कोरोना दूसरी बीमारियों से पीड़ित मरीजों के इलाज में बड़ा बाधक बन रहा है

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नई दिल्ली : कोरोना दूसरी बीमारियों से पीड़ित मरीजों के इलाज में बड़ा बाधक बन रहा है। आंखों के मरीज भी इससे अछूते नहीं है। स्थिति यह है कि अस्पतालों में मोतियाबिंद व कालामोतिया जैसी बीमारियों की सर्जरी 90 फीसद तक घट गई है। अंधेपन से पीड़ित बच्चे व बड़े की पिछले चार माह से कॉर्निया प्रत्यारोपण सर्जरी नहीं हो पा रही है। डॉक्टर कहते हैं कि लॉकडाउन में समय पर इलाज नहीं मिल पाने के कारण कई लोगों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। लॉकडाउन के बाद भी स्थिति पटरी पर नहीं आई है। ऐसे में डॉक्टर कहते हैं कि देश में अंधेपन के मामले बढ़ सकते हैं।

एम्स के आरपी सेंटर द्वारा वर्ष 2015 से 2018 के बीच किए गए राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक देश में 1.99 फीसद लोग अंधेपन से पीड़ित हैं। इसका सबसे बड़ा कारण मोतियाबिंद है। वर्ष 2020 में अंधेपन को कम कर 0.3 फीसद पर लाने का लक्ष्य है। कोरोना के संक्रमण के कारण इस लक्ष्य को ठेस पहुंच सकता है। एम्स के आरपी सेंटर के प्रोफेसर व राष्ट्रीय नेत्र बैंक के प्रभारी डॉ. जेएस तितियाल ने कहा कि तीन माह तक आंखों की रूटीन सर्जरी बंद रही। एक माह से सर्जरी शुरू हुई है, लेकिन पहले के मुकाबले पांच से 10 फीसद ही सर्जरी हो पा रही है। कॉर्निया प्रत्यारोपण बिल्कुल बंद है, क्योंकि कॉर्निया दान नहीं हो रहा है। कॉर्निया दान के लिए कोविड रिपोर्ट नेगेटिव होना जरूरी है।

एम्स में चार माह में 700 मरीजों की कॉर्निया प्रत्यारोपण की सर्जरी टल चुकी है। एम्स में हर साल 2000-2500 कॉर्निया प्रत्यारोपण व टिश्यू ग्राफ्टिंग सर्जरी होती थी। इस साल मार्च के बाद कॉर्निया प्रत्यारोपण सर्जरी बंद है। अब कॉर्निया दान शुरू कराने की कोशिश की जा रही है। फिर भी कॉर्निया प्रत्यारोपण सर्जरी सामान्य होने में एक साल का समय लग सकता है। आंखों की पुतली में संक्रमण से पीड़ित 50-60 टिश्यू ग्राफ्ट सर्जरी की गई है। इससे उन मरीजों की आंख बच गई, लेकिन ऐसे मरीजों को नजर नहीं आती।

उन्होंने कहा कि पूरे देश में दुविधाजनक स्थिति है, क्योंकि कॉर्निया दान के लिए डोनर नहीं मिल रहे। समस्या यह भी है कि कोरोना की आरटीपीसीआर की जांच रिपोर्ट आने में ही 24-48 घंटा समय लग जाता है। इतने देर बाद मृतक से कॉर्निया दान नहीं कराया जा सकता। देश में हर साल 40 हजार कॉर्निया प्रत्यारोपण की सर्जरी होती है। पिछले चार माह में देश भर में 2000 भी सर्जरी नहीं हो पाई। उन्होंने कहा कि देश भर में हर साल 40 लाख से 50 लाख मोतियाबिंद की सर्जरी होती थी। इस साल यह आंकड़ा बहुत कम रहने वाला है। एम्स में ही हर साल 20 हजार मोतियाबिंद की सर्जरी होती है। इस बार करीब छह हजार तक मोतियााबिंद की सर्जरी हो पाएगी। हालांकि इस बीमारी की सर्जरी में इमरजेंसी नहीं होती, लेकिन काला मोतिया व आंख का पर्दा खराब होने से पीडि़त व्यक्ति का समय पर ऑपरेशन न हो तो रोशनी जा सकती है। कुछ ऐसे लोग हैं जिनको इलाज नहीं मिलने से आंख की रोशनी चली गई।

अपोलो अस्पताल की नेत्र विशेषज्ञ डॉ. उमा माल्या ने कहा कि पहले के मुकाबले 10 फीसद ही सर्जरी हो पा रही है, लेकिन इमरजेंसी सर्जरी हो रही है। लॉकडाउन में यह देखा गया कि काला मोतिया व आंखों का पर्दा खराब होने से पीड़ित कई मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाने के कारण उनकी रोशनी चली गई। तीन बच्चों सहित चार मरीज देर से अपोलो में इलाज के लिए आए थे, जिनकी रोशनी चली गई। इनकी आंख का पर्दा फट गया था। एक बच्चे को तो उत्तर दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर रोक लिया गया था।