पहली बार परेड में शामिल नहीं होंगे बहादुर नौनिहाल

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ऐतिहासिक राजपथ से गुजरने वाली गणतंत्र दिवस परेड में इस बार बहादुर नौनिहाल भी नहीं दिखेंगे। कोरोना संक्रमण के चलते 63 सालों में पहली बार ऐसा हो रहा है, जब प्रधानमंत्री से इन बच्चों का संवाद भी वर्चुबल ही होगा। गौरतलब है कि राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार की शुरुआत सर्वप्रथम पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1957 में की थी। तब से 2018 तक यह पुरस्कार केंद्र सरकार और एक एनजीओ भारतीय बाल कल्याण परिषद (आइसीसीडब्ल्यू) के संयुक्त तत्वावधान में दिए जाते रहे। 2019 में आइसीसीडब्ल्यू के वित्तीय गड़बडि़यों में घिर जाने के कारण केंद्र सरकार ने स्वयं को इससे अलग कर लिया। अब यह पुरस्कार केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की ओर से दिए जा रहे हैं। इनका नाम बदलकर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार कर दिया गया है।

अहम बात यह कि यह बच्चे हर साल गणतंत्र दिवस परेड का भी हिस्सा बनते रहे हैं। कई दशकों तक ये बच्चे परेड में हाथियों पर सवार होकर गुजरते रहे और बाद में हाथियों की जगह खुली जीपों ने ले ली। जब यह बहादुर बच्चे हाथ हिलाकर राजपथ के दोनों ओर तथा टेलीविजन के जरीये परेड देखने वाले तमाम खास एवं आम दर्शकों का अभिवादन करते हैं तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच हर देशवासी भी उनकी वीरता पर गर्व महसूस करता है। लेकिन इस साल पहली बार ये बच्चे गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा नहीं होंगे। जाहिर है कि उनकी कमी भी हर किसी को महसूस होगी।


मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक कोविड-19 संक्रमण का खतरा अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। इसीलिए परेड का आकार घटाया गया है और सांस्कृतिक कार्यकम भी इस बार इसमें शामिल नहीं किए गए हैं। बहादुर बच्चों को लेकर भी जोखिम नहीं उठाया जा सकता। इसी के चलते अबकी बार उन्हें परेड का हिस्सा नहीं बनाया जा रहा। अलबत्ता राष्ट्रपति रामनाथ को¨वद ने उन्हें बधाई दी है तो सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन बच्चों से वर्चुअल संवाद स्थापित करेंगे।

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कोरोना महामारी के कारण इस बार इन बच्चों को दिल्ली नहीं बुलाया जा रहा है। लिहाजा, ये गणतंत्र दिवस परेड में भी शामिल नहीं होंगे। इनकी पुरस्कार राशि इनके बैंक खातों में डाली जा रही है और इनका प्रशस्ति पत्र इन्हें इनके घर के पते पर भेजा जा रहा है।