जानिए- ममता दीदी के होदल कुतकुत और किम्भूत किमाकार का मतलब

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Bengal Chunav बंगालियों को अपनी संस्कृति और साहित्य पर हमेशा से ही गर्व रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, शरत चंद, काजी नजरूल इस्लाम से लेकर नए जमाने के साहित्यकार खास से लेकर आम लोगों की बातचीत में रोजमर्रा में शामिल हैं। यहां कॉफी हाउस कल्चर से लेकर चाय के दुकान पर जमने वाला आड्डा (बैठक) बौद्धिक चर्चा का हिस्सा होता है और उसमें भाषा ज्ञान अहम भूमिका निभाता है।

बंगाली इससे ही खुद को अन्य से अलग करता आया है और इस बार तो यह इतना अलग हो गया है कि चुनाव का मुख्य एजेंडा बन गया है.. बांग्ला गौरव या बंगाली अस्मिता। बंगाली अस्मिता का भाव स्थानीय दलों पर किस कदर हावी हो गया है यह इन दो शब्दों से समझा जा सकता है, ‘होदोल कुतकुत’ और ‘किम्भूत किमाकार’।


भाजपा की विशाल जनसभा के बाद डनलप फैक्टरी ग्राउंड पहुंची ममता बनर्जी ने वहां पर इन दो शब्दों का प्रयोग किया था। उसके बाद उन्होंने खुद ही मंच से कहा कि इन शब्दों का हिंदी या अंग्रेजी में क्या अर्थ होता है, मैं नहीं जानती। आपको पता हो तो आप लोग इसका अनुवाद कर लेना। राजनीतिक विश्लेषक इसे ममता बनर्जी का दंभ बताते हैं। उनका कहना है स्थानीय राजनीतिक दलों ने इस आभासी आभा मंडल को बंगाली अस्मिता से जोड़ लिया है। 21 साल से बंगाल की राजनीति को बारीकी से देख रहे राजनीतिक विश्लेषक विश्वास चक्रवर्ती का कहते हैं यह सामान्य शब्द नहीं है। चुनावी मंच से बोले जा रहे हर शब्द या नारे को खास तौर पर डिजाइन किया गया है और लगातार किया जा रहा है।

दीदी बोले तो ललकार

यही शब्द जब तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी भाषणों में कहती हैं तो उनके बोलने के अंदाज से यह आशय लगाया जा रहा है कि वो भाजपा को ललकार रही हैं कि आ जाओ चुनाव मैदान में, देख लेंगे।

‘खेला होबे रे’.. हर पार्टी के अपने मायने

यदि चुनाव में सामने आ रहे शब्दों, गीतों और धुनों की गहराई में जाया जाए तो अहसास होता है कि जितना मंथन चुनावी रणनीति बनाने में हो रहा है उतना ही नारों को गढ़ने में भी। इसमें हर पार्टी के कुछ ऐसे लोग लगे हैं जो वाकपटु हैं या आशु कवि हैं। बंगाल चुनाव को करीब से देख रहे पत्रकार व विश्लेषक कृष्णोंदु बंदोपाध्याय इसकी व्याख्या करते हैं कि बंगालियों का खेल (फुटबॉल) प्रेम बहुत ख्यात है। मूल शब्द ‘खेला होबे’ उससे ही निकला है लेकिन इसे हर पार्टी अपने अपने अंदाज में बोल रही है और किरदार और बोलने के तरीके से इसका मतलब निकाला जा रहा है।


मंडल बोले तो चुनावी हिंसा

वाकपटुता के लिए ख्यात बीरभूम के दबंग तृणमूल नेता अनुव्रत मंडल जब कहते हैं कि ‘खेला होबे’..तो इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि इस चुनाव में हिंसा होगी।

वाम मोर्चा बोले, हम भी मैदान में हैं.

यही ‘खेला होबे’ शब्द जब वाम मोर्चा के नेताओं द्वारा दोहराया जा रहा है तो इसका आशय यह निकाला जा रहा है कि इस पूरे परिदृश्य में वाम मोर्चा अभी भी है। शब्द एक ही है बस बोलने का अंदाज अलग है।


निम्न मध्यमवर्गीय लड़कियों को लुभाने के लिए है दिया गया नारा ‘बांग्ला निजेर मेये के चाए’..

तृणमूल ने मध्यमवर्गीय महिला वर्ग को लुभाने के लिए खास तौर पर यह नारा दिया था कि ‘बांग्ला निजेर मेये के चाए’। यानी बंगाली अपनी बेटी को चाहता है। इसके जरिये यह संदेश भी देना चाहती थीं कि अन्य राजनीतिक दल में पुरूषों का वर्चस्व है। हालांकि भाजपा ने इसका जमकर जवाब दिया। कहा कि बांग्ला नीजेर मेये के चाए, पीशी के ना। यानी बंगाल अपनी बेटी को चाहता है बुआ को नहीं।


इतिहास के पन्नों से ‘बोरगी’

धन धान्य से भरे बंगाल पर 17वीं-18वीं शताब्दी में मराठाओं ने आक्रमण किया था। तब उन्हें ‘बोरगी’ कहा जाता था। बच्चों को सुलाने के लिए गाई जाने वाली लोड़ी (सोना घुमालो, पाड़ा जुड़ालो, बोरगी एलो देशे यानी बेटा सो जा, बस्ती शांत है, बोरगी आ गए हैं) में इस शब्द का इस्तेमाल किया गया। इस चुनाव में इस शब्द का भी इस्तेमाल हो रहा है।

होदल कुतकुत यानी दूसरे ग्रह के प्राणी


बांग्ला भाषा में होदल कुतकुत और किमभूत किमाकार जैसे शब्द का प्रयोग एलियन (दूसरे ग्रह से आए हुए अजीबो-गरीब लोग) के लिए किया जाता है। बंगाल बनाम बाहरी की इस लड़ाई में ममता बनर्जी ने इशारा करते हुए इस शब्द का इस्तेमाल किया।

अब छठा ‘म’ भी जुड़ा

बंगाल चुनाव में अभी तक पांच म ख्यात थे। इनमें मिछिल (रैली), मां, माटी (मिट्टी), मानुष (लोग) और मारामारी (चुनावी हिंसा) के बाद अब मेये (लड़की) भी जुड़ गया है। इस पोस्टर वार के बाद पीशी शब्द इतना चल पड़ा कि अब ममता बनर्जी सिर्फ अभिषेक बनर्जी की पीशी (बुआ) नहीं रह गई बल्कि सबकी पीशी हो गई हैं।