चंपारण मटन के निर्देशक रंजन कुमार की अपील, बिहार सरकार फिल्म लिट्रेसी पर करें काम, किया संघर्ष बयां

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पिछले कुछ समय से लघु फ़िल्म चंपारण मटन लगातार सुर्खियों मे हैं. यह फ़िल्म स्टूडेंट ऑस्कर के सेमी फाइनल मे जा पहुंची हैं. इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक रंजन कुमार बिहार से हैं. यह उनकी डिप्लोमा फ़िल्म है. उनकी इस फ़िल्म और अब तक की जर्नी पर उर्मिला कोरी की हुई बातचीत.

चंपारण मटन के ऑस्कर स्टूडेंट मे पहुंचने की उपलब्धि कितनी खास हैं ?

बहुत खास हैं. मैं बिहार से हूं. पुणे फिल्म इंस्टीट्यूशन का छात्र हूं, मैंने इस साल अपना डिप्लोमा खत्म किया है. हमारा एक प्रोजेक्ट होता है. इसमें सारे डिपार्टमेंट के लोग मिलकर आते हैं. साथ में काम करते हैं. यही प्रोजेक्ट चंपारण मटन है. मैंने इस फिल्म का राइटिंग और डायरेक्शन किया है, लेकिन चम्पारण मटन अकेले मेरी फिल्म नहीं है. यह चार और लोगों की फिल्म है. जो मेरे साथ फिल्म इंस्टीट्यूशन में पढाई कर रहे हैं. शुभम घाटगे ने फिल्म की साउंड की जिम्मेदारी ली है , उनके गांव बारामती में ही फिल्म की शूटिंग हुई है. मुज़्ज़फरपुर की मीनाक्षी श्रीवास्तव ने प्रोडक्शन किया है. तमिलनाडु के आदित्य ने सिनेमेटोग्राफी और वैष्णवी कृष्णन ने फिल्म की एडिटिंग की है. मेरे साथ यह इन सभी लोगों की फिल्म है.

एफटीआईआई किस तरह से आप पहुंचे ?

मैंने एमआईटी मुज़्ज़फरपुर में पढाई किया है. वहां से पढाई खत्म हुई तो आइएसएम धनबाद में मैंने एडमिशन लिया, लेकिन मुझे लग रहा था प्रोफेसर बनकर क्या ही कर लेंगे. इसी बीच मेरी नानी की तबीयत बहुत ख़राब हो गयी तो पढाई को बीच में छोड़कर पटना आ गया. पटना में रह रहा था , तो एक दोस्त ने दिखाया कि एफटीआईआई का विज्ञापन है. मुझे बोला कि भर दे. उस समय मुझे ये भी पता नहीं था कि ये एफटीआईआई है , फिल्म की पढाई होती है. ये बाद में मालूम पड़ा. मैंने फॉर्म तो भरा लेकिन पैसे ना होने की वजह से एडमिशन नहीं ले पाया. वैसे सिर्फ पैसा वजह नहीं थी, जब एग्जाम देने वहां गया तो खुद को वहां बहुत हेय महसूस किया. सब अंग्रेजी में बात कर रहे हैं. सबके पास मोटी – मोटी अंग्रेजी की किताबें थी. हमारे यहां बिहार मे तो छठवीं से अंग्रेजी शुरू होती है इसलिए अंग्रेजी में बहुत दिक्कत थी. मेरा डर मेरे चेहरे पर आ गया था उन्हें लगा ये टिक नहीं पाएगा और मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ. यह बात मुझे बहुत हिट कर गयी. मैंने तय कर कि करना है. चार साल बाद मेंने फॉर्म फिर भरा और एग्जाम दिया. इसके बीच में मैंने थोड़ा एसबीआई कार्ड में काम किया. कौशल विकास योजना में काम किया. आईआईटी में पढ़ाया. वो सब करके पैसे इकट्ठा किया. पैसों के अलावा खुद को तैयार भी किया. कैसे लिखते हैं इसके लिए मैं कवि और लेखकों से मिलने लगा. एक बार उषा किरण खान से मिला , उन्होंने कहा कि लिखो कम पढ़ो ज़्यादा , वहां से पढ़ा शुरू किया. किताब का लाइब्रेरी बन गया. मैंने फ़णीश्वरनाथ रेनू को पढ़ा , विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ा, हरशंकर परसाई को पढ़ा. इनसे तो प्यार ही हो गया था. निर्मल वर्मा को भी पढ़ा. उनको पढ़ते – पढ़ते एक सेन्स डेवलप हुआ. विजय तेंदुलकर, टॉलस्टॉय, चेकोव को भी पढ़ा है. राइटिंग की टेक्निकल बुक भी खंगाल डाली है. मेरा घर लाइब्रेरी था. इसी से २०१७ में एफटीआईआई में एग्जाम जब दिया तो चुन लिया गया. फिर पांच साल पढाई किया और यह डिप्लोमा फिल्म बनायीं.

२०१७ में खुद को दूसरों के मुकाबले हेय नहीं समझा, किस तरह से खुद को कम आंकना बंद किया ?

उसकी भी तैयारी मैंने चार सालों में की. २०१३ में जब गया था और रिजेक्ट हुआ तो उस वक़्त जो सेलेक्ट हुए थे. उनसे बातचीत की थी. उनसे दोस्ती कर ली थी बोलता था कि एक बार बुलाओ, तो वो बुलाते थे. मैं जाता था. उनसे बात करता था , तो एक कम्फर्ट लेवल बन गया था. उसी दौरान आशुतोष नाम के लड़के से दोस्ती हुई थी. उसने ही २०१७ के एडमिशन के वक़्त मेरी आर्थिक तौर पर मदद की .

अब तक की जर्नी में संघर्ष क्या रहा ?

संघर्ष की बात करूं तो घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बिहार में महिला समस्या सोसाइटी चलता था. उसमें मां सीआरपी का काम करती थी. सुपरवाइजर का काम करती थी. पापा का जूते चप्पल का दुकान था , लेकिन वो बंद हो गया. फिर मिड डे मील चला, तो उसमें पापा और मां दोनों साथ में काम करते थे. २०१३ में दोनों का काम छूट गया. किसी तरह से दोस्तों से ,रिश्तेदारों से उधार लेकर और छोटे – मोटे कामों को करके यहां तक पहुंचा हूं. इस फिल्म को बनाने में सवा लाख रूपया मेरा भी गया है. आपको यकीं नहीं होगा कि मैं तो वहां के प्रोफ़ेसर लोगों से भी उधारी की है. एक तरफ शॉट ले रहे हैं और दूसरी तरफ किसी दोस्त से पैसों का इंतजाम कर रहे हैं ताकि फ़िल्म बन पाए.एफटीआई में पढाई के साथ साथ एलोवेरा भी बेचा. सिर्फ बात अपनी नहीं थी. घर की भी ज़रूरतें थी , तो थोड़ा पैसा वहां भी भेजना पड़ता था. एफटीआईआई में सबको एलोवेरा पिलाया. किसी को परेशानी हुई तो मैं डेमो दे देता था कि एलोवेरा जूस इस कम्पनी का पियो. सिर्फ एफटीआईआई ही नहीं बिहार में भी आता था , तो एलोवेरा जूस बेच देता था. फैमिली में भी बेच देता था. एक बार नानाजी बीमार हो गए थे , एलोवेरा जूस से वह ठीक हो गए , उसके बाद तो पूरे परिवार का आर्डर मेरे पास आ गया था.

फिल्म के अभिनेता चंदन रॉय का कहना है कि आपने बहुत बारीकी के साथ फिल्म में संघर्ष तबके को दिखाया है ?

मैं खुद उस तबके से आता हूं और कोविड में मैंने उनके संघर्ष को और करीब से देखा. मेरा एक दोस्त था एक किलो चावल के लिए दूकान वालों को पटाता था. एक बार एक करीबी के घर दानापुर पहुंचा. उस परिवार में दस लोग थे. पहुंचा, तो मालूम पड़ा कि मटन बन रहा है. खुश हुआ कि चलो अच्छा हुआ मटन खाने को मिल गया. दो लोग और आ गए. उन्होंने भी खाया. उस परिवार का मुंह देखने लायक था. वो खुद कई महीनों बाद मटन खाने वाले थे , लेकिन उन्हें अच्छे से वो भी नसीब नहीं हुआ. बचपन में भी मैंने देखा था कि मां जब पापा से मटन लाने को कहती थी , तो वह कहते थे कि पेट में गैस है. कभी और ले आऊंगा. दरअसल उनके पास मटन के लिए पैसे नहीं होते थे. गरीबों के लिए मटन एक लक्जरी है, उसी सोच ने चम्पारण मटन की कहानी को जन्म दिया.

फिल्म के ऑस्कर के रेस में जुड़ने से चीज़ें कितनी बदली है ?

कुछ बदला तो नहीं है. लोग बधाई दे रहे हैं. शाबाशी दे रहे हैं. अच्छा लग रहा है लेकिन चीज़ें तब बदलेंगी , जब कोई प्रोडयूसर आगे आएगा. मुझ पर विश्वास दिखायेगा तो लगेग कि चीज़ें बदलेगी. फिल्मों का क्या है वो बन जाने के बाद दर्शकों तक पहुंच ही जाती है. मेरी एक और शार्ट फिल्म सराय है. वह स्टूडेंट ऑस्कर में नहीं गयी, लेकिन यू ट्यूब पर उस फिल्म को छह से सात लाख लोगों ने देख लिया है. मेरे पास बहुत सारी कहानियां हैं , जिन्हे मैं कहना चाहता हूं , लेकिन उसके लिए पैसे चाहिए, जो एक निर्माता लगा सकता है. बहुत से लोगों का कर्ज हैं. एफटीआईआई नें ही 14 हज़ार का देर से फीस भरने का फाइन लगाया हैं. जिसे भरना हैं.

आप किस तरह के सिनेमा में यकीन करते हैं ?

मुझे अभी यही आता है, लेकिन मुझे लगता है कि फिल्म केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है. उससे कोई बात दिल को छू जाए तो उससे अच्छा और क्या हो सकता है.

आप बिहार के युवाओं से क्या कहना चाहेंगे, जो सिनेमा मे करियर बनाने में रूचि रखते हैं ?

सिंपल सा बात है, जो लोग सोचते हैं कि सीधे मुंबई पहुंचकर संघर्ष करके कर लेंगे वह गलत सोच रहे हैं. सीखना ज़रूरी है. सिनेमा , देखने और पढ़ने का जुगाड़ होना चाहिए. गांव और कस्बों मे फ़िल्म. दिखाया जाना चाहिए. फिल्म लिट्रेसी पर काम हो. हाल ही मे चम्पारण मटन की स्क्रीनिंग के लिए केरल गया था. वहां सरकार का सिनेमाघर था. हमारे यहां तो प्राइवेट सिंगल स्क्रीन खत्म हो गए है. बिहार सरकार को पहल करनी होगी. फिल्म पढ़ने का भी कॉलेज बने. एफटीआईआई मे आल इंडिया में दस लोगों को चुना जाता है, तो और जगह भी पढ़ने का जुगाड़ होना चाहिए. युवाओं से यही कहूंगा कि सब भूलकर खूब मेहनत करो. पढ़ो और सीखो. स्वभाव भी अच्छा रखो. लोग हाथ खींच ही लेते हैं. अपने अनुभव से कह रहा हूं.

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