प्रोपेगैंडा बनाम रियलिटी की बहसबाजी से जूझता सिनेमा, फिल्म प्रोड्यूसर विपुल शाह ने कही ये बात

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बीते कुछ हफ्तों से ‘द केरल स्टोरी’ की सुर्खियों में है. ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद ‘द केरल स्टोरी’की जबरदस्त कामयाबी ने इंडस्ट्री को दो विचारधाराओं में बांट दिया है. एक विचारधारा ऐसी फिल्मों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश को सांप्रदायिक बनाने और लोगों को विभाजित करने की मुहिम करार देती है, तो वहीं दूसरी विचारधारा ऐसी फिल्मों को सपोर्ट करते हुए इन्हें वास्तविक जीवन की चौंकाने वाली कहानियों पर आधारित बताती है. बीते कुछ सालों पर गौर करें, तो प्रोपेगैंडा बनाम वास्तविकता की बहसबाजी से ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिटर’, ‘ताशकंद’,‘इंदु सरकार’ जैसी फिल्में गुजरीं. वैसे आने वाले समय में यह खाई और गहरी होने वाली है, क्योंकि ऐसी फिल्मों की लंबी फेहरिस्त है. ऐसी ही फिल्मों की पड़ताल करता उर्मिला कोरी का यह खास आलेख.

हम दो हमारे बारह

बीते साल अनु कपूर की ‘हम दो हमारे बारह’ का पोस्टर रिलीज कर फिल्म की घोषणा हुई थी. घोषणा के साथ ही फिल्म ने विवाद को बढ़ावा दे दे दिया. इस पोस्टर को साफतौर पर इस्लामोफोबिया करार दे दिया गया था, क्योंकि पोस्टर ऐसा कुछ था, जिसमें देश में मुस्लिमों की बढ़ती आबादी की ओर ध्यान दिलाया जा रहा है. इस पर फिल्म के निर्देशक कमल चंद्रा ने कहा था, ‘‘मुझे लगता है कि सिनेमा अपनी सोच और भावनाएं को व्यक्त करने का सबसे अच्छा माध्यम है. जनसंख्या विस्फोट गंभीर मसला है. मैं सब लोगों से गुजारिश करता हूं कि इसे मुद्दा न बनाएं.

द बागेश्वर सरकार

बीते एक साल में बागेश्वर धाम वाले बाबा धीरेंद्र शास्त्री, हिंदुत्व का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं. ऐसे में उन पर फिल्म बनाने की घोषणा लाजमी थी. लव जिहाद पर फिल्म ‘द कन्वर्जन’ बना चुके निर्देशक विनोद तिवारी ने हाल ही में ‘द बागेश्वर सरकार’नाम की एक फिल्म बनाने की घोषणा की है. फिल्म को हिंदी के साथ विभिन्न भाषाओं में निर्माण किया जा रहा है.निर्देशक विनोद तिवारी बताते हैं कि यह फिल्म बागेश्वर धाम सरकार के पीठाधीश्वर पूज्य श्री श्री धीरेंद्र शास्त्री जी के जीवन पर आधारित है.

टीपू

अबतक के स्कूल-कॉलेज के पढ़ाये गये इतिहास के पाठ्यक्रम और टीपू सुल्तान के टीवी शो ने मैसूर के शासक टीपू सुल्तान को एक स्वतंत्रता सेनानी और एक सक्षम प्रशासक के रूप में ही परिभाषित किया था, पर ‘पीएम नरेंद्र मोदी’, ‘बाल नरेन’ जैसी फिल्में बना चुके निर्माता संदीप सिंह ने हाल ही में टीपू सुल्तान पर फिल्म ‘टीपू’ की घोषणा की और एक अनाउंसमेंट वीडियो जारी किया, जिसमें टीपू सुल्तान को एक कट्टर शासक के तौर पर दिखाया गया है. इस ऐलान के साथ ही यह फिल्म भी चर्चा में आ गयी. निर्देशक पवन शर्मा ने अपनी इस फिल्म का पक्ष रखते हुए कहते हैं, ‘‘हमें स्कूल में टीपू सुल्तान के बारे में जो पढ़ाया जाता है, वह गलत जानकारी है. मुझे जब हकीकत मालूम पड़ा, तो मैं पूरी तरह से हिल गया. टीपू सुल्तान की इस्लामी कट्टरता उनके पिता हैदर अली खान की तुलना में बहुत खराब थी.’’

स्वतंत्र वीर सावरकर

स्वतंत्रता संग्राम के विवादित चेहरों में से एक नाम वीर सावरकर का रहा है. देश की दो बड़ी राजनीति पार्टियों में इस नाम पर बहसबाजी आम है. यह बहसबाजी और बढ़ने वाली है, क्योंकि ‘टीपू’फिल्म के निर्माता संदीप सिंह अभिनेता रणदीप हुड्डा के साथ वीर सावरकर पर भी फिल्म बना रहे हैं. फिलहाल, फिल्म की शूटिंग चल रही है. फिल्म के निर्माता संदीप सिंह की मानें, तो आजादी के इतिहास की अभी पूरी बात जाननी बाकी है. वीर सावरकर एकमात्र ऐसे इंसान थे, जो बंटवारे को रोक सकते थे. यह फिल्म इन पहलुओं के साथ उनके व्यक्तित्व के खास पहलुओं से भी रूबरू करवायेगी.

फिल्म प्रोड्यूसर विपुल शाह ने कही ये बात

‘द केरल स्टोरी’ के रिलीज होने के बाद जो लोग समाज के सेक्युलर फैब्रिक को तहस- नहस करने वाली फिल्म इसे बता रहे हैं. उनसे मैं सिर्फ एक ही सवाल पूछता हूं कि अगर किसी समाज में कोई बुराई है, तो उसे एक्सपोज कर जड़ से मिटाना चाहिए या नहीं. क्या सेकुलरिज्म के नाम पर हम लड़कियों की जिंदगी बर्बाद होने दें. समाज की बुराइयों को खत्म करने से ही समाज सही मायनों में सेक्युलर हो सकता है.

फिल्म ट्रेड विश्लेषक कोमल नाहटा ने कही ये बात

फिल्म दिल को छूती है, तो वह चलती है. पब्लिक को प्रोपगैंडा या नॉन प्रोपगैंडा से कुछ लेना-देना नहीं है. ‘कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरल स्टोरी’ की कामयाबी इसी बात की गवाह है. संवेदनशील मुद्दे पर फिल्म बना लेने से सिर्फ फिल्म करोड़ों कमा लेगी, तो हर कोई ऐसी ही फिल्में बनायेगा. दर्शक सिर्फ इस तरह की ही फिल्म देखना चाहता है. ये जो सोच रहे हैं, वो भ्रम में हैं. भूल भूलैया2, आरआरआर और पठान की कामयाबी इसका उदाहरण है. अच्छा सिनेमा ही चलेगा, मुद्दा नहीं.

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