दिल्ली में कोरोना का खौफ! सर्वे के दौरान थर्मल स्क्रीनिंग व ऑक्सीजन लेवल मापने से बच रहे टीचर

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कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए दिल्ली सरकार के आदेश पर ऐसे इलाके जहां कोरोना संक्रमण के मामले अधिक पाए गए है, वहां अध्यापकों, आशा वर्कर व बूथ लेवल ऑफिसर की एक संगठित टीम को घर-घर जाकर सर्वे की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सर्वे का पहला फेज खत्म हो चुका है और फिलहाल दूसरा फेज जारी है। पर इस सर्वे में कई तरह की लापरवाही दर्ज की जा रही है। असल में अध्यापक सर्वे के लिए क्षेत्र में भले ही घूम रहे है, लेकिन ये कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़ दे तो किसी भी थर्मल स्क्रीनिंग व शरीर के ऑक्सीजन स्तर को नहीं माप रहे है।

शनिवार को पालम के एक निवासी के घर दो अध्यापकों की टीम सर्वे करने पहुंची। अध्यापकों ने व्यक्ति से परिवार के सदस्यों की संख्या और किसी की उम्र 60 वर्ष से अधिक तो नहीं पूछ सर्वे फॉर्म भर लिया। व्यक्ति ने जब जाते हुए अध्यापकों से थर्मल स्क्रीनिंग और शरीर में ऑक्सीजन स्तर को मापने की बात कहीं तो अध्यापकों ने दो टूक जवाब दिया कि हम तो जांच कर देंगे, लेकिन आप ही कहेंगे कि थर्मल स्कैंनर मशीन से हम कोरोना वायरस की चपेट में आ गए। ये जवाब उन अध्यापकों ने केवल एक अकेले व्यक्ति को नहीं दिया बल्कि गली के दस घरों में दिया। ऐसे में सर्वे की सत्यता पर कैसे यकीन किया जाए।


बवाना में सर्वे के दौरान कुछ अध्यापकों के कोरोना संक्रमण के चपेट में आने के बाद से सभी अध्यापकों में डर का माहौल है। हालांकि इन अध्यापकों ने सर्वे की ड्यूटी से बचने की पूरी-पूरी कोशिश की, लेकिन प्रशासन के सख्त मिजाज के कारण उनके सभी प्रयास विफल साबित हुए। आलम ये है कि खानापूर्ति के लिए सर्वे कर बेबुनियाद रिपोर्ट तैयार की जा रही है। अपनी रिपोर्ट की सत्यता को स्थापित करने के लिए अध्यापक कुछ एकाध लोगों की थर्मल स्क्रीनिंग कर लेते है और उसी क्षण की तस्वीर खिंच अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे है। बड़ा सवाल ये है कि बिना थर्मल स्क्रीनिंग व ऑक्सीजन लेवल मापे आखिर संक्रमित की पहचान कैसे होगी। इसके अलावा बिना ये जाने कि किसको बुखार, खांसी, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ है।


दूसरी तरफ बूथ लेवल ऑफिसरों की बात करें तो उन पर फिलहाल दोहरी जिम्मेदारियों का भार है। पहला 15 दिसंबर से पूर्व मतदाता सूची संशोधन कार्य को सफलतापूर्वक करना और दूसरा सर्वे के लिए क्षेत्र में सक्रिया नजर आना। दोनों ही जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से करना संभव नहीं है, ऐसे में अध्यापकों के साथ बूथ लेवल ऑफिसर भी कार्यालय में बैठे-बैठे रिपोर्ट को तैयार करने में रुचि दिखा रहे है। सर्वे को सफल बनाने व टीम की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए प्रशासन द्वारा अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च किया गया है। पर अध्यापकों के इस लापरवाह वाले मिजाज को देखते हुए बजट भी बर्बाद नजर आ रहा है और सर्वे का मूल उद्देश्य भी पूरा होता हुआ नहीं दिख रहा है।


अतिरिक्त जिला उपायुक्त राकेश दहिया ने इस संबंध में कहा कि अब तक इस तरह की कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई थी, हालांकि सर्वे बहुत बेहतर ढंग से जिले में हो रहा है। अध्यापकों की यदि कोई टीम इस तरह की लापरवाही बरत रहे है तो उन्हें जागरूक किया जाएगा। जनता हमारी आंख, नाक व कान है, ऐसे में उनकी प्रत्येक शिकायत व सुझाव का सम्मान है।