हे गृहणी, अब तुम ही लगा सकती हो राजनीति की नैया पार Aligarh news

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भारतीय संस्कृति में हमारे देश की नारियों को लक्ष्मी की उपाधि दी गई है। वक्त पड़ने पर देश की नारियों ने त्याग और समर्पण भी दिखाया है। त्रेतायुग में युद्ध में राजा दशरथ के रथ को रानी कैकेई ने संभाला। झांसी की रक्षा के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठा ली। जिला पंचायत चुनाव में इस बार बड़े नेताओं की राजनीतिक पृष्टभूमि को बनाए रखने का दारोमदार उनकी पत्नियों के कंधों पर आ गया है। जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट महिला (सामान्य) होने से महिलाओं की जिम्मेदारी बढ़ गई है। चूल्हे चौके और घरेलू कामकाज में व्यस्त रहने वाली महिलाएं एकाएक राजनीति की ओर मुड़ गई हैं। परिवार के लोगों ने उन्हें अध्यक्ष पद की कुर्सी के लिए उतारने की तैयारी कर ली है। ऐसे में उनके ऊपर दोहरी जिम्मेदारी आ गई है। परिवार के लोग संभावित प्रत्याशियों को राजनीति का ककहरा भी पढ़ाने लगे हैं। कुछ तो यही कह रहे हैं कि अब तुम ही नैया पार लगा सकती हो।


फिर पांच साल तुम चक्कर लगाना

गांवों में चौपालें शुरू हो गई हैं, दावतें भी चल रही हैं। प्रधान पद के प्रत्याशी तो इतने सहज और सरल हो गए कि लपक के हर किसी का पैर छू लेते हैं। खेत-खलिहान एक करे हुए हैं। यदि गांव में बड़े-बुजुर्ग नहीं मिल पाते हैं तो प्रत्याशी खेतों में पहुंच जा रहे हैं। गेहूं का बोझ उठाते देख प्रत्याशी दौड़ पड़ते हैं। बोलते हैं ताऊ हमें क्यों नहीं बताया? हम मदद कर देते। कहीं, सरकारी हैंडपंप पर किसी छोटे बच्चे को पानी भरते देख लेते हैं तो हैंडपंप चलाना शुरू कर देते हैं। शाम के समय लोगाें की खूब खातिरदारी भी कर रहे हैं। तनिक भी पता चल गया कि फला व्यक्ति नाराज है तो वो रात 12 बजे भी मान-मनौव्वल को दौड़ पड़ते हैं। प्रधान प्रत्याशी मन ही मन यह कह रहे हैं कि एक महीने खूब दौड़ा लो, जीतने के बाद फिर पांच साल हम ही दौड़ाएंगे तब पता चलेगा।


संघर्ष करने वालों को तरजीह नहीं

साइकिल धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही है। धरना-प्रदर्शन और आंदाेलनों से मजबूत स्थिति में हा रही थी, मगर जिला पंचायत चुनाव में टिकट में कर्मठ और मेहनती कार्यकर्ताओं को दरकिनार करना शुरू कर दिया है। ऐसे कार्यकर्ता जो सड़क पर संघर्ष से नहीं घबराए। लाठी खाने में पीछे नहीं रहे, मगर टिकट का नंबर आने पर उनका नाम गायब हो रहा है। चर्चा है कि दूसरे दलों से आए कार्यकर्ताओं को तरजीह दी जा रही है। जिसपर संभावना जताई जा रही है कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद वह कभी भी साइकिल से उतर सकते हैं। ऐसे में पार्टी के कद्दावर और वरिष्ठ नेता हताश और निराश हैं। उनका कहना है कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव का सेमीफाइन है, ऐसे में यदि अभी से पार्टी के वरिष्ठ और कर्मठ नेताओं को ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति खराब हो सकती है।


इंतजार की घड़ी है

ब्ल्यू ब्रिगेड की जमीन भले ही कमजोर हुई हो, मगर वह जिला पंचायत चुनाव में पुरानी चाल चलने की तैयारी में है। पिछले तीन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने वाली पार्टी जिले में बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। इसलिए अभी तक पार्टी ने टिकट घोषित नहीं किया है। चर्चा है कि ब्ल्यू ब्रिगेड वेट एंड बाच में है। वह कमल वाली पार्टी का इंतजार कर रही है। कमल वाली पार्टी के प्रत्याशी घोषित होने के बाद ब्ल्यू ब्रिगेड घोषित करने की रणनीति बना रही है। हो सकता है कि कमल वाली पार्टी के कुछ नेता टिकट न मिलने पर ब्ल्यू ब्रिगेड में जा सकते हैं। हालांकि, हाथरस की घटना के बाद से ब्ल्यू ब्रिगेड से चुनाव लड़ने वाले नेताओं की धुकधुकी बनी हुई है। उन्हें आशंका है कि कहीं कोई खेल न हो जाए। बहरहाल, यहां के नेता सुप्रीमो के निर्देश का इंतजार कर रहे हैं।

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