देश के लिए नई शिक्षा नीति का आना अच्‍छी बात, लेकिन चरित्र निर्माण है सबसे बड़ी चुनौती

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नई शिक्षा नीति में कई बातों का ध्‍यान रखा गया है लेकिन शिक्षा का जो मूल उद्देश्य है उसे नजरअंदाज कर दिया गया है।
प्रो कृष्ण बिहारी पांडेय। लंबे अर्से के बाद राष्ट्र के लिए नई शिक्षा नीति का आना सर्वथा स्वागत योग्य है। इस शिक्षा नीति में समाज और राष्ट्र के समक्ष जो प्रत्यक्ष चुनौतियां हैं उनका सामना करने की अच्छे ढंग से चिंता की गई है। विश्व पटल पर देश एक आर्थिक शक्ति बनकर उभरे तथा हर नौजवान को रोजगार मिल सके, इसका भरपूर ध्यान रखा गया है। तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और आर्थिक प्रबंधन के लिए हमारे नौजवान को अपने देश में ही पूरी सुविधा मिल सके, इस बात का भी पूरा ध्यान रखा गया है परंतु शिक्षा का जो मूल उद्देश्य है उसे नजरअंदाज कर दिया गया है।

यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसी भी प्रकार की शिक्षा पाने वाले नौजवान को पहले व्यक्ति बनना आवश्यक है। उसे सच्चरित्र तथा स्वस्थ मस्तिष्क वाला नागरिक बनना अधिक आवश्यक है। संक्षेप में कहना चाहूंगा कि देश के समक्ष वर्तमान में हमारे नौजवानों में ‘क्राइसिस ऑफ कैरेक्टर’ सबसे बड़ी समस्या है। प्रस्तावित शिक्षा नीति में इसका कहीं स्पष्ट जिक्र नहीं है। आज भी भारत का नौजवान दुनिया में इंजीनियर के रूप में, डॉक्टर के रूप में, प्रशासक के रूप में पूजा जाता है, परंतु अपनी चारित्रिक कमियों के कारण वह देश के काम बहुत कम आता है। इसके लिए हमें अपनी पुरानी शिक्षापद्धति की ओर मुड़कर देखना होगा।

इसमें व्यक्तित्व निर्माण तथा चरित्र निर्माण पर बहुत बल दिया जाता था। हमारी शिक्षा के चार आधार थे। समिधा, मेखला, श्रम और तप। मैकाले के दुश्चक्र में फंस कर हमने इन तत्वों से दूरी बना ली परिणामत: इंजीनियर सीमेंट की जगह बालू मिलाने लगा, डॉक्टर किडनी लीवर निकालने लगा। प्रशासक अपने मातहतों का शोषण करने लगा, राजनेता जनता को ही चूसने लगा। पुलिस बल पब्लिक के लिए खौफ बन गया। देश सेवा किसी का लक्ष्य नहीं रहा। सबके लिए मोटी पगारें और अंधाधुंध कमाई लक्ष्य बन गया।

परिश्रम करके कमाने के बजाय लूट कर कमाने के रास्ते ईजाद हो गए। अनेक विश्वविद्यालयों के अपने अनुभवों के आधार पर मैंने इन समस्याओं से निपटने के लिए यह अनुशंसा कर रखी है कि विद्यालयों में योग की शिक्षा के लिए सभी स्तरों पर व्यवस्था की जाए। चरित्र निर्माण के लिए योग का कोई विकल्प नहीं है। परंतु योग का आशय मात्र आसन और प्राणायाम से नहीं हैं। अपितु योग का अष्टांग रूप में शिक्षण और अभ्यास कराया जाय। यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात आठों अंगों की विधिवत पढ़ाई हो तथा अभ्यास हो। हम साल में एक दिन अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाकर अपना दायित्व पूरा नहीं कर सकते।

समग्रता में हर नौजवान को योग की शिक्षा दी जाय। हमने प्रयोग करके देखा है कि सप्ताह में एक दिन हर कक्षा के लिए एक घंटे की प्रार्थना सभा भी चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण में बहुत सहायक होती है। मेरा यह भी अनुभव है कि हमारे संस्कार और परंपराएं अब गांव में ही बचे हैं। प्रत्येक छात्र का महीने में एक दिन किसी गांव में जाकर गांव को देखना, समझना और गांवों से सीखना भी चरित्र व व्यक्तित्व को निखारता है। यदि हमारा नौजवान अपनी माटी से दूर भागता है, माटी में लोटने में अपना अपमान मानता है तो वह देश के लिए कुछ नहीं करसकता।

‘माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या’ तब वेद के पन्नों में ही लिखा रह जाएगा। माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वच्छता के लिए झाड़ू पकड़ कर जो संदेश दिया है, वह हर नौजवान के दिल में बसना चाहिए और उसे फावड़ा लेकर खेत की मेड़ पर खड़े होने में गौरवान्वित होना चाहिए। इतना सब करने के लिए प्रस्तावित शिक्षा नीति में कोई बहुत परिवर्तन नहीं करना पड़ेगा, अपितु इस नीति के क्रियान्वयन में इन बातों की चिंता करनी पड़ेगी।