दिल्ली से सटा एक इलाका, जहां वायु प्रदूषण के डर से सोसायटियों के फ्लैटों की नहीं खुलतीं खिड़कियां

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दिल्ली एनसीआर के लोग वायु प्रदूषण की समस्या से खासे परेशान है। सबसे अधिक परेशानी तो दिल्ली से सटे कौशांबी इलाके के हजारों लोग हैं। यहां के लोग आनंद विहार आइएसबीटी, कौशांबी डिपो, गाजीपुर लैंडफिल, एनएच-9 और अन्य निर्माण कार्यों के दौरान पैदा होने वाले वायु प्रदूषण से सबसे अधिक तंग हैं। यही कारण है कि यहां रहने वाले अधिकतर सीनियर सिटीजन सांस की बीमारी से पीड़ित है।

ये पहला मौका होगा जब यहां की कारवां नामक संस्था वायु पलूशन की समस्या की शिकायत को लेकर हाइ कोर्ट की शरण में गई हो और वहां से संबंधित अधिकारियों को उस समस्या का समाधान करने के लिए निर्देश भी मिला हो मगर उसके बाद भी समस्या जस की तस बरकरार है।

कोर्ट में जब सुनवाई की तारीख होती है तो संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचकर कुछ काम कर देते हैं। वायु प्रदूषण फैलाने वाले कारकों पर रोक लगा दी जाती है। जाम को खत्म करने के लिए अतिक्रमण साफ करवा दिया जाता है। पलूशन फैलाने वाली चीजों को बंद करवा देते हैं। एक्शन की ये रिपोर्ट अदालत में सबमिट कर दी जाती हैं और छुटकारा पा जाते हैं। मगर सच्चाई ये है कि जो लोग वहां रह रहे हैं वो बरसों से यही समस्या झेल रहे हैं।


आलम ये है कि यहां की ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों में रहने वालों ने कई सालों से अपने घरों की खिड़कियां तक नहीं खोली है। घर में आने वाले पलूशन के कणों को रोकने के लिए खिड़कियों को स्थायी तौर पर बंद कर दिया गया है। घर में साफ सुथरी सांस लेने के लिए मशीनें लगा ली गई है। कई घरों में तो कमरे में मौजूद कणों को मापने के लिए भी मशीनें लगाई गई है।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं हुआ काम


वर्ष 2015 में कौशांबी की समस्याओं पर हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी विभागों ने काम नहीं किया। विभागों की लापरवाही देख कारवा (विभिन्न एओए की फेडरेशन) के अध्यक्ष वीके मित्तल व अन्य लोगों ने कानूनी लड़ाई लड़ने की ठान ली। इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर अधिकारी उनकी शिकायतों पर संज्ञान लेते तो शायद उन्हें उच्चतम न्यायालय न जाना पड़ता। साथ ही समस्याओं का समाधान हो चुका होता।


कारवा के लोगों ने वर्ष 2015 में हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका डाली। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार, जिलाधिकारी गाजियाबाद, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए), नगर निगम, एसएसपी गाजियाबाद को पक्षकार बनाया। हाई कोर्ट ने सभी विभागों व अधिकारियों को कौशांबी की समस्याओं के निस्तारण का आदेश दिया। कारवा के अध्यक्ष का कहना है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी कोई खास कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद वर्ष 2015, 2016, 2018 और 2019 में एनजीटी में याचिका दायर की।


पांच लाख का लग चुका है जुर्माना

एनजीटी ने केंद्रीय व उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली सरकार व उत्तर प्रदेश सरकार के उपरोक्त महकमों के सात बार आदेश कर समस्याओं का निदान करने और जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के लिए कार्रवाई करने को कहा। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं की गई तो एनजीटी की ओर से इन महकमों के ऊपर पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।


आरोप है कि इन सबके बावजूद कागजी कार्रवाई के अलावा जमीनी स्तर पर कोई संतोषजनक काम नहीं किया गया। इससे परेशान कारवा के लोगों ने अक्टूबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट में एनजीटी के आदेशों की अनदेखी करने पर याचिका दायर की। कौशांबी निवासी सुप्रीम कोर्ट के वकील गौरव गोयल ने इस मामले को न्यायाधीशों के समक्ष प्रमुखता से रखा।

किसानों के धरने का भी दुष्प्रभाव

तीनों कृषि कानूनों के विरोध में यूपी गेट पर चल रहे धरने का दुष्प्रभाव कौशांबीवासियों पर भी पड़ रहा है। यूपी गेट पर रास्ता बंद होने के कारण वाहन चालक कौशांबी होकर दिल्ली जा रहे हैं। ऐसे में यहां वाहनों का दबाव बढ़ने से जाम लग रहा है। वायु और ध्वनि प्रदूषण हो रहा है।


यूपी गेट पर 28 नवंबर से धरना चल रहा है। यहां से वाहन चालक दिल्ली नहीं जा पा रहे हैं। उन्हें खोड़ा, ईडीएम माल, महाराजपुर, चंद्र नगर, ज्ञानी बार्डर, डीएलएफ, भोपुरा आदि सीमाओं से गुजारा जा रहा है। वसुंधरा, वैशाली और लिंक रोड से होकर दिल्ली जाने वाले वाहन चालक कौशांबी स्थित ईडीएम व महाराजपुर सीमा का प्रयोग कर रहे हैं। इससे इन सीमाओं और इन्हें जोड़ने वाली सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ने से जाम लग रहा है। ईडीएम माल सीमा पर घंटों वाहन चालक जाम में फंसे रहते हैं। महाराजपुर सीमा पर दिनभर वाहन रेंगते रहते हैं। मंगलवार को भी यही स्थिति रही। इससे कौशांबी के लोगों को काफी दिक्कत हुई।

वीके मित्तल, अध्यक्ष कारवा का कहना है कि ध्वनि, वायु व जल प्रदूषण से हर कोई जूझ रहा है। यदि अभी हम पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर सचेत नहीं हुए तो हमारे बच्चों का जीवन संभव नहीं होगा। विभागों की लापरवाही से परेशान होकर हाई कोर्ट, एनजीटी और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।