फ़िल्मकारों के लिए भी प्रेरणास्रोत रहे सुभाष चंद्र बोस, आ चुकी हैं इतनी वेब सीरीज़ और फ़िल्में

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‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ के नारे से भारतीयों के हृदय में देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने का जज्बा जगाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती पराक्रम दिवस के तौर पर मनाई जाएगी। अपने हक के लिए उन्होंने संघर्ष करना सिखाया। भारतीय इतिहास के युग पुरुष नेताजी सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व प्रत्येक देशवासी के लिए प्रेरणा का सबब होने के साथ ही भारतीय सिनेमा के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। उन पर बनी फिल्मों और वेब सीरीज के जरिए नेताजी के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं से रूबरू कराए जाने की जरूरत को रेखांकित कर रही हैं स्मिता श्रीवास्तव…

अंग्रेजों ने भी मानी नेताजी की ताकत:

नेताजी सुभाष चंद्र बोस देश की आजादी के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लडने के लिए नेताजी ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया। अंग्रेजी हुकूमत को चकमा देकर वह जर्मनी पहुंचे और आजादी के लिए ताकत जुटाने का प्रयास किया। उनके द्वारा इस्तेमाल ‘जय हिन्द’ राष्ट्रीय नारा बन गया। उनका व्यक्तित्व जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए प्रेरित करता है।

श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस- द फॉरगॉटन हीरो’ के लेखक अतुल तिवारी कहते हैं, ‘भारत में करीब तीन लाख अंग्रेज (फौजी वगैरह मिलाकर) करीब 33 करोड़ भारत की आबादी पर शासन करते थे। ब्रिटिश सैन्य अधिकारी क्लाउड जॉन आयर औचिनलेक से जब ब्रिटिश हुकुमत ने पूछा था कि अगर वर्ष 1942 जैसी स्थिति भारत में 1946-47 में दोबारा हुई तो हम काम चला पाएंगे। उनका जवाब था आजाद हिंद फौज की वजह से अब भारतीय फौजी अंग्रेजों के खिलाफ हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि फिर भारत पर राज करने का मतलब नहीं है। यह कथन आजाद हिंद फौज की अहमियत रेखांकित करता है।

वर्ष 2005 में हमारी फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस- द फॉरगॉटन हीरो’ आई। खास बात है कि ‘नेताजी की फौज में बंगाली कम थे। अधिकतर पंजाब या दक्षिण भारत से थे। दक्षिण भारत में सुभाष खासे लोकप्रिय हैं। कोलकाता में उनके घर को ही म्यूजियम बना दिया गया। वहां पर नेताजी के बारे में तमाम जानकारी उपलब्ध है। मेरा सौभाग्य रहा कि आजाद हिंद फौज की रानी लक्ष्मी बाई ब्रिगेड की कैप्टन लक्ष्मी सहगल का सानिध्य मिला। वह आजादी के बाद कानपुर में रहती थीं। मैंने बचपन में उनसे नेताजी की साहसिक कहानियां सुनी हैं।’

कलाकारों में उतर आया देशभक्ति का जज्बा:

फिल्म या शो को बनाने के दौरान इतिहास को जीने का मौका भी मिलता है। वेब सीरीज ‘बोस- डेड/अलाइव’ के निर्देशक पुलकित बताते हैं, ‘आज हमारा देश जहां पर खड़ा हैं, उसकी नींव सुभाष चंद्र बोस ने रखी थी। हमारा चैलेंज यही था कि उनके जीवन संघर्ष को पूरी सच्चाई से दिखा सकें। शूटिंग के दौरान एक सीन में नेता जी बने राजकुमार भाषण देते हैं। मैंने भीड़ में खड़े जूनियर आर्टिस्ट की तरफ देखा तो पाया कि वे सब देशभक्ति का वही जज्बा महसूस कर रहे थे जो राजकुमार कर रहे थे। मेरे दिमाग में यही चल रहा था जब वास्तव में नेताजी ने हजारों लोगों के सामने भाषण दिया होगा तो कितने लोग प्रेरित हुए होंगे। आज अगर हम दो प्रतिशत भी उनके व्यक्तित्व का ले सके तो हम धन्य हो जाएंगे।’

शो की लेखिका रेशु नाथ ने स्क्रीन प्ले लिखने से पहले नेताजी पर 18 किताबें पढ़ी थीं। वह कहती हैं, ‘हर किताब में उन पर अलग टेक था। इतिहास में उन पर बहुत सारी सामग्री है। हमें कहां देखना है यह अहम था। नेताजी ने देश को एकजुट किया। उनके पास ब्लू प्रिंट था कि आजादी के बाद कैसा गवर्नेंस होगा। उन्होंने यूनाइटेड इंडिया का सपना देखा था।’

हमेशा प्रासंगिक रहेंगी देशभक्ति की कहानिया:

कबीर खान ने पहले आजाद हिंद फौज पर डॉक्यूमेंट्री ‘द फॉरगाटन आर्मी’ बनाई थी। कबीर के मुताबिक जब उन्होंने डॉक्यूमेंट्री बनाई तो यह उनके जीवन बदलने वाला अनुभव था। आजाद हिंद फौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों उनके साथ थे। उनके साथ भारत से लेकर सिंगापुर तक तीन महीने तक उस रूट पर यात्रा की थी, जिस पर आजाद हिंद फौज के सैनिक चले थे। वह अनुभव जेहन से कभी निकला नहीं था। उस डॉक्यूमेंट्री को काफी सराहना मिली थी। कबीर चाहते थे कि आजाद हिंद फौज की कहानी ज्यादा लोगों तक पहुंचे। डॉक्यूमेंट्री बनाने के करीब दो दशक बाद उन्होंने आजाद हिंद फौज पर वेब सीरीज ‘द फॉरगॉटन आर्मी-आजादी के लिए’ बनाया।

वेब सीरीज बनाने से उन्हें किरदारों को विकसित करने का मौका मिला। कबीर का कहना है कि यह विषय हमेशा प्रासंगिक रहेगा। इतिहास हमेशा जीवित रहता है। उससे आप हमेशा सीखते हैं।

एक व्यक्तित्व के विविध आयाम:

सुभाष चंद्र बोस हों, भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खान हो या राम प्रसाद बिस्मिल, हमारे देश में सैकड़ों देशभक्त हुए हैं। उनकी जिंदगियां सिर्फ अतीत की कहानियां नहीं हैं। वे हमारे वर्तमान और भविष्य को दिशा देती हैं। अतुल कहते हैं, ‘बड़े चरित्रों की खास बात यह है कि हम उन्हें अलग-अलग कोणों से देख सकते हैं। ऐसा नहीं है कि गांधी पर एक फिल्म बनाकर काम हो गया। श्याम बेनेगल ने ‘द मेकिंग ऑफ द महात्मा’ बनाई, क्योंकि उन्होंने गांधी का साउथ अफ्रीका का हिस्सा नहीं दिखाया था। अभी भी उनके बचपन को हमारे सिनेमा में बहुत एक्सप्लोर नहीं किया गया है। हर चरित्र के अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। उन पर बहुत कुछ बनाने की संभावनाएं हैं।’

लक्ष्य के प्रति समर्पण की सीख सुभाष के व्यक्तित्व से सीखने के संबंध में अतुल कहते हैं, ‘हम लोग आपसी विचार न मिलने पर मनभेद लेकर बैठ जाते हैं। संबंध बिगड़ जाते हैं। सुभाष चंद्र बोस का गांधी से कई बार मतभेद हुआ। लोग कहते हैं गांधी की वजह से उन्हें कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। वो जब भारत से निकल कर जाते हैं और अपनी टुकड़ी बनाते हैं तो उसका नाम महात्मा ब्रिगेड रखते हैं। नेताजी ने ही जर्मनी से सर्वप्रथम गांधी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। उनके विचार गांधी से अलग रहे, लेकिन लक्ष्य एक ही था। हम भी अपना नजरिया रखें, लेकिन आब्जेक्टिविटी न भूले। यही सीखने की चीज है।’

डिजिटल ने दिया विस्तार से कहानी बताने का मौका:

वेब सीरीज ‘बोस-डेड/अलाइव’ में अहम किरदार में दिखे अभिनेता नवीन कस्तूरिया कहते हैं, ‘सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुषों के जीवन के बारे में विस्तार से बताने की जरूरत है। ऐसी कहानियां सिर्फ दो घंटे में नहीं दिखाई जा सकती। इन कहानियों के बताने के लिए थोड़ा लंबा वक्त चाहिए, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म के आने के बाद अब हमारे पास उपलब्ध है। दर्शक भी ऐसी कहानियों में रुचि रखते हैं। हॉलीवुड वेब सीरीज ‘क्रॉउन’ को ही देख लीजिए इसमें इंग्लैंड की रानी के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके चार सीजन आ चुके हैं और चारों हिट रहे हैं। हिंदुस्तान में तो ऐसी बहुत सी शख्सियतें हैं, जिनके जीवन के बारे में वेब सीरीज जैसे लंबे फॉर्मेट में देखना दिलचस्प होगा।

सुभाष चंद्र बोस की छवि में उतरना बड़ी चुनौती श्याम बेनेगल की फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस- द फॉरगॉटन हीरो’ में नेता जी की भूमिका निभाने के लिए सचिन खेडेकर को काफी तपस्या से गुजरना पड़ता था। जर्मनी में कड़ाके की सर्दी में अगर सुबह आठ बजे से शूटिंग शुरू होती थी तो उन्हें चार बजे से तैयार होना पड़ता था। प्रॉस्थेटिक मेकअप लगाकर उनका चेहरा बदला जाता था। उसमें तीन घंटे लगते थे। मेकअप उतारने में एक घंटा लगता था। ‘बोस-डेड/अलाइव’ में सुभाष चंद्र बोस जैसा दिखने के लिए राजकुमार राव ने अपने आधे बाल मुंडवा दिए थे। उन्होंने वजन भी बीस किग्रा बढ़ाया था।

फिल्में और वेब सीरीज

सुभाष चंद्र (1966)- पीयूष बोस की बांग्ला फिल्म में उनके बचपन से लेकर जननायक बनने के सफर को बखूबी दर्शाया गया।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फॉरगॉटन हीरो (2005)- श्याम बेनेगल निर्देशित इस फिल्म में बोस का किरदार सचिन खेडेकर ने निभाया था।
‘राग देश’ (2017)- तिग्मांशु धूलिया ने आजाद हिंद फौज के मेजर जनरल शाहनवाज खान,लेफिटनेंट कर्नल गुरबख्स सिंह ढिल्लों और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रेम सहगल पर लाल किले में चले मुकदमे पर फिल्मे केंद्रित की थी। उस मुकदमे के बहाने आजादी की लड़ाई में सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की भूमिका से भी परिचय होता है।
‘बोस-डेड/अलाइव’ (2017)- सुभाष चंद्र बोस की रहस्यमयी मौत पर आधारित नौ एपिसोड की इस वेब सीरीज में नेताजी की भूमिका राजकुमार राव ने निभाई थी।
द फॉरगॉटन आर्मी: आजादी के लिए (2020)- कबीर खान निर्देशित यह वेब सीरीज आजाद हिंद फौज के बारे में है। इससे पहले कबीर खान 1999 में इसी नाम से डॉक्यूमेंट्री बना चुके हैं।