बेतरतीब विकास की भेंट चढ़ गए 500 से अधिक जोहड़ और तालाब, लगातार गिर रही संख्या

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पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन से ही किसी शहर की आबोहवा में जीवंतता आती है। विडंबना यह है कि जहां से पूरे देश में पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन की कमान संभाली जाती है, वही दिल्ली खुद इसके प्रति पूरी तरह लापरवाह है।

आलम यह है कि बीते करीब दो दशक में पांच सौ से अधिक जोहड़-तालाब बेतरतीब विकास की भेंट चढ़ गए हैं। हालांकि, सरकारी स्तर पर अब इनके संरक्षण के प्रयास शुरू हो गए हैं, लेकिन इनकी रफ्तार बहुत धीमी है।

एक अध्ययन के मुताबिक करीब 20 साल पहले दिल्ली में 900 से अधिक जलाशय हुआ करते थे, लेकिन तेजी से हुए विकास और अवैध निर्माण व अतिक्रमण के चलते ये धीरे-धीरे लुप्त हो गए। फिलहाल इनकी संख्या 400 के आसपास है, लेकिन इनमें से ज्यादातर को पानी की कमी के चलते तालाब नहीं कहा जा सकता, बल्कि ये नमभूमि यानी वेटलैंड ही रह गए हैं।


इनके संरक्षण के लिए केंद्र सरकार ने वेटलैंड कंजर्वेशन एंड मैनेजमेंट रूल्स, 2017 तैयार किए हैं। 2020 में इन्हें संशोधित किया गया। एनजीटी के आदेश पर राजधानी में वेटलैंड का संरक्षण करने के लिए दिल्ली सरकार ने अप्रैल 2019 में 23 सदस्यीय दिल्ली स्टेट वेटलैंड अथोरिटी का गठन किया। इस अथोरिटी ने अभी तक 278 वेटलैंड चिह्न्ति किए हैं, जिन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जाएंगे। इसके अलावा अथोरिटी की तरफ से नरेला में टीकरी खुर्द झील के संरक्षण का कार्य भी चल रहा है और स्थानीय लोगों को वेटलैंड मित्र बनाकर भी इन्हें बचाने की कोशिश की जा रही हैं।


यह होती है नमभूमि

नमभूमि यानी ऐसी जमीन जहां भूजल स्तर अच्छा हो और जमीन में नमी बनी रहती हो। ऐसी जमीन आमतौर पर नदियों के किनारे मिलती है या फिर जहां वर्षा जल संरक्षण की व्यवस्था हो। दिल्ली में भी यमुना के बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में ऐसे काफी क्षेत्र रहे हैं। ऐसी जमीन खेती ही नहीं, पारिस्थितकी तंत्र के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होती है।

दिल्ली के ज्यादातर तालाब इस समय काफी खराब हालत में हैं। इन पर मलबा डालने से ये खत्म हो रहे हैं। तालाबों को बचाने के लिए तीन काम जरूरी हैं। पहला यह कि इनमें सालिड वेस्ट किसी भी कीमत पर न जाए। दूसरा यह कि सीवर का पानी इनमें न जाए और तीसरा इन्हें बचाने के लिए समन्वित प्रयास किए जाएं।


(प्रो. सी आर बाबू, वनस्पति विज्ञानी)

दिल्ली में पूरे साल में सिर्फ 650 एमएम के करीब बारिश होती है। यह पर्याप्त नहीं है। इसलिए नदी में बहाव को बचाए रखने के लिए तालाब काफी जरूरी है।