2100 तक चीन की जनसंख्या घट कर हो जायेगी 80 करोड़, चीन की घटती आबादी से वैश्विक मंदी की आशंका

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चीन एक बार फिर दुनिया के लिए संकट पैदा कर सकता है. दुनिया की फैक्ट्री कहा जाने वाला चीन इन दिनों कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है. उसको लेकर विशेषज्ञों ने चेतावनी जारी की है. साल 2023 में चीन की जनसंख्या में गिरावट आयी है और यह 1.41 अरब से घट कर 1.40 अरब रह गयी है. संयुक्त राष्ट्र के पूर्वानुमान के मुताबिक, चीन की जनसंख्या 2050 तक घट कर 1.31 अरब हो जायेगी. फिर 2100 तक घट कर लगभग 80 करोड़ हो जायेगी. यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है और इसका असर पूरी दुनिया में देखने को मिलेगा.

दो रुझान हैं, जो इस तरह के जनसांख्यिकीय बदलाव को रेखांकित करते हैं. पहला- वृद्ध जनसंख्या, जिसमें 60 वर्ष और उससे अधिक आयु वालों का प्रतिशत वर्तमान में कुल जनसंख्या का 20% से अधिक है. दूसरा- जन्म दर में गिरावट. साल 2016 में एक करोड़ 78 लाख बच्चों ने जन्म लिया था, जो घट कर 2023 में 90 लाख हो गया. ये दोनों बदलाव चीन की अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है. विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि चीन की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है. चीन की घटती आबादी विनाशकारी वैश्विक मंदी पैदा कर सकती है.

2035 तक दिवालिया हो सकती है पेंशन प्रणाली

साल 2040 तक चीन की एक-चौथाई से अधिक आबादी 60 वर्ष से अधिक हो जायेगी और आर्थिक रूप से कम सक्रिय होगी. इससे चीन की पेंशन और बुजुर्ग देखभाल प्रणालियों पर दबाव पड़ेगा. कुछ भविष्यवाणियों से संकेत मिलता है कि पेंशन प्रणाली 2035 तक दिवालिया हो सकती है. जैसे-जैसे वृद्ध कर्मचारी सेवानिवृत्त होंगे. कुल जनसंख्या में कामकाजी उम्र के लोग कम होंगे, जो आनेवाले समय में उत्पादन पर असर डाल सकते हैं. इससे चीन की दीर्घकालिक आर्थिक विकास और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद प्रभावित होगा. उत्पादकता लाभ (प्रति नियोजित व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद) कम कार्यबल और बढ़ती उम्र से भी प्रभावित हो सकता है. कुछ अध्ययनों में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि श्रम उत्पादकता (प्रति कार्य घंटे का उत्पादन) उम्र के साथ बदलती रहती है. जैसे-जैसे कोई व्यक्ति श्रम बाजार में प्रवेश करता है, यह बढ़ने लगता है, फिर 30 और 40 के बीच स्थिर हो जाता है, और अंततः किसी व्यक्ति का कार्य जीवन समाप्त होने पर इसमें गिरावट आती है.

आयात करने पर मजबूर होगा चीन

जनसंख्या परिवर्तन से ‘विनाश का चक्र’ पैदा हो सकता है, जहां एक आर्थिक स्थिति नकारात्मक प्रभाव पैदा करती है और फिर दूसरी और उससे अगली. जैसे ही कम उत्पादकता विशेष क्षेत्रों में उत्पादन को प्रभावित करने लगेगी, चीन उन उद्योगों में मांग को पूरा करने के लिए आयात बढ़ाने के लिए मजबूर हो सकता है. यह नवाचार और उद्यमिता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता में और कमी आ सकती है. नये विचार, आर्थिक विकास को गति देते हैं. कार्यबल का आकार नवाचार को प्रभावित करता है, क्योंकि जैसे-जैसे नियोजित व्यक्तियों की संख्या घटती है, नये विचारों का दायरा संकीर्ण होता जाता है.

चीन के बाहर कीमतें बढ़ जायेंगी

चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है, जो दुनिया की एक तिहाई से अधिक वृद्धि के लिए जिम्मेदार है और दूसरा सबसे बड़ा आयातक है, इसलिए किसी भी बदलाव का वैश्विक असर होगा. उदाहरण के लिए ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में, जो चीन के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार हैं, जनसंख्या में इन बदलावों से उनके निर्यात की मांग कम हो सकती है. इसके परिणामस्वरूप उन देशों में रोजगार का स्तर कम हो सकता है, क्योंकि निर्यातक कंपनियां परिचालन कम करने के लिए मजबूर होंगी. जैसे-जैसे चीन में उत्पादकता घटेगी, उसके व्यापारिक साझेदार अन्य अर्थव्यवस्थाओं से उत्पाद आयात करने के लिए मजबूर हो सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसके अलावा, थाईलैंड और वियतनाम जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं जो चीनी आउटबाउंड पर्यटन पर निर्भर हैं, परिवहन और आतिथ्य जैसे सभी पर्यटन-संबंधित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण गिरावट का अनुभव करेंगी, क्योंकि जनसंख्या परिवर्तन के प्रभाव से विदेश यात्रा करने में सक्षम लोगों की संख्या कम हो जायेगी. बहुराष्ट्रीय निगमों को भी मांग में गिरावट महसूस होगी, क्योंकि चीनी उपभोक्ता बाजार उनके राजस्व का एक बड़ा स्रोत है. इसका असर वैश्विक होने की संभावना है, क्योंकि दुनिया भर में आपूर्तिकर्ताओं और श्रमिकों को नौकरियां गायब होती दिख रही हैं.

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