ट्रायल में एक भी व्यक्ति पर नहीं दिखा गंभीर दुष्प्रभाव, एम्स के डॉक्टर ने दी टीके को लेकर कई अहम जानकारी

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कोरोना वायरस का टीकाकरण आगामी 16 जनवरी से शुरू होने वाला है। टीके से सुरक्षा और इसके प्रभाव को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के सहयोग से भारत बायोटेक द्वारा विकसित टीके के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इन मुद्दों पर दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में स्वदेशी टीके के ट्रायल के प्रमुख इन्वेस्टिगेटर व कम्युनिटी मेडिसिन के विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार राय का कहना है कि मेक इन इंडिया के तहत देश में बने स्वदेशी टीके से 98 फीसद से ज्यादा लोगों में न्यूट्रलाइजिंग एंटीबाडी बनी हैं।

हर व्यक्ति यह भी जानना चाहता है कि टीका प्रभावी कितना है? इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार राय का कहना है कि टीके का प्रभाव इस आधार पर निकाला जाता है कि दोनों डोज लगने के बाद कितने लोगों को कोरोना हुआ। माडर्ना कंपनी ने इस आधार पर टीका 95 फीसद प्रभावी होने का दावा किया कि ट्रायल में शामिल 95 लोगों को कोरोना हुआ। इसमें 90 लोगों को प्लेसिबो लगा था, जबकि सिर्फ पांच लोगों को टीका लगा था। इसका मतलब टीका ज्यादातर लोगों का कोरोना से बचाव करने में सक्षम है। आक्सफोर्ड यूके (यूनाइटेड किंगडम), ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका में हुए ट्रायल के आधार पर अपने टीके को फुल डोज के साथ 62.4 फीसद प्रभावी बताया। कोवैक्सीन भी प्रभावी होगी, क्योंकि दूसरे चरण के ट्रायल में यह पाया गया है कि टीका लगने के बाद 98 फीसद से ज्यादा लोगों में न्यूट्रलाइजिंग एंटीबाडी बनी, जो वायरस को न्यूट्रलाइज कर सकती है। इसलिए टीके में रोग प्रतिरोधकता उत्पन्न करने की बेहतर क्षमता है। ट्रायल में यह भी देखा गया कि इस टीके से शरीर में ऐसी प्रतिरोधकता उत्पन्न होती है, जिसमें वायरस को याद रखने की क्षमता होती है। वायरस के शरीर में प्रवेश करते ही टी-सेल इम्युनिटी सक्रिय होकर वायरस को खत्म कर देती है। इस टीके की डोज 0.5 एमएल (मिलीलीटर) होगी।


टीके को लेकर ऐसी बातें चल रही हैं कि इससे हार्मोनल बदलाव होता है, सच क्या है? के जवाब में प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार राय ने बताया कि यह बिल्कुल अफवाह है। पोलियो टीकाकरण अभियान के दौरान भी एक वर्ग विशेष में यह अफवाह फैलाई गई थी। सरकार ने जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को सच से अवगत कराया। कोरोना का टीका जान बचाने में अहम साबित होगा, इसलिए दोनों डोज लगवाना जरूरी है। लोगों को बेसब्री से इसका इंतजार था, इसलिए उम्मीद है कि यहां स्वास्थ्य कर्मी व अन्य लोग टीका लेने से इनर नहीं करेंगे।

इस वक्त लोगों के मन में सबसे बड़ी चिंता यह है कि टीका कितना सुरक्षित है? के सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि देश में अभी दो टीकों को इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी मिली है। एक भारत बायोटेक द्वारा विकसित कोवैक्सीन और दूसरा आक्सफोर्ड द्वारा विकसित टीका है, जिसे देश में सीरम इंस्टीट्यूट कोविशील्ड के नाम से बना रहा है। नियामक एजेंसी जब भी किसी टीके को इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी देती है, तब सबसे पहले टीके से सुरक्षा को ही ध्यान में रखा जाता है। नियामक एजेंसी ने काफी दिनों तक यह परखने के बाद ही इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी दी है, इसलिए लोगों को टीके पर विश्वास करना चाहिए। कोवैक्सीन का जहां तक सवाल है तो यह टीका मृत कोरोना वायरस से तैयार किया गया है। फेज एक व फेज दो के ट्रायल का परिणाम मौजूद है। उसे कोई भी देख सकता है। सिर्फ 10 फीसद लोगों में इंजेक्शन देने की जगह पर दर्द, हल्का बुखार व शरीर में दर्द हुआ, जो खुद ठीक भी हुए। 90 फीसद लोगों को कुछ भी नहीं हुआ। एक भी व्यक्ति पर कोई गंभीर दुष्प्रभाव नहीं पड़ा, जबकि विदेशों में इस्तेमाल हो रहे एम-आरएनए तकनीक से विकसित टीकों के कुछ लोगों पर गंभीर दुष्प्रभाव की बात सामने आई है। देश में स्वीकृत टीकों से एक भी गंभीर दुष्प्रभाव के मामले रिपोर्ट नहीं हुए हैं, इसलिए टीका बहुत सुरक्षित है। लोग डरे नहीं।


100 फीसद दुष्प्रभाव रहित नहीं हो सकता है कोई भी टीका

यह बात लोगों को समझने की जरूरत है कि कोई भी टीका सौ फीसद साइड इफेक्ट (दुष्प्रभाव) रहित नहीं हो सकता। यदि 100 फीसद साइड इफेक्ट रहित है, तो वह टीका नहीं है। पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों को डीपीटी सहित कई ऐसे टीके लगते हैं, जिनसे बुखार होता है, इसलिए पैरासिटामोल दवा दी जाती है। यदि किसी टीके से गंभीर दुष्प्रभाव का खतरा रहता है तो उसे कुछ जरूरी सावधानियों के साथ इस्तेमाल किया जाता है। एम-आरएनए तकनीक से विकसित कोरोना के टीके एलर्जी से पीड़ित लोगों को नहीं लेने की सलाह दी गई है। कोवैक्सीन व कोविशील्ड से गंभीर दुष्प्रभाव के मामले नहीं देखे गए हैं, इसलिए यहां इस तरह की चेतावनी जारी नहीं की गई है। टीकाकरण के दौरान भी दुष्प्रभाव की निगरानी की जाएगी।


प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार राय का कहना है कि बहुत कम लोगों में हल्का बुखार व दर्द की समस्या देखी गई है, इसलिए सबको दवा देने की जरूरत नहीं है। डॉक्टर को यदि लगता है कि किसी को दवा की जरूरत है तो वे उचित सलाह देंगे।

भ्रांतियों को करें दूर, टीका लगवाएं जरूर

हार्मोनल बदलाव जैसी बातें हैं अफवाह
1. टीपीटी सहित कई ऐसे टीके लगते हैं, जिससे बुखार होता है, इसलिए पैरासिटामोल दवा दी जाती है।
2 . 10 फीसद लोगों में इंजेक्शन देने की जगह पर दर्द, हल्का बुखार व शरीर में दर्द हुआ, जो खुद ठीक भी हुए, दो बार हुए टीका परीक्षण में।
3 . 90 फीसद लोगों को कुछ भी नहीं हुआ।
4. 98 फीसद से ज्यादा लोगों में न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी बनी, परीक्षण में टीका लगने के बाद
5. यदि टीके से गंभीर दुष्प्रभाव का खतरा रहता है तो उसके लिए चेतावनी जारी की जाती है, स्‍वदेशी टीके के साथ ऐसा कुछ नहीं है।