Explainer : कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘अन्ना आंदोलन’ के ‘हीरो’ थे अरविंद केजरीवाल, अब सीबीआई करेगी पूछताछ

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नई दिल्ली : दिल्ली आबकारी घोटाला मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जांच की जद में आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी आ गए हैं. सीबीआई रविवार यानी 16 अप्रैल, 2023 को अरविंद केजरीवाल से पूछताछ करेगा. आबकारी घोटाला मामले में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पहले ही सीबीआई की गिरफ्त में आ चुके हैं और इस समय वह तिहाड़ जेल में बंद हैं. उनसे पहले, केजरीवाल सरकार के एक अन्य मंत्री सत्येंद्र जैन तिहाड़ जेल में कैद हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि आज दिल्ली आबकारी घोटाला मामले में सीबीआई अरविंद केजरीवाल से पूछताछ कर रही है, लेकिन एक जमाना था, जब भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़े गए अन्ना आंदोलन के हीरो थे. आइए जानते हैं…

सीबीआई के समन पर अरविंद केजरीवाल ने क्या कहा

दिल्ली आबकारी घोटाला मामले में पूछताछ के लिए सीबीआई की ओर से समन भेजे जाने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शनिवार 15 अप्रैल को कहा कि आम आदमी पार्टी देश के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरी है और यही वजह है कि उसे कुचलने के प्रयास किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह रविवार को एजेंसी के सामने पेश होंगे. केजरीवाल ने कहा कि पिछले 75 साल में ‘आप’ की तरह किसी भी पार्टी को निशाना नहीं बनाया गया. उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘आप’ ने लोगों में उम्मीद जगाई है कि वह गरीबी मिटा देगी और उन्हें शिक्षित बनाएगी. वे हमें निशाना बनाकर इस उम्मीद को तोड़ना चाहते हैं. ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक ने कहा कि आबकारी नीति एक उत्कृष्ट नीति है और पंजाब में यह अच्छी तरह से चल रही है, जहां पार्टी सत्ता में है.

5 अप्रैल 2011 को अन्ना आंदोलन का हुआ था सूत्रपात

बताते चलें कि 5 अप्रैल, 2011 को एक सशक्त लोकपाल बिल बनाने की मांग पर सरकार की अनदेखी के खिलाफ अन्ना हजारे ने आमरण अनशन शुरू किया था. भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी इस मुहिम में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव और अनेक प्रसिद्ध समाजसेवी शामिल थे. सरकार ने इसे उपेक्षित करना जारी रखा. इस अनशन को भारत और दुनिया भर के संचार माध्यमों में बड़े पैमाने पर प्रकाशित और प्रसारित किया जाने लगा. भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़े इस जंग को जल्द ही व्यापक जनसमर्थन मिलने लगा. भारत के प्रायः सभी शहरों में युवा सड़कों पर उतर आए और उन्होंने अन्ना आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन करते हुए पर्चियां बांटी.

2009 में ही रखी गई थी आंदोलन की नींव?

2011 के अन्ना आंदोलन से जुड़े लोगों की मानें, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की नींव वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद ही रख दी गई थी. चुनाव के समय भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने देश से बाहर स्विस बैंकों में जमा कालेधन को वापस लाने का मुद्दा उठाया था. कॉमनवेल्थ गेम्स और टूजी स्पेक्ट्रम घोटालों को उजागर होने के बाद भाजपा की मुहिम तेज हो गई और उसके नेता सरकार के खिलाफ गोलबंद होने लगे थे. लेकिन, जब सड़क से लेकर संसद तक जोर लगाने के बाद मुहिम ने रंग नहीं पकड़ा, तो उन्होंने कालेधन को छोड़कर भ्रष्टाचार को अपना मुद्दा बनाया.

कैसे बनी बनी टीम

एक रिपोर्ट के अनुसार, राजग सरकार के कार्यकाल में देश के प्रखर वकील प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण केंद्रीय मंत्री थे. वहीं, टीम अन्ना के सदस्यों में शामिल किरण बेदी को दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त के पद पर बने रहते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत की ओर से सुरक्षा सलाहकार बनाया गया था. हालांकि, वे दिल्ली पुलिस आयुक्त बनना चाहती थीं. अरविंद केजरीवाल राजग के शासनकाल में ही ‘पालित-पोषित’ हुए थे. वर्ष 2010 के आखिरी महीनों में किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण की ‘तिकड़ी’ बनी और उन्होंने आमीर खान के माध्यम से अन्ना हजारे को अपनी टीम में शामिल किया. वर्ष 2010 में ही इस तिकड़ी ने सरकार को घेरने के लिए जनलोकपाल का मसौदा तैयार किया और अप्रैल, 2011 अन्ना हजारे के आमरण अनशन के साथ आंदोलन की शुरुआत हो गई.

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले हुआ था आंदोलन

यह बात दीगर है कि वर्ष 2011 की शुरुआत में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल को देश की प्रजा और संसद से पारित कराने की नींव रख दी गई थी. इसके लिए मुट्ठीभर लोगों द्वारा आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गई और आंदोलन को ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के बैनर तले संचालित करने का निर्णय लिया गया. इसके लिए ‘हठी’ अन्ना हजारे को आगे कर एक कोर कमेटी गठित की गई. इसकी स्थापना के समय कोर कमेटी के सदस्यों के रूप में अन्ना हजारे के अलावा किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, शांति भूषण, बाबा रामदेव, महमूद मदनी, आर्च विशप बिशेंट एम कोंसेसाओ, सईद रिजवी, न्या तेवतिया, बीआर लाला आदि को शामिल किया. बाद में, इससे स्वामी अग्निवेश और श्रीश्री 108 रविशंकर को भी जोड़ा गया.

आंदोलन से अलग हो गए थे बाबा रामदेव

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले अप्रैल में अन्ना हजारे द्वारा अनशन किया गया. उसी समय 16 अगस्त से दोबारा अनशन करने की घोषणा की गई. हठी अन्ना और उनकी टीम की ‘बलात्’ या ‘हठात्’ की नीति से इंडिया अगेंस्ट करप्शन की संस्थापक टीम में विखंडन शुरू हो गया. इसी का नतीजा रहा कि बाबा रामदेव ने अलग राह पकड़ लिया और खुद के बूते नौ दिन का अनशन किया. टीम अन्ना द्वारा बंद कमरे में तैयार की गई भ्रष्टाचार के खिलाफ तैयार की गई रणनीति पूरी तरह लोगों में बनावटी जोश भरने वाली थी.

अन्ना आंदोलन में भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े थे लोग

उस समय आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर अनिल गुप्ता ने कहा था कि अन्ना के इस आंदोलन में शामिल ज्यादा लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े थे. किसी को इस बात का एहसास नहीं था कि सिर्फ एक संस्था में इतनी ज्यादा शक्ति केंद्रित हो जाएगी, जो लोकतांत्रिक समाज के लिए बड़ा जोखिम खड़ा कर देगी. हालांकि, नागरिक प्रतिरोध को महात्मा गांधी ने राजनीतिक सुधार के एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया था.

आंदोलन के संचालकों पर किया गया था संदेह

सबसे बड़ी बात यह है कि जिस समय भ्रष्टाचार के खिलाफ अरविंद केजरीवाल अन्ना आंदोलन के हीरो थे, उसी समय टीम अन्ना में विरोध के स्वर भी मुखर होने लगे थे. आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर अनिल गुप्ता ने कहा था कि महात्मा गांधी के नागरिक प्रतिरोध को टीम अन्ना ने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया. अपने निजी हितों को व्यावसायिक और सामाजिक हितों से अलग करने का सिद्धांत गांधीवादी आंदोलनों के मूल्यों से मेल नहीं खाता. आंदोलन के नेता अन्ना हजारे की हैसियत को हर किसी ने स्वीकार किया, लेकिन इसके संचालकों का चरित्र और मंशा संदेह के घेरे में था. आज अन्ना आंदोलन के करीब 12 साल पूरे हो गए, तब जो अरविंद केजरीवाल उस समय भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रहे थे, आज सीबीआई के सामने खड़े हैं.

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