राग वसंत के आगमन का समय, प्रकृति की सुंदरता में लगेंगे चार चांद

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भारतीय संस्कृति और सभ्यता में त्योहारों की परंपरा बहुत भावुक करने वाली है। प्रकृति से इतना अनंत प्रेम जैसे इस सभ्यता की परंपराएं प्रकृति और मानव को अभिन्न मानती हैं। अतीत से वर्तमान तक इस परंपरा के लोक और प्रकृति के बीच में लगातार संवाद और जुड़ाव हमें बहुत ही सरल बना देता है। सभी त्योहारों का अपना महत्व होता है। हम अपने आसपास के समाज का हिस्सा हैं, जिससे हमारी एक सामाजिक पहचान है, इसलिए हमें सामाजिक त्योहारों वास्तविक मूल्य समझ आता है। हम राजनीतिक प्राणी भी हैं, इसलिए संविधान दिवस, मतदाता दिवस आदि राजनीतिक सजगता व भाव के साथ मनाते हैं।

दशहरा, दीवाली, होली, रमजान, ईद, क्रिसमस आदि हमारी धाíमक आस्था और धाíमक पहचान को और सुदृढ़ करते हैं। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती हमें भारत और भारतीयता के सजग प्रहरी बनाते हैं। यह सब हमें राष्ट्रीयता का अहसास कराते हैं। मातृभूमि से जोड़ते हैं और यह मातृभूमि का राग देश है। भाषाओं के विकास से उपजे साहित्यिक त्योहार हमें अलग अलग भाषाओं और उनसे संबंधित क्षेत्रों से जोड़ते हैं। इसी तरह संगीत गीत महोत्सव हमें नाद और वाद्ययंत्रों के समीप ले जाते हैं और रागों से परिचय कराते हैं। ये सभी त्योहार हमारी मूल पहचान पर कुछ अलग नई पहचान जोड़ते हैं, जैसे सामाजिक, राजनीतिक, धाíमक, राष्ट्रीय या कला-संगीत संबंधी पहचान।


पर वसंत ऐसा नहीं है। सूर्य का मकर में संक्रमण और वसंत का आगमन प्राकृतिक त्योहार है, इसलिए वह आपको विशुद्ध मानव बना देते हैं। हमारे अंतर्भाग में सुप्त मानव को दोबारा जगा देते हैं। बिल्कुल उस अंकुरित बीज की तरह एक मौका देते हैं, मानवता की नौका पर चलकर इस भवसागर को पार करने का। बाकी त्योहारों का अहसास आपको हो या न हो यह आपके सामाजिक, आíथक, राजनीतिक, धाíमक स्तर पर निर्भर करता है, परंतु प्राकृतिक त्योहार जैसे सूर्य का मकर में प्रवेश हो, वसंत का आगमन हो, ये सबके लिए समान है।

वसंत के आगमन पर प्रकृति पूजन की प्रेरणा तो हमें मिलती ही है। इस बार तो इसका महत्व और भी बढ़ गया है। कोरोना महामारी के दौर में मानव समाज ने प्रकृति के महत्व को समग्रता में समझा है और वह जान गया है कि जितना हम प्रकृति के नजदीक रहेंगे और प्राकृतिक स्वरूप में रहेंगे, बीमारियों से उतने ही दूर रहेंगे। जहां तक वसंत ऋतु की बात है तो इसे सभी ऋतुओं में उत्तम माना जाता है। सूर्य का मकर में प्रवेश जो आदिकाल से मानव के आराध्य हैं, जिनकी ऊष्मा से हम सब संचालित होते हैं, वह स्वयं ऊर्जावान हुए हैं। सोचिए वह कितना ताकतवर दिन होगा, जब हमारे इष्ट को नया सवेरा मिला हो।


अगर इस नए सवेरे की भोर मकर संक्रांति है तो नए दिन की शुरुआत वसंत ऋतु है। माघ से शुरू हुआ यह भोर कालीन संक्रमण फाल्गुन और चैत्र के आते-आते एक नूतन दिवस के रूप में प्रकट हो जाता है। माघ संक्रमण का समय है अर्थात इस नूतन दिवस का ब्रrा मुहूर्त है। फाल्गुन भोर है सुबह होने का अहसास है। चैत्र सुबह-सुबह चेतना के जाग्रत होने का समय है। सुबह ज्ञान अजर्न की बेला होती है। इसलिए वसंत ज्ञान की पूजा है। इतना ही नहीं, उत्तर और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से में ज्ञान की देवी मां सरस्वती का वंदन है वसंत।


खिलते वसंत में प्रकृति मुस्कुरा रही होती है। तब लगता है कि नया वर्ष आ रहा है। ऋतु बदल रही है। हम सबकी जननी धरती स्वयं जन्म दे रही है। संपन्न फसल से मां धरती सुशोभित है, जिससे हमारे भू-क्षेत्र का उत्सव जगजाहिर है। प्रत्येक भौगोलिक परिवेश पर अपना-अपना प्राकृतिक त्योहार आता है, पर अलग-अलग समय पर आता है। यह भारत वर्ष का त्योहार है। वसंत हमारे भूखंड के नववर्ष की शुरुआत का समय भी है। यह शीत की घनी निर्जन रातों के छंटने का समय है। पेड़ों के सुशोभित होने का समय है।


फूलों के खिलने का समय है। जल जीवन के हरा-भरा होने का समय है, प्रकृति के झूमने का समय है, पेड़ों में नवपल्लव आगमन का समय है। पावन पवन के चलने का समय है। कोयल के कूकने, उसके गान का समय है। ये राग वसंत का समय है। तन में स्फूíत, मन में उल्लास, बुद्धि में विवेक, चेतना और हृदय में भावों के जागने का समय है। नई शुरूआत का समय है। यह परिवíतत नियति पहचानने का समय है। प्रकृति की नियति से मानव के जुड़ने का समय है।


प्रकृति के इस ऋतु चक्र को जीवन चक्र से मिलाना है। मकर संक्रमण में उठना है, वसंत के साथ सीखना है, ग्रीष्म में तपना है, सावन में भीगना है, शरद की शाम का दर्शन करना है, हेमंत और शिशिर में दक्षिणायन का अंत करना है। ऐसा नहीं है कि बसंत में कोई कष्ट नहीं है। पर वसंत का अर्थ है कि इस नए उल्लास में सब कष्टों को भूल जाना। पुराने का झड़ना नए का खिलना बसंत है। नए होने की प्रक्रिया में पुराना जाएगा। इसमें द्वंद्व रहेगा, पर नए के आने के लिए पुराने का जाना नितांत आवश्यक है।


वसंत ऋतु का आगमन स्वयं में प्रकृति के लिए तो परिवर्तनकारी घटना है ही, मानव समाज के लिए भी इसके व्यापक निहितार्थ हैं। खासकर महामारी के बाद तो इसका महत्व और बढ़ गया है।