शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की जांच में फंसा शिक्षा महकमा, हाईकोर्ट की सख्ती से टेंशन बढ़ी

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उत्तराखंड में फर्जी प्रमाण पत्र से नियुक्त हुए शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की जांच में शिक्षा महकमा बुरी तरफ फंस गया है। हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इन शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की जांच कर फर्जी प्रमाण पत्र वालों पर कार्रवाई का आदेश दिया है और अगली सुनवाई 28 दिसंबर नियत की है, इससे महकमे पर जांच तेजी से पूरी करने का दबाव बढ़ा है तो उधर शिक्षक संगठनों का आरोप है कि उन्हें जांच के बहाने परेशान किया जा रहा है।दूसरी ओर महकमे की मुसीबत उस समय अधिक बढ़ गई जब दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों व कालेजों तथा संस्थानों द्वारा स्नातक, स्नातकोत्तर डिग्री तथा बीएड उत्तीर्ण के प्रमाण पत्र की असल कॉपी के लिए शुल्क की डिमांड की जा रही है। शिक्षा विभाग में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक विद्यालयों के बड़े पैमाने के शिक्षकों के प्रमाण पत्र जांच में फर्जी पाए गए हैं ।एसआईटी की जांच में 84 शिक्षक कार्रवाई की जद में आ चुके हैं। जनहित याचिका में आरोप लगाया है कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से ये शिक्षक नौकरी में जमे हुए हैं। कोर्ट ने अब तक जांचे गए प्रकरणों का पूरा ब्यौरा मांगा है।


पांच सप्ताह में पूरी करनी है जांच

प्रारंभिक शिक्षा निदेशक की ओर से जिला शिक्षा अधिकारियों को जारी पत्र में हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए पांच सप्ताह के भीतर राजकीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक के समस्त शिक्षकों, शिक्षा मित्रों के शैक्षिक , प्रशिक्षण व अन्य प्रमाण पत्रों के सत्यापन की कार्रवाई पांच सप्ताह में पूरी करने की अपेक्षा की गई है

गायब शिक्षकों के प्रमाण पत्र कहाँ से लाएं


शिक्षा निदेशक के पत्र के अनुसार 53 शिक्षकों द्वारा अब तक अपने शैक्षिक प्रमाण पत्र विभाग में जमा नहीं कराए हैं। इसमें लंबे समय से अनुपस्थित देहरादून के 26, चमोली के पांच, पौड़ी गढ़वाल के चार टिहरी के तीन, बागेश्वर के एक, उधमसिंह नगर के चार, अल्मोड़ा के तीन, चंपावत के एक तथा प्रतिनियुक्ति पर गए टिहरी व रुद्रप्रयाग के एक एक, सत्रांत लाभ की वजह से सेवा विस्तार पाए उधमसिंह नगर जिले के दो, सेवा समाप्त होने के बाद हाईकोर्ट के आदेश पर बहाल व निलंबित दो शिक्षक शामिल हैं। निदेशक कुंवर ने अधिकारियों को तत्काल इन शिक्षकों के स्व प्रमाणित प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने को कहा है। यदि ये शिक्षक उपलब्ध नहीं करते हैं तो सेवा नियमावली के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करने के साथ ही प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं करने का कारण भी साक्ष्य सहित देने को कहा है।


हाईकोर्ट लगा चुका फटकार

निदेशक इस मामले में हीलाहवाली को लेकर हाईकोर्ट की सख्त फटकार सुन चुके हैं। निदेशक ने एक अन्य पत्र में दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों या संस्थानों द्वारा सत्यापन को मांगी जा रही फीस संबंधित शिक्षक से ही लेने को कहा है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि नब्बे के दशक में उत्तर प्रदेश के मेरठ समेत अन्य शहरों, महाराष्ट्र के पुणे व मुंबई के विश्वविद्यालयों द्वारा बीएड व बीपीएड की डिग्री हासिल कर मास्टर बने लोगों को हाईकोर्ट व विभाग की सख्ती रास नहीं आ रही है। उनके प्रमाण पत्रों पर असली होने का संदेह वजह से गहराता जा रहा है।