कोरोना में कमजोर नहीं पड़ने और भविष्य के लिए बराबर से खड़े रहने के जज्बे को सलाम करने का दिन

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International Women’s Day 2021 याद कीजिए एक साल पहले का वह समय, जब कोरोना के देश में कदम रखने की भनक मिली तो जयपुर घूमने आये इटली के पर्यटकों के एक समूह के संक्रमित होने की खबर मिली। जब कोरोना के स्वरूप का कुछ पता नहीं चल पा रहा था, इसके इलाज का रास्ता नहीं दिख रहा था तब संक्रमण पीड़ितों को ठीक करने की जिम्मेदारी एक महिला डॉक्टर सुशीला कटारिया को सौंपी गई। डॉ.सुशीला कटारिया मेदांता हॉस्पिटल गुरुग्राम में डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनल मेडिसिन की डायरेक्टर हैं।

वह कहती हैं, ‘करीब एक साल पहले 4 मार्च की वह सुबह मैं कभी नहीं भूल पाती, जब मुझे कोविड-19 से संक्रमित इटली के 14 पर्यटकों के इलाज की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह सब कुछ बहुत जल्दी में हुआ। उसी रोज दोपहर तक हॉस्पिटल के अलग हिस्से में सारी सुविधाएं जुटा कर उसे कोरोना केयर यूनिट में तब्दील किया गया। इससे पहले मैं डेंगू और स्वाइन फ्लू के मरीज़ों का उपचार कर चुकी थी, पर वह टास्क मेरे लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था। थोड़ी घबराहट जरूर थी, लेकिन यह सोचकर अच्छा लगा कि मेरे वरिष्ठ मुझ पर भरोसा करके मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंप रहे हैं। शाम को छह बजे मैंने अपने पति को फोन करके बताया कि अभी मैं आइसोलेशन यूनिट में जाने के लिए तैयार हो रही हूं और शायद कुछ दिनों तक यहीं रुकना पड़ेगा।

शुरुआती दौर में एक सप्ताह तक मुझे हॉस्पिटल में ही रुकना था। पीपीई किट और मास्क पहनने के बाद पसीना बहुत आता था, चूंकि किट पहनने के बाद 6 से 8 घंटे तक हम टॉयलेट नहीं जा सकते थे, इसलिए ड्यूटी के दौरान सीमित मात्रा में पानी पीते थे, हमारी टीम में शामिल सभी महिलाओं को पीरियड्स की डेट टालने के लिए पिल्स लेनी होती थी। एक सप्ताह के बाद घर वापस आ गई। मास्क पहनकर 5-6 मीटर की दूरी से घरवालों से बात करती थी।’ इसके बाद जैसे-जैसे कोरोना बढ़ता गया डॉ. सुशीला की व्यस्तता और जिम्मेदारियां भी बढ़ती गईं और उन्होंने न केवल उन्हें निभाया बल्कि आज भी हजारों मरीजों को ठीक करने की खुशी उनके चेहरे पर है। वह कहती हैं, ‘मेरे मरीज जब स्वस्थ होकर घर लौटते हैं तो मुझे संदेश भेजकर धन्यवाद देते हैं। घर लौटते वक्त उनके चेहरे पर जो मुस्कान होती है, वही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।’


जंग में भागीदार

मोहिनी प्रकाश राममनोहर लोहिया अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर हैं। जब पहले-पहल उनकी कोरोना सेंटर में ड्यूटी लगी तो घरवाले परेशान हो गए लेकिन उन्होंने सभी को समझाया और अपने कर्तव्य को सहज भाव से निभाया। वह कहती हैं, ‘मेरे समझाने के बाद सब मानसिक रूप से तैयार हो गए। मरीजों के बीच जाने के बाद मेरा भी सारा डर दूर भाग गया। उन्हें देखकर मेरा मनोबल बढ़ा। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जब ये लोग बीमारी से लडऩे के लिए तैयार हैं तो हमें भी इनका साथ देना चाहिए। नर्सों को भी संक्रमित होने का खतरा रहता है, इसलिए 14 दिनों की ड्यूटी पूरी करने के बाद हमें 14 दिनों के लिए सेल्फ क्वारंटाइन के लिए छुट्टी दी जाती थी।’

वर्दी में फर्ज की पुकार

दिल्ली पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर उर्मिला गुलिया भी कोरोना के दौरान अपनी छुट्टी से लौट आईं और अपने फर्ज पर डट गईं। वह कहती हैं कि ड्यूटी के दौरान वंचित वर्ग के लोगों की बदहाली देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। इसी वजह से मैंने अपनी बचत के पैसों से लोगों के बीच मास्क, सैनिटाइजर और भोजन का वितरण किया। मुझे ऐसा लगता है कि संकट के दौर में जहां तक संभव हो, निजी स्तर पर भी हमें लोगों की मदद करनी चाहिए। दिल्ली में सब-इंस्पेक्टर साधना यादव ने भी कई हॉटस्पॉट इलाकों और क्वारंटाइन सेंटर के बाहर दिनभर धूप में खड़े रह कर ड्यूटी की। इस दौरान वह एक बॉटल में नींबू-पानी रखतीं और बीच में दो घूंट पी लेती। वह कहती हैं,’मैं अकेली नहीं हूं बल्कि पूरे देश में मेरी जैसी हजारों महिलाएं कोरोना के खिलाफ जंग में बराबर की भागीदार रही हैं।’


मरीज को दिया नया जीवन

हॉस्पिटल से घर लौटने के 14 दिनों के बाद जब सुमिति सिंह दोबारा चेकअप के लिए गईं तो डॉक्टर्स ने उनसे प्लाज्मा डोनेट करने और किसी कोरोना मरीज की जान बचाने की गुजारिश की। कहती हैं सुमिति, ‘डॉक्टर्स का यह सुझाव मुझे बहुत अच्छा लगा क्योंकि मैं अन्य कोरोना मरीजों की मदद करना चाहती थी। मेरे मन में इसे लेकर कई सवाल थे, मसलन, इसकी प्रक्रिया कष्टप्रद तो नहीं होगी, इसकी वजह से मुझे कोई इन्फेक्शन तो नहीं होगा, शरीर में एंटी बॉडीज की मात्रा कम तो नहीं हो जाएगी?

डॉक्टर्स ने मुझे बताया कि इसकी प्रक्रिया ब्लड डोनेशन जैसी ही होती है, कोरोना से स्वस्थ हो चुके व्यक्ति के शरीर से एंटी बॉडी़ का बहुत छोटा हिस्सा लिया जाता है, जिससे डोनर को कोई नुकसान नहीं होता क्योंकि कुछ दिनों के बाद उसके शरीर में नए सिरे से एंटी-बॉडीज विकसित होने लगते हैं। डॉक्टर्स के जवाब से संतुष्ट होने के बाद मैं डोनेशन के लिए तैयार हो गई। इससे पहले ब्लड टेस्ट के जरिए हेपेटाइटिस, एचआइवी, हीमोग्लोबिन और ब्लड में मौज़ूद एंटीबॉडीज मात्रा की जांच की गई। फिर मैंने 500 मिली. प्लाज्मा डोनेट किया। यह कार्य लगभग 40 मिनट में पूरा हो गया। फिर उसे एक कोरोना मरीज को दिया गया, जिसकी उसकी सेहत में सुधार दिखा। मेरे लिए सबसे बड़ी संतुष्टि की बात यही है मेरी छोटी कोशिश किसी मरीज को नया जीवन दे पाई।’


समाज के प्रति निभाई जिम्मेदारी

कोरोना के खिलाफ जंग में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी उन हजारों ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी भी कम काबिले तारीफ नहीं है, जो लाखों की संख्या में मास्क एवं पीपीई बनाने में जुटी हैं। अलग-अलग यूनिटों व फैक्ट्रियों में काम कर रही हैं। इसके अलावा, गरीबों का पेट भरने के लिए सामुदायिक रसोई चला रही हैं, जरूरत का सामान वितरित कर रही हैं, लोगों को स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति जागरूक कर रही हैं। एक ऐसी ही यूनिट में काम करने वाले हेमलता बताती हैं, ‘कोरोना के दौरान अपने बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाती थी लेकिन जब हमारे बनाए मास्क जरूरतमंदों तक पहुंचते, तो संतोष मिलता। जो मेहनताना मिलता उससे बच्चों के लिए जरूरत का सामान लाती।’