दोनों आंखों की जन्मजात मोतियाबिंद से जूझ रहे दो माह के बच्चे का (कैटरैक्ट) सर्जरी

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नई दिल्ली : देश में पीडियाट्रिक कैटरैक्ट के मामले हर साल प्रति 10 हजार नवजातों में से 1.8 से 3.6 फीसदी तक देखे गए हैं। आम लोगों के बीच यही धारणा बनी हुई है कि कैटरैक्ट उम्र संबंधी बीमारी है और यह बुजुर्गों को ही सिर्फ प्रभावित करती है। लोगों में जन्मजात मोतियाबिंद के प्रति जागरूकता बहुत कम है।  दो माह के ऐसे बच्चे की दृष्टि सेंटर फॉर साइट हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने लौटाई जिसकी दोनों आंखों की जन्मजात मोतियाबिंद से जूझ रहा था। बेबी कार्तिक के रूटीन चेकअप के दौरान उसके शिशुरोग विशेषज्ञ को मोतियाबिंद की समस्या का पता चला और उन्होंने तत्काल आगे की जांच के लिए उसे भेज दिया।  महज दो माह के बच्चे की सर्जरी इस इलाके में पहला ऐसा मामला था। उसकी डायग्नोसिस के बाद माता-पिता गहरे सदमे में थे और उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी कम उम्र के बच्चे को भी मोतियाबिंद हो सकता है। वे उधेड़बुन में थे कि कहां दिखाया जाए। उन्होंने इलाज के लिए दिल्ली आने का भी फैसला कर लिया था लेकिन उनके परिवार से जुड़े एक शुभचिंतक ने उन्हें पटना में सेंटर फॉर साइट के बारे में बताया जहां एक ही जगह देश की सर्वश्रेष्ठ और संपूर्ण नेत्र चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं।
जन्मजात मोतियाबिंद का इलाज उम्र संबंधी मोतियाबिंद के इलाज से पूरी तरह अलग होता है और बच्चे की इतनी कम उम्र को देखते हुए डॉक्टरों की टीम ने अत्यंत प्राथमिकता और सुरक्षा के तौर पर इस मामले का जिम्मा संभाला। आंख में शुरुआती लक्षण रेटिनोब्लास्टोमा (आंखों का कैंसर) के जैसा लगा लेकिन कई जांच के बाद यह अंदेशा दूर हो गया और मरीज में मोतियाबिंद ही पाया गया। डॉ. प्रवीण कुमार, नेत्ररोग विशेषज्ञ के नेतृत्व में डॉ. बिपिन मिश्रा (एनेस्थेसिया) और विशेषज्ञ ओटी स्टाफ (राजेश, अभिमन्यु और जयश्री) की टीम ने बच्चे का सफल ऑपरेशन किया।
डॉ. प्रवीण कुमार बताते हैं, मोतियाबिंद के इलाज के लिए फेम्टोसेकंड लेजर आदि जैसी आधुनिक तकनीक की उपलब्धता के बावजूद जन्मजात मोतियाबिंद का एकमात्र इलाज जनरल एनेस्थेसिया के तहत सर्जिकल चिकित्सा ही है। नवजात की उम्र को देखते हुए न सिर्फ सर्जरी बल्कि एनेस्थेसिया देना भी एक बड़ी चुनौती थी। टीम ने चार सप्ताह के अंतर पर दोनों आंखों की सफल सर्जरी की। सर्जरी के बाद शिशु अच्छी तरह रिकवर कर गया और उसे चश्मा भी लगाया गया। इसके बाद उसे हर तीन महीने पर जांच कराने और निगरानी में रखा गया। सही समय पर इलाज शुरू करने से बच्चे को अत्यंत सुरक्षित और सफल इलाज मिल पाया। इससे मरीज और समस्त परिवार की जिंदगी ही बदल गई। आंखों की इस तरह की बीमारी न सिर्फ आंखों का बल्कि मस्तिष्क का विकास भी रोक देती है। ऐसे मामलों में शिशुरोग विशेषज्ञों की अहम भूमिका होती है कि वे तत्काल नेत्ररोग विशेषज्ञ के पास मरीज को भेज दे।