बदलाव के बाल-युवा दूत जिनके काम को देख आप भी रह जाएंगे हैरान, पढ़ें रोचक स्‍टोरी

0 64


बचपन में शर्मीले होने के बावजूद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक महान नेता एवं प्रेरक व्यक्तित्व बने,क्योंकि उन्हें खुद पर और अपने सिद्धांतों पर विश्वास था। उन्हें जो सही लगा,वह किया। शांति एवं प्रेम से मुश्किलों-चुनौतियों पर विजय पायी। कभी हार नहीं मानी, बल्कि धैर्य के साथ अनवरत प्रयास करते रहे और अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया। आप सबके बापू की ही तरह आज अनेक बच्चे-किशोर-युवा हैं, जो शांति एवं दृढ़निश्चय के बदल पर बदलाव के वाहक बन रहे हैं…

मणिपुर की मूल निवासी नौ वर्षीय लिसिप्रिया पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी आवाज उठाती हैं। देश-विदेश के मंचों से वे इससे संबंधित नीतियों में परिवर्तन को लेकर समय-समय पर प्रदर्शन भी करती हैं, लेकिन उनका तरीका बेहद शांतिपूर्ण होता है। अब तक 32 देशों की यात्रा कर चुकीं लिसिप्रिया ने कई वैश्विक सम्मेलनों में हिस्सा लिया है, जिसमें 2019 में स्पेन के मैड्रिड में हुआ यूनाइटेड नेशंस क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस (सीओपी25) भी एक था। वह बताती हैं, ‘जब मैंने मूवमेंट की शुरुआत की थी,तो अकेली थी। आज विश्वभर में लाखों समर्थक हैं। बीते दो वर्षों में मैंने दुनियाभर में 400 से अधिक संस्थानों में बतौर स्पीकर अपना वक्तव्य दिया है। मैंने अपना बचपन, मौज-मस्ती सब छोड़ दी है,ताकि अपने अभियान को अंजाम तक पहुंचा सकूं। यात्रा के क्रम में मैं कभी एयरपोर्ट, कभी फ्लाइट में पढ़ लेती हूं। क्योंकि एक्टिविज्म के साथ पढ़ाई भी जरूरी है।’


पेंटिंग,स्वीमिंग एवं दोस्तों के साथ खेलने की शौकीन लिसिप्रिया ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि स्कूलों में क्लाइमेट एजुकेशन को अनिवार्य बनाया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि देश के प्रत्येक स्कूली बच्चे कम से कम 10 पौधे जरूर लगाएं। इससे वायु प्रदूषण, बाढ़, सूखा, लू एवं अन्य पर्यावरणीय संकट से निपटा जा सकेगा। वह खुद खाली समय में पौधे लगाना पसंद करती हैं। अब तक उत्तराखंड,ओडिशा,कर्नाटक एवं अफ्रीका में 52 हजार से अधिक पौधे लगा चुकी हैं।


‘संडे फॉर सिक्योर फ्यूचर’ अभियान

गांधी जी एक सामान्य परिवार से थे। गाजियाबाद के सातवीं के स्टूडेंट, बारह वर्षीय आरव सेठ भी खुद को एक सामान्य बच्चा समझते हैं, लेकिन उनका नजरिया बहुत व्यापक एवं स्पष्ट है। आठ वर्ष की उम्र से वे पर्यावरण को बचाने की मुहिम में जुटे हैं। भावी पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल हो, इसके लिए वे वन टाइम प्लास्टिक का इस्तेमाल कम कर अधिक से अधिक पौधे लगाने की कोशिश करते हैं। अकेले दिल्ली-एनसीआर में उन्होंने अपनी टीम (मिशन 100 करोड़ ट्री) के साथ मिलकर साढ़े तीन हजार से अधिक पौधे लगाए हैं। वह दोस्तों को उनके जन्मदिन पर पौधे तोहफे में देते हैं। अभिभावकों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं।

पौधारोपण के अलावा आरव यमुना एवं हिंडन नदी की सफाई के अभियान से भी जुड़े हैं। उन्हें क्रोडेरा (वैश्विक ऑनलाइन फंड रेजिंग प्लेटफॉर्म) द्वारा जीईसी यंग चेंजमेकर अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। वे संयुक्त राष्ट्र के एसडीजी गोल्स (2030) से भी जुड़े हैं। वह बताते हैं, ‘मुझे नीति आयोग, डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, सामाजिक न्याय मंत्रालय एवं एमएसएमई की संयुक्त पहल सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) के लिए ‘बाल दूत’ बनने का अवसर मिला है। मैं मानता हूं कि आसपास के लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने के लिए उन्हें सही तरीके से शिक्षित किया जाना जरूरी है। इसके लिए मैं ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करता हूं। साथ ही, अपने यूट्यूब चैनल (अन-अर्थ), ब्लॉग एवं पॉडकास्ट (रिंग द बेल) के माध्यम से भी अवेयरनेस लाने की कोशिश करता हूं। कंटेंट जेनरेट करने से पहले बाकायदा रिसर्च करता हूं।’ आरव ‘संडे फॉर सिक्योर फ्यूचर’ नाम से एक मूवमेंट चला रहे हैं, जिसमें वे लोगों को पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करते हैं। इसका देश-विदेश में अच्छा असर हो रहा है। अनेक बच्चे-किशोर इस अभियान से जुड़े हैं। इसमें चार वर्ष की एक बच्ची भी शामिल है, जो हर रविवार को पौधा लगाना नहीं भूलती।


लड़कियों के लिए बन रहीं मिसाल

हरियाणा के दौलतपुर गांव की अंजू वर्मा का मानना है कि अगर युवा चाह लें, तो कुछ भी असंभव नहीं है। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक ट्रक ड्राइवर की बेटी बाल विवाह,बाल मजदूरी, भ्रूण हत्या,घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाएगी। समाज को जागरूक करेगी। उसे अलग-अलग मंचों पर सम्मानित किया जाएगा। लेकिन इरादा पक्का था, तो सब संभव हो गया। ‘बुलंद उड़ान’ नामक स्वयंसेवी संगठन की संस्थापक, 18 वर्षीय अंजू समाजसेवी होने के साथ-साथ टेडएक्स स्पीकर भी हैं। वह कहती हैं, ‘दुनिया चाहे जितनी प्रगति कर रही हो, लेकिन गांवों में लड़कियों व महिलाओं की स्थिति में खास अंतर नहीं आया है।

पर्दा प्रथा, बाल विवाह, अशिक्षा जैसी अनेक चुनौतियों से उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। वैसे तो हम प्रदेश में 100 के करीब बाल विवाह रोकने में सफल रहे हैं, लेकिन जब तक अभिभावकों की मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा, लड़कियों को बोझ समझना बंद नहीं होगा, समस्या बनी रहेगी। अनाथ व अकेली लड़कियों की हालत तो औऱ भी गंभीर है। इसलिए हम उनके लिए शेल्टर होम बनाने व उन्हें कौशल प्रशिक्षण देने की योजना पर काम कर रहे हैं।‘ क्या कभी डर जैसा नहीं सताता, पूछने पर अंजू बताती हैं, ‘जब हम सच्चाई के रास्ते पर चलते हैं, तो डर किस बात का। लड़कियों के साथ यही तो सबसे बड़ा रोग है, लोग क्या कहेंगे, मैं इस पर ध्यान नहीं देती। मेरा तो एक ही सपना है। भारत को चाइल्ड फ्रेंडली बनाना। किसी बच्चे के साथ कुछ गलत न हो। मैं जॉब सीकर नहीं, क्रिएटर बनना चाहती हूं। एक मिसाल बनना चाहती हूं, जिससे कि दूसरी लड़कियां एवं युवा भी प्रेरित हों।‘

‘लेटर्स फॉर चेंज’ मुहिम की रखी नींव

दोस्तो, सड़कों पर बेवजह गाड़ियों के हॉर्न आपने भी सुने होंगे। ट्रैफिक में जब कोई अनावश्यक रूप से हॉर्न बजाता है, तो थोड़ा गुस्सा भी आता है। आठवीं में पढ़ने वाली 13 साल की महिका को भी यह बात अक्सर खटकती थी। उन्होंने अपने डैड से यह बात शेयर की, जिन्होंने महिका को एक पत्र में अपने विचार लिखने को कहा, जिसे बाद में आनंद महिंद्रा को पोस्ट किया गया। एक दिन वह पत्र वायरल हो गया। इस तरह, वर्ष 2019 में शुरुआत हुई ‘लेटर्स फॉर चेंज’ इनिशिएटिव की,जिसका उद्देश्य बच्चों को एक ऐसा मंच देना है, जहां वे अपनी बातें, अपने मुद्दे पत्रों के जरिये शेयर कर सकें।

महिका बताती हैं, ‘यह बच्चों का और बच्चों के लिए एक मूवमेंट है। बच्चों के अनेक मसले होते हैं, जिन पर कोई ध्यान नहीं देता। ऐसे में हम उन्हें पत्र लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। बच्चे उन्हें वाट्सएप पर साझा करते हैं। इसके बाद चुनिंदा पत्रों को हम वेबसाइट पर स्थान देते हैं। कुछ पत्रों को संबंधित विभाग या व्यक्ति तक पहुंचाने का भी प्रयास रहता है।‘ महिका की कम उम्र को देखते हुए पिता दुष्यंत उन्हें पूरा तकनीकी सहयोग देते हैं। लेकिन अंतिम फैसला उनका ही होता है यानी महिका को अच्छी तरह मालूम होता है कि वह क्या और कैसे करना चाहती हैं। सिर्फ उसके एग्जीक्यूशन में पिता मदद करते हैं। इसके अलावा कॉलेज स्टूडेंट्स वॉलंटियर के रूप में जुड़े हैं। उन्होंने ही वेबसाइट भी डेवलप की है।


बच्चों के विचारों को सुनने की है जरूरत

हमें अलग-अलग भाषा में लिखे बच्चों के पत्र मिलते हैं, जिसका ट्रांसलेशन किया जाता है। लेकिन उन पत्रों को पढ़कर बहुत कुछ जानने को मिलता है कि वे खुद किसी विषय पर क्या सोचते हैं? क्या राय रखते हैं? कई बच्चे समस्याओं के साथ समाधान भी लिख भेजते हैं। मुझे खुशी है कि आज बच्चे विभिन्न मंचों से अपने विचार रख पा रहे हैं। सोशल मीडिया ने उनके सामने विकल्प खोले हैं। लेकिन वही एकमात्र या आखिरी मंच नहीं है। जरूरी यह है कि बच्चों-किशोरों-युवाओं की बातों को सुना जाए, क्योंकि वे ही देश के भविष्य हैं। हां, बेशक बच्चों के पास मताधिकार नहीं है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी भी नहीं मिले।

बाल यौन शोषण के खिलाफ मुहिम

मैंने लॉ की पढ़ाई करते हुए कभी सोचा नहीं था कि एक दिन बच्चों के मुद्दे पर काम करूंगी। लेकिन इंटर्नशिप के दौरान हुए अनुभवों ने मुझे नौकरी से इतर कुछ करने के लिए प्रेरित किया। अपने संस्था एवं वॉलंटियर्स की मदद से बाल यौन शोषण को लेकर जागरूकता लाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए स्कूलों में वर्कशॉप्स आयोजित की जाती हैं। टेक महिंद्रा फाउंडेशन के साथ मिलकर सरकारी स्कूल के शिक्षकों को प्रशिक्षित भी किया जा रहा है। हम चाइल्ड फ्रेंडली रिसोर्सेज तैयार करते हैं। जैसे भारत में बाल यौन शोषण को लेकर कोई किताब नहीं थी। हमने इस मुद्दे पर एक कॉमिक बुक एवं एनिमेशन फिल्म भी लॉन्च किया है,जो साइन लैंग्वेज में है।