आज के आनंद की जय हो, हर पल करें खुशियों की पहल

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सभी चाहते हैं कि सब कुछ शुरू से शुरू हो। बीता साल तमाम आशंकाओं और जीवन की धीमी रफ्तार के साथ गुजरा तो अब इस नए वर्ष की शुरुआत हम इच्छाओं के नए चबूतरे पर खड़े होकर करना चाहते हैं। हम भीतर ही भीतर यह भी चाहते हैं कि अतीत के सब शिलालेख मिटा दिए जाएं और हम अपने हाथों से नए भविष्य की ऐसी नींव रखें, जिस पर खुशियों का वह साम्राज्य हो, जिसमें सच का साथ देने वाले विजयी हों, झूठ और फरेब में उलङो हुए लोगों को पश्चाताप करना पड़े। हमें अपने लिए ऐसी परिस्थिति चाहिए, जिसमें भले ही कठोर तप हो, संघर्ष हो, लेकिन आनंद की वह माधुरी भी हो, जिसके साथ हमारा जीवन बहता चला जाए।

न डिगें संकल्प की राह से

नए वर्ष की शुरुआत में हम कई लोगों को संकल्प लेते हुए देखते हैं, जो अपने आत्मविश्वास को जगाते हैं, लेकिन थोड़ी दूर तक चलने के बाद ही वे भूल जाते हैं कि तय क्या हुआ था। वे फिर उसी पटरी पर चलने लग जाते हैं, जिस पर उन्होंने ठोकरें खाई थीं, संताप किया था और जिसके चलते निराशा ने उन्हें धर दबोचा था। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने एक अच्छा सपना देखा था, लेकिन उसे पूरा करने के अचूक निशाने उनके पास नहीं थे। जिसके चलते होता यह है कि वे आनंद के स्रोत के सामने खड़े रहते हैं और रीते रह जाते हैं।


नई यात्रा का श्रीगणेश

बीता साल चाहे जैसा भी गुजरा, नए साल के स्वागत की तैयारियों का जोश देखने लायक होता है। यह जोश केवल एक धर्म को मानने वालों में नहीं, बल्कि दुनियाभर के तमाम लोगों में दिखाई देता है। ताज्जुब यह है कि हद से हद चौबीस घंटे तक चलने वाली पार्टी, आतिशबाजी, मौज-मस्ती और धूम के बाद सारा जोश इस तरह ठंडा पड़ जाता है, जैसे नव वर्ष आकर चला गया हो। नए वर्ष का नया सूरज जो संदेश लेकर आता है, हम उसे समझ नहीं पाते। दरअसल, उत्साह के जाग उठने के मुहूर्त में जो शक्तिपात होता है, वह हमारे हाथ से फिसलता चला जाता है और शाम ढलते-ढलते वही सूनापन, वही ढिलाई, वही बेरुखी, वही खालीपन पसर जाता है।


नव वर्ष का जोरदार स्वागत होना चाहिए। ऐसा स्वागत, जैसा घर आई नई-नवेली दुल्हन का होता है, जैसा खेत में उग आने वाले गन्ने और गेहूं की बालियों का होता है या आम की शाखाओं पर झूलने वाली नई-नई मंजरियों का होता है। यह स्वागत एक आरंभ है। यह स्वागत पूरे वर्ष को उत्सव के रंग में ढालने के संकल्प का स्वस्ति वाचन है। स्वागत की इस वेला में कोई एक नया संकल्प हो और उसके साथ नई यात्र का श्रीगणोश हो तो आनंद का भाव उपजता ही है। इसके साथ ही पुराने रिश्तों की चाशनी में पगी हुई मीठी-मीठी यादों के सिलसिले हों, तो उम्मीद भरे दिनों के सपने सजने लगते हैं।


विजय का आह्वान

इस बार यह वर्ष नवनिर्माण की अद्भुत संभावनाएं लेकर आया है। आप और हम सहज ही अनुभव कर सकते हैं कि पिछले साल हमने कड़ी परीक्षा दी और जान-माल की भारी हानि उठाने के बावजूद हम उत्तीर्ण घोषित किए गए। जीवन थोड़ा अनुशासित, संयमित और नियमित हुआ है। तमाम सारे भ्रम दूर हुए हैं, आदमी अंतत: अपने देशज मूल्यों की शरण में लौट आया है। 21वीं शताब्दी के दो दशक पूरे होने के बाद इस नए वर्ष में महसूस करके देखिए, हमारे अंतरंग में मनुष्य की विजय का आह्वान चल रहा है। समय के कैनवास पर नए रंग भरे जा रहे हैं, जीवन की प्रणाली बदल रही है। सृजन और प्रलय साथ-साथ झूलते हुए दिखाई पड़ रहे हैं, जीवन के रहस्यों पर पड़े हुए कई पर्दे हटा दिए गए हैं। व्यक्ति दुख के पहाड़ों को चीरता हुआ सुख के उस सागर के पास जा खड़ा होने के लिए उत्सुक है, जहां की निराली शांति उसने पहले कभी नहीं देखी थी।


हर पल खुशियों की पहल

नव वर्ष के आगमन की खुशी को एक या दो दिन में समेट लेने का क्या औचित्य? माना खुशी का यही स्तर वर्ष के आखिरी महीने के आखिरी दिन तक ज्यों का त्यों तो नहीं रह सकता, क्योंकि समय करवट लेता रहता है, उतार-चढ़ाव बने रहते हैं और हमेशा हमारे मन की बात नहीं होती, लेकिन उमंग और उत्साह की गर्मी बनाए रखने की पहल तो हर पल की जा सकती है। हमारे पुरखों ने यही पहल की थी, इसीलिए उन्होंने त्योहारों की ऐसी विस्तृत श्रंखला बनाई कि परिवार में रस घुलता रहे और आशाओं के दीप जलते रहें। हमारे मन का विश्वास कमजोर न हो और खुशियों की बारात घर-आंगन में आती रहे, ताकि हर दिन नया और चमकदार बने।


आइए, हम सब आपस में मिल जाएं। एक-दूसरे को अपने प्रकाश के आलिंगन में लेकर बीती ताहि बिसार दें। मनुष्यता को नए अंदाज में परिभाषित करें और जीवन को नई गति दें। हमारी गलतियों से जो आकाश सिकुड़ गया है, उसे दसों दिशाओं मे खुल जाने की सौगात दें। उगते हुए सूरज की ओर अपने दोनों हाथ फैलाकर हर रोज कहें- ‘आज के आनंद की जय हो!’