कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार, पलायन के 32 साल: फिर सुप्रीम कोर्ट में न्याय की लगाएंगे गुहार

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कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और लाखों की तादाद में पलायन के 32 साल हो चुके हैं। फिर भी अपनों को खोकर बेघर होने वाले इन कश्मीरी पंडितों को अब तक न्याय नहीं मिला है, जिससे उनके जख्म अब भी हरे हैं। अपने ही देश में विस्थापित पंडितों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक संगठन ने अपने समुदाय और कश्मीर में अपनी जड़ों को फिर आबाद करने के लिए एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर ली है। कश्मीरी पंडितों का यह संगठन अगले हफ्ते तीसरी बार अदालत से अपने लिए न्याय की गुहार लगाएगा।

रूट्स ऑफ कश्मीर संगठन के अमित रैना ने मंगलवार को बताया कि वह अब सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पेटिशन दायर करने जा रहे हैं, चूंकि अब कोर्ट को अहसास होगा कि वर्ष 2017 में उसने गलत फैसला दिया था। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के नरसंहार से भी पहले के सिखों के नरसंहार (1984) के मामलों को फिर से खोल दिया है और उन पर सुनवाई जारी है। उन्होंने कहा कि संगठन का कहना है कि सर्वोच्च अदालत सिख विरोधी दंगों से जुड़े 241 मामलों को फिर से खोलने के आदेश दिए थे और इसके लिए एक एसआइटी का गठन 21 अगस्त, 2017 को किया था। इस फैसले से भारी भेदभाव की झलक मिलती है।

उल्लेखनीय है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर के नेतृत्ववाली खंडपीठ ने 24 जुलाई, 2017 को कहा था कि वह कश्मीरी पंडितों की समीक्षा याचिका पर विचार नहीं करेंगे। कश्मीरी घाटी में पंडितों के नरसंहार से मुंह फेरते हुए तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह मामला 1989-90 का है और तब से 27 साल बीत चुके हैं। इस सुनवाई का कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि सुबूत सारे खत्म हो चुके होंगे।


रैना ने यह भी कहा कि सर्वोच्च अदालत ने नेता जी की मौत की जांच के लिए मुखर्जी आयोग का गठन किया था। फिर कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की जांच क्यों नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि 19 जनवरी की घटनाओं के साजिशकर्ताओं को जेल में डालने के लिए जरूरी है कि कश्मीरी पंडितों की सामुदायिक भावनाओं का ध्यान रखा जाए। संगठन के वरिष्ठ सदस्य राहुल माहनूरी ने कहा कि 1989 में रुबैया सईद के अपहरण के मामले में जेकेएलएफ के सरगना यासिन मलिक के खिलाफ और 1990 में चार आइएएस अफसरों की हत्या के मामलों को फिर से खोलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटने से अब यहां का माहौल बदल चुका है और यहां तफ्तीश की जा सकती है। 15 वर्षीय नील पंडिता ने उम्मीद जताई कि सर्वोच्च अदालत उनके समुदाय को न्याय देगी।