मिलिए कुछ उभरते हुए RJ से और उन्हीं से जानें उनके जुनून की कहानी…

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सूचना के आदान-प्रदान, लोगों को शिक्षित व जागरूक करने, उनका मनोरंजन करने से लेकर बच्चों, किशोरों एवं युवाओं को अपनी बात कहने का एक मंच दिया है एफएम रेडियो ने। कई बार यह उनका दोस्त, साथी एवं राजदार भी बन जाता है। यहां वे बेझिझक अपने मन एवं दिल की बातें रेडियो जॉकी (आरजे) से साझा कर लेते हैं। तभी तो फिल्मी सितारों की तरह रेडियो जॉकी भी किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं माने जा रहे हैं। वे युवाओं में जुनून एवं आत्मविश्वास भी भर रहे हैं। आज मिलते हैं कुछ चुनिंदा उभरते हुए आरजे से और उन्हीं से जानते हैं उनके जुनून की कहानी…

अपने पैशन एवं सपने को पूरा करने के लिए मुंगेर (बिहार) से जयपुर (राजस्थान) और फिर अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) तक का सफर पूरा किया है आरजे स्वतंत्र ने। एक समय था, जब वह शिक्षण के पेशे से जुड़े थे। मन नहीं लगा, तो अच्छी सैलरी वाली वह नौकरी छोड़ निकल पड़े अपने सपने को जीने के लिए। इसके लिए परिवार में विरोध भी हुआ, लेकिन उन्होंने तो ठान लिया था। ‘माई एफएम’ रेडियो में एक साल की इंटर्नशिप के बाद अगले दो साल ‘रेडियो नोएडा लोकमंच’ में काम किया। साथ ही, कॉमर्शियल रेडियो में नौकरी की कोशिशें जारी रखीं। आखिरकार अलीगढ़ स्थित ‘रेडियो करेंट’ में आरजे बनने का अवसर मिला।


बीते दो साल से यहां कार्यरत हैं। स्वतंत्र बताते हैं, ‘2008 के आसपास जब आरजे को लेकर उतना क्रेज नहीं था, तब जयपुर में मैं आरजे र्काितक, आरजे पुनीत, आरजे मोहित को सुना करता था। उन्हीं से प्रेरणा मिली और मैंने रेडियो जॉकी बनना तय किया। अब मेरा सपना पूरा हुआ है। रेडियो में एक बंद दरवाजे के भीतर अकेले बात करनी होती है, जिसका अपना मजा है। सुनने वाले को भी यह एहसास होता है कि सिर्फ उसी से बात की जा रही है। मैं अपनी आवाज पर काम करता हूं। इसके लिए नियमित योग-प्राणायाम करता हूं।’ स्वतंत्र बॉलीवुड से जुड़े शोज करते हैं। एक शो 1990 के दशक के गीतों पर आधारित है। इसमें गानों के ऊपर पूरी चर्चा होती है कि उन्हें किसने लिखा, किसने स्वरबद्ध किया। किस एक्टर पर फिल्माया गया…आदि।


पैशन से पूरा हुआ सपना: पंजाब के छोटे से शहर नंगल के शिवम वशिष्ठ को भी बचपन से ही रेडियो सुनना पसंद था और म्यूजिक से गहरा लगाव। इनका एकमात्र सपना था कि नाम के आगे आरजे लिखें। ज्यादा जानकारी नहीं होने के बावजूद अपने पैशन का पीछा करते रहे। पढ़ाई भी जारी रखी। दिल्ली के दयाल सिंह कॉलेज से इंग्लिश ऑनर्स किया। एक रोज अचानक इंस्टाग्राम पर रेडियो मिर्ची का विज्ञापन दिखा तो तुरंत अप्लाई कर दिया। हालांकि ऑडिशन में मौज़ूद भीड़ को देखकर आत्मविश्वास डगमगा गया। फिर भी धीरज रखा। चार राउंड ऑडिशन और इंटरव्यू देने के बाद आखिरकार उनका सलेक्शन हो गया और शिवम बन गए आरजे शिवि।


वह बताते हैं, ‘आयुष्मान खुराना को बचपन से ही अपना रोल मॉडल मानता हूं। म्यूजिक मेरा पैशन है। इस फील्ड में पहचान बनाने के लिए मुझे रेडियो सबसे अच्छा माध्यम लगता है। रेडियो मिर्ची, पंजाब के लिए एंकरिंग के अलावा मोबाइल के गाना एप के लिए ऑनलाइन एंकरिंग भी करता हूं। चूंकि आजकल आरजे बनने के लिए मास कम्युनिकेशन की डिग्री अनिवार्य कर दी गई है, इसलिए जॉब के साथ कुरुक्षेत्र यूनिर्विसटी से पोस्ट ग्रेजुएशन भी कर रहा हूं।’ शिवि की मानें, तो आरजे बनने के लिए अच्छी कम्युनिकेशन स्किल चाहिए। साथ ही, आपने आसपास के लोगों और माहौल को बारीकी से देखने और समझने की क्षमता भी। तभी आपकी बातें श्रोताओं के दिलों तक पहुंच सकेंगी और वे खुद को आपके साथ कनेक्ट कर पाएंगे। रेडियो ऐसा सशक्त माध्यम है, जिसके जरिये लाखों-करोड़ों लोगों तक अपने दिल की बातें पहुंचाई जा सकती हैं।

देसी अंदाज से बनाई अलग पहचान: एफएम रेडियो पर दो आरजे जब स्थानीय बोली में अपनी जिंदगी से जुड़ी बातें करते थे, तब कुलदीप उसे बहुत ध्यान से सुनते थे। वह उनसे अपनी जिंदगी को जोड़कर देख पाते थे। उनका देसी अंदाज अच्छा लगता था। धीरे-धीरे कुलदीप ने खुद से पूछना शुरू किया, क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूं? क्या मैं भी आरजे बन सकता हूं? फिर उन्होंने इसमें दिलचस्पी लेनी शुरू की और एक दिन सीधे रेडियो मिर्ची के दμतर पहुंच गए। वहां ट्रेनिंग लेने की सलाह दी गई। वह वापस लौटे और जयपुर के एक स्थानीय संस्थान में दाखिला ले लिया। बताते हैं कुलदीप, ‘मेरी खुशी का तब ठिकाना नहीं रहा, जब इंस्टीट्यूट में मेरे पसंदीदा आरजे फैकल्टी बनकर आए। उनसे इस प्लेटफॉर्म की तमाम बारीकियां सीखने को मिलीं। मेरे लिए वे किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं थे।’ कोर्स करने के बाद भी हालांकि कुलदीप को काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन वह थके नहीं और न ही मायूस हुए। आखिर में एक दिन उन्होंने बतौर आरजे रेडियो जयपुर ज्वाइन कर लिया। आज वह यहां दो से तीन प्रोग्राम करते हैं। वह आगे कहते हैं, ‘जिंदगी के दो ही पहलू होते हैं- हार या जीत। मैं जल्दी हार नहीं मानता। रेडियो जॉकी की अपनी चुनौतियां हैं। निरंतर खबरों एवं घटनाओं से अपडेट रहना पड़ता है।’


अनाथाश्रम से निकल रेडियो में बनाया मुकाम: ‘रेड एफएम’ के आरजे रफीक को बचपन से रेडियो सुनने का शौक था। कश्मीर में उस समय खबरों के लिए ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ चलता था। उसके शोज सुनते थे वह। वहीं से रेडियो की दुनिया को जानने की तड़प हुई, लेकिन अचानक पिताजी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु होने के कारण उन्हें अनाथाश्रम भेज दिया गया। बताते हैं रफीक, ‘वहां मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। जब कॉलेज पहुंचा तो बाहर की दुनिया के बारे में जाना। वहीं पता चला कि स्टेज के पीछे भी एक भरी-पूरी दुनिया होती है और मेरे लिए स्कोप वहां पर है। जो शौक बचपन से पाल रहा था, उसे एक रास्ता मिल गया।’ धीरे-धीरे वह शोज होस्ट करने लगे। आकाशवाणी में काम किया। वह कहते हैं, ‘एफएम बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म है। मैं मानसिक स्वास्थ्य पर बात करता हूं। यूथ के मसलों को सामने लाता हूं। कश्मीर में अब अच्छा माहौल है। इसकी बात करता हूं। रेडियो मेरे रग-रग में बसता है।’


विश्व रेडियो दिवस: स्पेन रेडियो एकेडमी ने पहली बार 2010 में विश्व रेडियो दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था। उसके बाद 2011 में यूनेस्को की महासभा के 36वें सत्र में हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा हुई। उसके बाद 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसकी मंजूरी दी। इस वर्ष की थीम है, ‘न्यू वल्र्ड, न्यू रेडियो (इवोल्यूशन, इनोवेशन ऐंड कनेक्शन)’ ।

कम्युनिटी रेडियो से मिला लोगों से जुड़ने का मौका: Mass कम्युनिकेशन में एमफिल करने के बाद जब कम्युनिटी रेडियो डेवलपमेंट कम्युनिकेशन के बारे में पढ़ना शुरू किया, तो इसमें रुचि पैदा हुई। मुझे पता चला कि कैसे किसी भी क्षेत्र के विकास में कम्युनिटी रेडियो महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मुझे लिखना पसंद है, नये-नये लोगों से बातें करना पसंद है, लेकिन किसी विषय पर बोल भी सकती हूं, इसका विश्वास नहीं था। 2013 में जब दिल्ली में ‘ज्ञानवाणी’ (एजुकेशनल रेडियो एफएम) में कैजुअल अनाउंसर के लिए ऑडिशन दिया और उसमें मेरा सेलेक्शन हुआ,तब विश्वास आया कि मैं बोल सकती हूं। कुछ समय वहां काम करने एवं सीखने के बाद कम्युनिटी रेडियो, ‘रेडियो मधुबन’ की जानकारी मिली और मैं यहां आ गई। पिछले तीन-चार वर्षों से शो कर रही हूं।


‘युवा मंच’ शो में स्थानीय युवा अपनी परेशानियां, गांव की बातें या सामाजिक पहल आदि के बारे में बातें साझा करते हैं कि कैसे वे एक चेंजमेकर की भूमिका निभा रहे हैं। इसी प्रकार,‘मधुबन अनप्लग्ड’ म्यूजिकल शो में हम स्थानीय टैलेंट को प्लेटफॉर्म देते हैं। वहीं,‘बच्चों की दुनिया’ शो में सीधे बच्चों से उनके सपनों, डर,स्कूल आदि के बारे में बातें करते हैं। रेडियो के जरिये विभिन्न आयु वर्ग के लोगों से जुड़ना उत्साह बढ़ाता है। श्रोताओं को भी आरजे अपने से लगने लगते हैं। यही अपनापन उन्हें बेझिझक अपने मन की बात साझा करने के लिए प्रेरित करता है।


विदेश में भारतीय संस्कृति से करा रहीं परिचय जमाना चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए,लेकिन रेडियो का दौर आज भी लोगों के जेहन में मधुर संगीत की तरह हमेशा तरोताजा रहता है। रेडियो केवल सूचना का माध्यम ही नहीं है, बल्कि इसमें मनोरंजन भी शुमार हो गया है। ऐसे में अब आरजे की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। सात समंदर पार अमेरिका में अपनी मातृभाषा को रेडियो के जरिये दुनिया के मानचित्र पर स्थापित करना आसान नहीं था, लेकिन पिछले कई वर्षों से कैलिफोर्निया में प्रवास करने के दौरान मैंने हिंदी के लिए कई अनोखे काम किए हैं। जैसे, रेडियो के जरिये लोगों को भारतीय संस्कृति से परिचित कराती हूं। साथ ही, विदेश में रह रहे भारतीय बच्चों को भारतीय सनातन संस्कृति के बारे में बताने-समझाने का पूरा प्रयास कर ती हूं।

उन्हें अपने देश के राष्ट्रीय पर्वों, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि के बारे में भी बताती हूं। मैं नोएडा से हूं। 2008 में अपने करियर की शुरुआत की, जिसके बाद मध्य प्रदेश के इंदौर में ‘रेड एफएम’ में काम किया। उसके पश्चात 2012 से कैलिफोर्निया में ‘रेडियो जिंदगी’ के साथ काम कर रही हूं। यह अमेरिका का सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क है। कैलिफोर्निया में इसकी पहुंच तमाम दक्षिण एशियाई लोगों तक है। मैं भारत में भी विभिन्न कॉलेजों के छात्रों के साथ ऑनलाइन कार्यशालाओं के माध्यम से रेडियो के रोल के बारे में लोगों को प्रशिक्षित कर रही हूं।