विश्वविद्यालयों की सफलता का पैमाना बड़े पैकेज नहीं बल्कि बच्चों की बनाई गई कंपनियां हों: सिसोदिया

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इंदिरा गांधी दिल्ली तकनीकी महिला विश्वविद्यालय के तीसरे दीक्षांत समारोह में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शिरकत की। दीक्षांत समारोह में 487 छात्राओं को स्नातक (359), स्नातकोत्तर (119) और पीएचडी (09) उपाधियों का वितरण किया गया। साथ ही, दो चांसलर अवार्ड, 11 वाइस चांसलर अवार्ड और एक एक्जेम्पलरी अवार्ड भी दिया गया। इस दौरान सिसोदिया ने कहा है कि देश की इकोनॉमी आगे बढ़ाने में हमारी प्रतिभाओं का उपयोग करने का वक्त आ चुका है। हमने अपने बच्चों को पढ़ाकर दुनिया की बड़ी कंपनियों में बड़े पैकेज की नौकरी दिलाने तक सीमित न रहें। हमारी सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि हमारे बच्चों ने दुनिया की कितनी बड़ी कंपनियां खड़ी की। किसी विदेशी कंपनी में 60 लाख के पैकेज पर नौकरी करने वाले स्टूडेंट देश की इकोनॉमी में सिर्फ अपनी सैलरी का योगदान कर पाएंगे। जबकि अपनी कंपनी बनाने वाले बच्चे देश की इकोनॉमी में बड़ा योगदान करेंगे।


उन्होंने कहा कि विगत चार पांच वर्षों में विश्वविद्यालय ने क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों स्तर पर काफी सफलता हासिल की है। पहले लगभग 200 सीट क्षमता थी जो अब बढ़कर लगभग 1200 हो चुकी है। दिल्ली में हर साल लगभग ढाई लाख बच्चे बारहवीं पास करते हैं। सबको उच्च शिक्षा के अच्छे अवसर देना हमारी प्राथमिकता है। इसमें इस विश्वविद्यालय का योगदान हमारे लिए गर्व की बात है।

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि हम विश्वविद्यालय के लिए 50 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन 50 एकड़ वाले कैम्पस के बगैर ही विश्वविद्यालय फैकेल्टी और छात्राओं ने अपने ज्ञान और प्रोफेशनल कमिटमेंट के जरिए शानदार सफलता हासिल करके दिखा दी है। इससे पता चलता है कि शैक्षणिक उत्कृष्टता किसी विशाल परिसर की मोहताज नहीं। मैं एक लेक्चर के लिए जब लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स गया, तो परिकल्पना थी कि विशाल परिसर होगा। लेकिन इसके बगैर ही दुनिया में इस संस्थान का बड़ा नाम है।

मनीष सिसोदिया ने कहा कि दिल्ली सरकार आपको बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत है। लेकिन फैकेल्टी और स्टूडेंट्स की कठिन मेहनत और परिश्रम से ही विश्वविद्यालय उत्कृष्टता की ऊंचाइयों तक पहुंचेगा। इसलिए आप अपनी गति बनाए रखें। उपमुख्यमंत्री ने इस बात पर खुशी जताई कि विश्वविद्यालय में अभी 200 छात्राएं पीएचडी कर रही हैं।


उपमुख्यमंत्री ने कहा कि एक रिपोर्ट के अनुसार 20 साल के कुल 86 स्कूल टॉपर्स में लड़कियां मात्र 31 हैं। विदेशों में अवसर पाने वाले टॉपर्स में भी लड़के अधिक हैं। इससे हमारे समाज के सॉफ्टवेयर या ऑपरेटिंग सिस्टम में मौजूद लैंगिक पूर्वाग्रह का पता चलता है। लेकिन यह विश्वविद्यालय इस कमी को ठीक करने के लिए हमारी बेटियों की प्रतिभा निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि हम अपने विश्वविद्यालयों की सफलता का आकलन उसकी गुणवत्ता के आधार पर करें। कितने का पैकेज मिला, इसके बजाय किन विषयों पर कितने रिसर्च हुए और हमारे बच्चों ने खुद कितनी कंपनियां बनाई, इस आधार पर होना चाहिए। इस विश्वविद्यालय की छात्राओं को शानदार प्लेसमेंट और बड़े पैकेज मिलना हमारे लिए गर्व की बात है। लेकिन हम सिर्फ नौकरी तलाशने वालों की फैक्ट्री बनने के बदले नौकरी देने वाली उद्यमिता सोच विकसित करने का लक्ष्य रखें।