पैटर्न से पेटेंट की ओर… आज ही सोचनी होगी दस साल बाद क्या होंगी हमरी जरूरतें

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के युवाओं को प्राय: प्रेरित करते रहते हैं, जिससे कि वे नवाचार की राह पर बढ़ते हुए देश को आगे बढ़ाने में अपना सक्रिय योगदान दे सकें। इस क्रम में पिछले दिनों उन्होंने आइआइटी खड़गपुर के 66वें दीक्षांत समारोह को ऑनलाइन संबोधित करते हुए पासआउट छात्रों को ‘पैटर्न से पेटेंट तक’ का प्रेरक सूत्र दिया। इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आपकी डिग्री लोगों के लिए एक आशापत्र है, जिसे आने वाले दिनों में आपको पूरा करना है। आज से दस साल बाद लोगों को जो जरूरतें होंगी, उनके इनोवेशंस के बारे में हमें आज ही सोचना होगा। इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स होने के नाते आप सभी में एक सहज क्षमता होती है चीजों को ‘पैटर्न से पेटेंट तक’ ले जाने की। आप खुद सोचिए कि आपके इनोवेशंस कितने लोगों के जीवन में बदलाव ला सकते हैं। इस मौके पर उन्होंने युवाओं के जीवन में आगे आने वाले सवालों के उत्तर के लिए ‘सेल्फ थ्री’का फार्मूला भी सुझाया यानी सेल्फ कॉन्फिडेंस, सेल्फ अवेयरनेस और सेल्फनेसनेस। तकनीक से परिचित युवा समाज और देश की जरूरतों को समझते हुए इस दिशा में अपने कौशल का भरपूर इस्तेमाल कर सकते हैं।


आत्मनिर्भरता की ओर

यह पहली बार नहीं है, जब प्रधानमंत्री ने देश के युवाओं से आगे आने का आह्वान किया हो। दरअसल, उन्हें दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले देश भारत के युवाओं पर पूरा भरोसा है। वह अच्छी तरह जानते हैं कि देश को आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ाने और दुनिया में अलग पहचान दिलाने का काम हमारे युवा ही कर सकते हैं। यही कारण है कि वे उन्हें प्रेरित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहते। कोविड के बाद युवाओं के उत्साह को बढ़ाने के लिए इस तरह के प्रोत्साहन की और ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है। देखा जाए तो पिछले कुछ वर्षो में देश के युवाओं में इनोवेशन और स्टार्टअप को लेकर दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है। इसका प्रमाण हाल में आई इंटरनेट नेटवìकग प्लेटफार्म लिंक्डइन की वह सर्वे रिपोर्ट भी है, जिसमें कहा गया है कि कोरोना संकट के बावजूद 2020 में भारत में फाउंडर और कोफाउंडर्स वाले जॉब प्रोफेशन में दस फीसद की वृद्धि देखी गयी। ऐसा तब है, जब अमेरिका सहित लगभग पूरी दुनिया में स्लोडाउन बना हुआ है।

सक्रिय पहल की जरूरत

बेशक नई शिक्षा नीति के तहत पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने की सकारात्मक पहल की जा रही है, पर देश की बड़ी युवा आबादी को नौकरी देने के साथ-साथ रोजगार सक्षम बनाने की दिशा में तमाम सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों को सक्रिय व व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है। आज भी ज्यादातर युवाओं का सपना होता है कि वे किसी आइआइटी, आइआइएम या इनके समकक्ष संस्थानों से पढ़कर निकलें, ताकि उन्हें बड़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में शानदार पैकेज मिल सके। ऐसे संस्थानों से निकलने वाले युवाओं की प्रतिभा पर इसलिए कोई संदेह नहीं किया जाता, क्योंकि उन संस्थानों में अध्ययन-अध्यापन के मानक काफी ऊंचे और अपडेटेड होते हैं। लेकिन यही बात देश के अन्य तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों के बारे में नहीं कही जा सकती, चाहे वे सरकारी क्षेत्र के हों या निजी। आइआइटी, आइआइएम और इनके समकक्ष चंद अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में कुछ हजार युवाओं को पढ़ने का मौका ही मिल पाता है। सवाल यह है कि अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर बढ़-चढ़कर दावा करने वाले देश के अन्य शिक्षण संस्थान इनके मुकाबले खुद को क्यों नहीं तैयार कर सकते? जाहिर है बड़े-बड़े दावे और बातें तो हर संस्थान करता है, लेकिन हम सब इन दावों के पीछे की असलियत भी जानते हैं। दरअसल, ऐसा न करने के पीछे कहीं न कहीं उनकी नीयत भी है, जिसकी वजह से शिक्षा के क्षेत्र को भी वे मुनाफे के कारोबार की तरह समझने लगते हैं। बेशक मुनाफा कमाएं, लेकिन महंगी फीस के एवज में छात्रों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा और कौशल हासिल करने का अवसर भी तो उपलब्ध कराएं।


हो गुणवत्ता की परवाह

निजी उच्च शिक्षण संस्थानों को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या वे अपने छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा उपलब्ध कराने की चिंता करते हैं? हां, कुछ गिने-चुने संस्थान बेशक इस दिशा में प्रयासरत रहते हैं। ऐसे संस्थानों में बड़ी कंपनियों द्वारा बढ़िया प्लेसमेंट भी उपलब्ध कराया जाता है। पर बाकी के छात्रों का क्या कसूर है? उन्हें भी अपडेटेड और गुणवत्तायुक्त शिक्षा मिलनी चाहिए, जिसकी बदौलत वे आसानी से नौकरी या रोजगार की राह पर अपनी पहचान बना सकें।


इंडस्ट्री से बढ़ाएं संवाद

जब तक शैक्षणिक संस्थान अपने परिसर में लैब/प्रैक्टिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत बनाने के साथ-साथ इंडस्ट्री के साथ नियमित इंटरैक्शन की दिशा में सक्रिय पहल नहीं करेंगे, उनके यहां पढ़ने वाले छात्र पीछे ही रहेंगे। यह संस्थानों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने छात्रों को इस तरह से तराशें-गढ़ें, जिससे कि वे कहीं भी जाएं तो कोई उन्हें नकार न सके। पर ऐसा तभी होगा, जब उनके छात्र इंडस्ट्री की बदलती जरूरतों के अनुरूप पूरी तरह से कौशलयुक्त होंगे। इंडस्ट्री से बेहतर इंटरैक्शन होने की सूरत में वहां के विशेषज्ञ संस्थान में जाकर वहां के छात्रों को शिक्षित-प्रशिक्षित करने के लिए आगे आएंगे।


अविलंब कुछ इस तरह की व्यवस्था भी की जानी चाहिए, जिससे कोर्स के दूसरे साल से ही छात्रों को इंडस्ट्री के बीच जाकर (घूमने के लिए नहीं) कुछ महीने काम करने का मौका मिले। उन्हें रीयल आउटपुट तैयार करने में हिस्सेदार बनाया जाए। इससे उन्हें सीखने के साथ-साथ अपनी कमियों को जानने और उन्हें दूर करने का अवसर भी मिलेगा। इससे न सिर्फ युवाओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि इन तराशे हुए युवाओं को लेने के लिए इंडस्ट्री में भी होड़ रहेगी।


सरकार करे प्रेरित-प्रोत्साहित

शिक्षण संस्थान अपने छात्रों को इनोवेशन के लिए प्रेरित करें, इसके लिए केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारा भी संस्थानों को प्रोत्साहन पैकेज देने की पहल करनी चाहिए। स्वाभाविक है कि जब किसी संस्थान से कोई युवा विश्वस्तरीय शिक्षा हासिल कर भरपूर कौशल के साथ बाहर निकलेगा, तो इसका लाभ किसी न किसी रूप में समाज और देश को ही मिलेगा। हम अनुकरण करने और सेवा-प्रदाता देश कहलाने के बजाय इन्वेंशन-इनोवेशन करने वाला देश बनने की राह पर तेजी से अग्रसर हो सकेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अगले कुछ वर्षो में इस राह पर बढ़ेगी, जहां हमारे युवाओं को रोजगार से आगे अलग पहचान मिल सकेगी और हम पूरी तरह आत्मनिर्भर भारत बनने की ओर भी तेजी से बढ़ सकेंगे।