ा अटपटा सा लगता है.

आमतौर पर फिल्मों और सीरीज में जातिगत भेदभाव की बात सशक्त तरीके से रखी जाती है, लेकिन नायक या नायिका को ऊंची जाति का ही दिखाया जाता रहा है,लेकिन इस मामले में यह सीरीज अलहदा है. यहां नायिका नीची जाति की है और वह अपने किसी से कम आंकने नहीं देती हैं. सीरीज समाज में जातिगत भेदभाव के गहरी पैठ को कई दृश्यों और संवादों में सामने लेकर आती है.सीरीज लव जिहाद का अलग पक्ष सामने लेकर आती है, जो मौजूदा चर्चित द केरल स्टोरी से मेल नहीं खाता है. इसके साथ ही यह सीरीज दहेज, गरीबी, लड़कियों पर शादी के दबाव, लड़की और लड़के में भेदभाव, पुलिस के काम करने के तरीके जैसे ऐसे कई मुद्दों को मुखरता से सामने रखती है.सीरीज एक सीरियल किलर की कहानी है, लेकिन पूरे सीरीज में कहीं भी खून खराबा या हिंसा नहीं है.जो इस सीरीज को ऐसे विषयों पर बनने वाले बाकी के प्रोजेक्ट्स से अलग करती है. लगभग आठ घंटे की इस कहानी में सोनाक्षी शादी, कमिटमेंट, प्यार से क्यों बचती है. यह बात कहीं भी कहानी में नहीं आ पायी है, जो अखरता है. सीरीज में सोहम शाह का किरदार अचानक से बदल कैसे जाता है, यह बात भी कहानी में प्रभावी ढंग से सामने नहीं आ पायी है. सीरीज के कमजोर पहलुओं में इसकी लम्बाई भी है. सीरीज फिल्म की कहानी ज्यादा खिंच गयी है. यह कहानी पांच से छह एपिसोड़स में भी कहीं जा सकती थी.

विजय वर्मा और सोनाक्षी सिन्हा की शानदार परफॉरमेंस

फिल्म दबंग से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली सोनाक्षी सिन्हा ने इस सीरीज से अपना डिजिटल किया है और अपनी इस भूमिका में वह पूरी तरह से रची-बसी नजर आयी हैं. किरदार की बोलचाल से बॉडी लैंग्वेज तक सबकुछ उन्होंने आत्मसात किया है. गुलशन देवैया और सोहम शाह का काम भी अच्छा है. वे अपनी-अपनी मौजूदगी से इस सीरीज में एक अलग ही रंग भरते हैं. इस सीरीज में अभिनय की दहाड़ अगर सबसे ज्यादा किसी की गूंजी है, तो वह विजय वर्मा की है. डार्लिंग्स के बाद वह एक बार फिर से नेगटिव भूमिका में है, लेकिन किरदार को उन्होंने बिल्कुल ही अलग ढंग से जिया है. सीधा-साधा प्रोफ़ेसर तो कभी शातिर सीरियल किलर बहुत सहजता के साथ अपने किरदार के ट्रांसफार्मेशन को वह परदे पर लेकर आए हैं. बाकी के किरदारोंने भी अपनी-अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.

Dahaad Review: ये पहलुओं भी हैं खास

सीरीज के दूसरे पहलुओं पर बात करें तो इस सीरीज की पूरी शूटिंग में राजस्थान में हुई है, जिस वजह से यह सीरीज वास्तविकता के करीब लगती है. कैमरे में बहुत ही खूबसूरती से राजस्थान को कहानी में समाहित किया गया है. सीरीज के संवाद कहानी के अनुरूप हैं. सीरीज का म्यूजिक भी अच्छा बन पड़ा है.

Dahaad Review: देखें या ना देखें

यह क्राइम-थ्रिलर सीरीज कलाकारों के उम्दा परफॉरमेंस और इसके ट्रीटमेंट की वजह से मनोरंजन करने में कामयाब है, इसलिए एक बार देखी जा सकती है.

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