सखि! आयो वसंत रितून को कंत: प्रकृति कला व कौशल के प्रेम का महापर्व है वसंत

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वसंतोत्सव का आरंभ प्रत्येक वर्ष माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी से होता है। भगवान शिव को काम मोहित करने में स्वयं को अक्षम पाते हुए कामदेव की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी ने इसी दिन उन्हें एक सहायक प्रदान किया। वो सहायक कोई और नहीं बल्कि ‘वसंत’ थे। कामदेव अपनी कला और वसंत ने प्रकृति का अनूठा श्रृंगार कर शिव पर पुष्प वाण चलाये । कामदेव को शिव के क्रोध का शिकार होना पड़ा । कामदेव भस्म हुए और रति की प्रार्थना पर इसी दिन यानि वसंत पंचमी के दिन कामदेव का अनंग रूप में पुनर्जन्म हुआ।

यह पर्व प्रकृति कला व कौशल के प्रेम का महापर्व है। इसी दिन से प्रकृति में स्पष्ट परिवर्तन दिखने लगते हैं। वो शनैः शनैः यौवन की ओर अग्रसर होती है। वसंत पंचमी से मदनोत्सव का आरंभ होता है। जिसका समापन होलिकोत्सव पर होता है। होलिकोत्सव के साथ शुरू होती है वसंत ऋतु। भगवान कृष्ण ने गीता में स्वयं को ‘ऋतुनाम कुसुमाकरः’ कहकर वसंत ऋतु की श्रेष्ठता उजागर की है। यह ऋतु चैत्र एवं बैसाख महीनों में होती है। अपनी मधुरता के कारण इन महीनों को मधु माधव भी कहते हैं।


प्रकृति इस समय पुराने पत्तों का त्याग कर नई कोंपलों को धारण करती है। इसीलिए वसंत आगमन पुराने ऋण और बोझ उतार फेंकने का भी सूचक है। इस समय घर में कैद होकर रह गई दिनचर्या में बदलाव आने लगता है। इस मौसम के आते ही लोग घरों से बाहर निकलकर जीवन के नये रंग संजोने लगते हैं। संपूर्ण प्रकृति माधुर्य से गदरा उठती है। उसके सौंदर्य की मादकता उस माधुर्य भार को संभाल नहीं पा रही। कलियां किलकारी मार रहीं हैं।


चहुं ओर वसंत ही वसंत है-

द्वार में, दिसान में,दुनी में देस देसन में

देखो दीप द्वीपन में,दीपत दिंगत है

बीथिन में,बृज में ननेलिन में बेलिन में

बनन में,बागन में,बगरयो वसंत है।

संपूर्ण प्रकृति मनुष्य के लिए वरदान है। इसकी प्रत्येक वस्तु उपयोगी है, इसलिए सूखी पत्तियों और टहनियों को एकत्र कर होलिका दहन की तैयारी वसंत पंचमी के दिन से आरंभ हो जाती है। सामूहिक नृत्य गान और आपसी चुहलबाज़ियों के बीच इस दिन मोहल्ले मोहल्ले होलिका स्थापित की जाती है।


वसंत नई रचना का ,नई सृष्टि के प्रारंभ का प्रतीक है और मनुष्य की रागात्मक आकुलता की पहचान है। भले ही वैलेंटाइन डे नाम के एक नये प्रेम पर्व को हमने स्वीकार कर लिया हो परंतु हमारी संस्कृति का शाश्वत दर्शन जो काम पर्व के रूप में आदि काल से हमारे समाज में मान्य है, उसमें भी भक्ति तथा फक्कड़ बैरागी भाव जुड़ा है।इस फक्कड़ बैरागी भाव की परिणति काम को भस्म करने वाले शिव के विवाह दिवस शिवरात्रि के रूप में होती है जो इस ऋतु का एक प्रमुख पर्व है। ये हमारी भारतीयता है जो ‘राग’ में भी ‘विराग’ को खोज लेती है।


वसंत पंचमी वागेश्वरी जयंती और मां सरस्वती का जन्मदिवस है। इस दिन भक्ति भाव से विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का पूजन अर्चन किया जाता है,जो कि द्योतक है इस बात का कि अनुराग और उल्लास के इस पर्व में बुद्धि विवेक का संबल बना रहे। प्रकृति के यौवन स्वरूप इस मधुमास में तन मन एक सुहानी मधुर मादकता से भर उठता है। अभावों,कुंठाओं और विरोधाभासों से भरे इस जीवन का हर मधुमास तो उमंग और उल्लास से ओतप्रोत नहीं होता। जिंदगी की कशमकश इस वासंती रंग को फीका करने लगती है तो क्यों ना इसी वसंत को उसकी सम्पूर्णता में जी लिया जाय।