Coronavirus काल में संकट मोचक बना आयुर्विज्ञान, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मिली मदद

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भारतीय जीवन दर्शन का आधार भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति है। भारतीय आयुर्विज्ञान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘आयुर्वेद’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थापित तथ्य है कि संपूर्ण भारतीय ज्ञान-विज्ञान वेदों की ऋचाओं में समाहित है। इस क्रम में अथर्ववेद के उपांग के रूप में आयुर्वेद की मान्यता है। यह आयुर्विज्ञान मात्र एक चिकित्सा पद्धति के रूप में सीमित नहीं है, अपितु यह संतुलित जीवनयापन की पद्धति है, जिसका मूल उद्देश्य लोगों के स्वास्थ्य का संरक्षण है।

आहार-विहार, रसायन का सेवन, नियमित दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतुचर्या का पालन तथा निर्दिष्ट सामाजिक समरसता के सूत्रों का अनुपालन सुनिश्चित कर कोई भी व्यक्ति अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को विकार रहित बनाए रख सकता है। प्रसन्नता, संतोष एवं गर्व का विषय है कि यही भारतीय आयुर्विज्ञान, सभ्यता एवं संस्कृति आज हम भारतीयों के लिए इस कोरोना कालीन संकट में संकट मोचक के रूप में स्थापित हुई है।


भारत ने संक्रमण-मृत्यु के सभी अनुमानों को गलत साबित किया: भारतीयों में कोरोना के संक्रमण की दर में अपेक्षाकृत कमी, सुधार एवं पुन: स्वस्थ्य होने के प्रतिशत में तुलनात्मक वृद्धि से विश्व स्वास्थ्य संगठन चकित है। यही कारण है कि दुनियाभर के वैज्ञानिक भारत सरकार के आयुष मंत्रालय से मिलकर शोध करने के प्रस्ताव दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना संकट की शुरुआत में ही राष्ट्र के नाम संदेश, मन की बात कार्यक्रम और समृद्ध एवं विशेषज्ञ भारत के सम्मेलन में आयुर्वेद एवं योग में विश्वास जताते हुए लोगों को आयुर्वेदीय औषधियों, रस, रसायन के साथ दैनिक जीवन में काढ़ा (क्वाथ) का सेवन शामिल कर अपनी प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) में वृद्धि कर इसके संक्रमण से बचाव का प्रबंध करने की अपील की थी। एक सक्षम, दूरदर्शी व आत्मविश्वास से भरपूर राष्ट्रीय नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए देश की जनता ने प्रधानमंत्री के सुझावों को स्वीकार किया।


भारत ने विश्व एवं कुछ भारतीय वैज्ञानिकों की पूर्वानुमानित सांख्यिकी, जिनमें संभावित संक्रमितों और मौतों की संख्या के अनुमान डराने वाले थे, उन्हें पूरी तरह गलत साबित कर दिया। संक्रमितों की जो संख्या दस करोड़ व मृत्यु संख्या दस लाख पार करने वाली थी, अभी इसके दशांश के आसपास ही है। देशवासियों की जीवन रक्षा की इस आदर्श उपलब्धि का श्रेय भारतीय आयुर्वेद, भारतीय जीवनशैली, केंद्र सरकार, देश के समाचार पत्रों एवं अंतत: भारतीय नागरिकों को है, जिसने भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान में पुन: विश्वास व्यक्त किया। फलस्वरूप हम भारतीय आज विश्व में कोरोना संक्रमण काल में सर्वाधिक सुरक्षित हैं।


आयुष काढ़ा को औषधि के रूप में मान्यता देने पर विचार: कोरोना संक्रमण अवधि में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार ने अपनी तकनीकी एवं सरंचनात्मक क्षमता का सराहनीय प्रदर्शन किया है। प्रधानमंत्री के दिशा निर्देश के अनुसार मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने त्वरित गति से आयुष काढ़ा के घटक (तुलसी, मरीच, शुंठी एवं दालचीनी) एवं इनके पारस्परिक अनुपात को अप्रैल 2020 में ही अधिसूचित किया साथ ही साथ पूरे राष्ट्र में राज्य स्तर पर कार्यरत आयुर्वेदीय औषधि निर्माण लाइसेंस प्रदायी संस्थाओं को यह निर्देश दिया कि आयुष काढ़ा के औद्योगिक उत्पादन की इच्छुक आयुर्वेदीय औषधि निर्माणशालाओं को यथाशीघ्र लाइसेंस प्रदान करें ताकि बाजार में आयुष काढ़ा की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में रहे। यहां उल्लेखनीय है कि अक्टूबर-नवंबर में आयुष मंत्रालय के अनुषांगिक शोध संस्थाओं ने आयुष काढ़ा के ऊपर समस्त वैज्ञानिक विश्लेषण पूर्ण कर इसे आयुर्वेदिक फार्मकोपीय समिति से अनुमोदित भी करा लिया है। इस अनिवार्यता की पूर्ति के पश्चात भारत सरकार द्वारा आयुष काढ़ा को भी एक औषधि के रूप में वैश्विक मान्यता दिलाने के प्रयास में सहायता होगी।


सिरसादी क्वाथ एवं पंचगव्य से निर्मित औषधियों का कोरोना पर प्रभाव का अध्ययन : काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में आयुर्वेदीय एवं आधुनिक चिकित्सा विधा के चिकित्सकों द्वारा संयुक्त रूप से अश्वगंधा, यष्टिमधु, चंद्रोदय वटी, सिरसादी क्वाथ एवं पंचगव्य से निर्मित आयुर्वेदीय औषधियों का कोरोना के मरीजों को ठीक करने और संक्रमण से बचाव में इनकी क्षमता पर अध्ययन किया जा रहा है। अखिल भारतीय आयुर्वेदीय संस्थान, नई दिल्ली, चौधरी ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेदीय संस्थान, नई दिल्ली, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर, आयुर्वेद विश्वविद्यालय जोधपुर, गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जामनगर, एसडीएम आयुर्वेदीय महाविद्यालय हासन एवं उडुपी, राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय मैसूर, पंडित मुंशी लाल शर्मा आयुर्वेदीय शोध संस्थान, भोपाल सहित अनेकानेक आयुर्वेदीय संस्थाओं ने इस कोरोना संक्रमण काल में लोगों की प्रशंसनीय सेवा की है। यहां उचित होगा कि हम अनेक सामाजिक सेवा संगठनों, लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्तिगत आयुर्वेदीय चिकित्सकों एवं प्रिंट मीडिया का राष्ट्र की सेवा के लिए आभार व्यक्त करें।


दावों की सत्यता पर रखनी होगी सतर्क नजर : विगत कई माह में आयुर्वेदीय औषधियों की बिक्री देखें। इनमें भारी वृद्धि आंकी गई है। कहीं-कहीं तो यह 50 से 73 फीसद तक ज्यादा है। भारतीय बाजारों में आयुर्वेदीय प्रतिरोध वर्धक (इम्युनिटी बूस्टर) दवाओं की एक सुनामी सी आ गई है। हमें इन दावों पर सजगता बरतनी होगी। आंख बंद करके सिर्फ ‘आयुर्वेद’ नाम अंकित देखकर विश्वास करना हानिकारक हो सकता है। अत: प्रामाणिक औषधि निर्माता के द्वारा निर्मित आयुर्वेदीय औषधियों का सेवन, आयुर्वेद चिकित्सक के परामर्श के अनुसार ही करें। यह भी एक विडंबना है कि मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति के कारण कई ऐसे उत्पाद भी बाजार में उतार दिए गए हैं, जिसमें उनके दावों की पूर्ति की संभावना दूर तक नहीं है। आयुष मंत्रालय ने नागरिकों से अनुरोध किया है कि वे ऐसे अतिशयोक्ति वाले दावों के साथ बेची जा रही औषधियों और चुटकी बजाकर कोरोना को ठीक करने वाले भ्रामक दावों के साथ बेची जा रही दवाओं से बचें।


महामारी से बचाव को खंगाल रहे गूगल सर्च : आयुर्वेद से कोरोना संक्रमण का बचाव किया जा सकता है या नहीं, इस पर गूगल सर्च करने वालों की संख्या में 10-12 प्रतिशत की वृद्धि दर सामने आई है। यह संकेत बताते हैं कि आम लोगों के साथ-साथ विशिष्ट लोगों तक आयुर्वेद की पहुंच दिनोंदिन बढ़ रही है। हल्दी, मरीच, दालचीनी, तेजपत्ता आदि की मांग यूरोपीय एवं खाड़ी देशों में बढ़ी है। आयुर्वेद की इस विशिष्ट उपयोगिता को प्रमाणित करते हुए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, गुजरात आदि प्रदेश सरकारों ने आयुष काढ़ा का व्यापक वितरण कराने के साथ विज्ञापन एवं अनेक जन जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए हैं। उत्तर प्रदेश आयुष सोसायटी के माध्यम से ‘आयुष आपके द्वार’ कार्यक्रम जनसेवा में प्रभावी है।


केरल, बंगाल, महाराष्ट्र जैसे आयुर्वेद चिकित्सा केंद्रों की भूमिका पर सवाल : यह चिंता का विषय है कि केरल, पश्चिम बंगाल एवं महाराष्ट्र जैसे आयुर्वेद चिकित्सा केंद्रों में राज्य सरकारों ने आयुर्वेदीय चिकित्सकों को कोरोना संक्रमण के रोकथाम एवं चिकित्सा हेतु अपेक्षित अनुमति नहीं प्रदान की है। भारतीय ज्ञान विज्ञान का प्रतिरूप ‘आयुर्वेद’ अपने मौलिक सिद्धांतों यथा त्रिदोष, पंचमहाभूत, सप्त धातु, दोष दुष्य समुरछना, आवरण, संप्राप्ति विघटन के आधार, दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या एवं प्रसंस्करण के पश्चात आयुर्वेदीय औषधि के रूप में प्रयुक्त औद्भिद (वनस्पति) खनिज एवं जंगम (जीव) द्रव्यों के गुण कर्म के अनुरूप मानव के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को सरक्षित करने में नैर्सिगकता के साथ सक्षम है। आयुर्वेद की यह सार्थकता सार्वभौमिक एवं वैश्विक है।


आज के मापदंडों पर आयुर्वेदीय औषधियों का परीक्षण : प्रश्न करना आज के वैज्ञानिक चिंतन का महत्वपूर्ण अंग है। यही कारण है कि आयुर्वेदीय औषधियों के गुणवत्ता मानकीकरण के सिद्धांतों के क्रम में आयुष मंत्रालय ने पहल की है। अश्वगंधा, यष्टिमधु, पिप्पली एवं आयुष 64 जैसी आयुर्वेदीय औषधियों पर देशभर में 112 संस्थाओं द्वारा वर्तमान के निर्धारित मापदंडों पर परीक्षण किए जा रहे हैं। इन चिकित्सकीय परीक्षणों (क्लिनिकल ट्रायल) को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) की शीर्ष संस्था क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री ऑफ इंडिया (सीटीआरआइ) द्वारा मंजूरी दी गई है।

ये परीक्षण आयुर्वेदीय संस्थाओं के साथ-साथ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की संस्थाओं में भी किए जा रहे हैं। आयुष मंत्रालय ने इन शोधकर्ताओं को करोड़ों की धनराशि उपलब्ध कराई है। इन सभी परीक्षणों के आंकड़ों (डाटा ) का विश्लेषण करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उपाध्यक्ष प्रो. भूषण पटवर्धन की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है। इन परीक्षणों के प्रारंभिक परिणाम सकारात्मक एवं भारतीय आयुर्वेद के संहिताओं यथा चरक संहिता, अष्टांग हृदय आदि आर्ष ग्रंथों में निर्दिष्ट परिणामों से साम्यता लिए हुए हैं।