आंदोलन और प्रदर्शन के नाम पर हिंसक भीड़ को काबू करने की कोशिश

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आज की तारीख में कई प्रकार के राष्ट्रविरोधी तत्व सक्रिय हैं। मौके की तलाश में रहते हैं। सरकार के विरोध में कोई भी सुगबुगाहट होती है तो तुरंत चिंगारी को भड़काने में जुट जाते हैं। दरअसल ये सब सोच रहे हैं कि जैसे हजारों साल से छोटे-छोटे लोग यह सोचकर गद्दारी करते थे कि ऐसा करके दिल्ली के तख्त पर काबिज हो जाएंगे, ऐसे ही ये लोग भी सत्ता हासिल कर लेंगे, इन्हें सिर्फ सत्ता की भूख है। ये भूल रहे हैं कि प्रजातंत्र में ऐसा नहीं होता। लेकिन यह भी सोचने की जरूरत है कि चाहे शाहीन बाग में नागरिक संशोधन कानून के विरोध में तीन माह तक चला प्रदर्शन हो या अब दो माह से कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली के बार्डर को घेरे बैठे आंदोलनरत किसान।

आखिर असंतोष की चिंगारी सुलगने ही क्यों दी जाती है? उनसे समय से क्यों नहीं निपटा जाता? इनके लंबा खिंचने का ही परिणाम है कि नौकरीपेशा लोगों को मिनटों का सफर तय में करने में घंटों लगते हैं। समय और ईंधन की बर्बादी हो रही है। हजारों करोड़ की अर्थव्यवस्था को हानि पहुंच रही है। प्रदर्शन से प्रभावित इलाकों के लोगों का जनजीवन बिलकुल अस्त-व्यस्त हो गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि हर बार ऐसे आंदोलनों को बढ़ने ही क्यों दिया जाता है? मुख्य मार्गों पर आंदोलन की इजाजत ही क्यों दी जाती है? आंदोलन और प्रदर्शन के नाम पर हिंसक भीड़ को काबू करने की पुरजोर कोशिश क्यों नहीं होती? इसी की पड़ताल करना आज का मुद्दा है :

26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर जो उपद्रव हमने देखा वो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए घातक है। भारत लोकतांत्रिक देश है। प्रदर्शन का अधिकार सबको है। लेकिन यहां सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का भी ध्यान रखना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि प्रदर्शनों के चलते आम लोगों को असुविधा नहीं होनी चाहिए। अब यहीं से प्रश्न उठता है कि प्रदर्शन करने देना चाहिए या नहीं करने देना चाहिए। प्रदर्शन करने से किसी को नहीं रोका जा सकता, लेकिन प्रदर्शन के नाम पर हिंसा को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। लोगों को उससे होने वाली तमाम तरह की परेशानी, समय की बर्बादी, आर्थिक नुकसान यह सब अनुचित है। ऐसा नहीं है दिल्ली में पहले प्रदर्शन नहीं हुए या विरोध में कोई आवाजें नहीं उठीं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन, निर्भया आंदोलन, महाराष्ट्र के किसानों का प्रदर्शन ये सब हुए लेकिन सारे प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से हुए, और सभी प्रभावी भी रहे।


राजनीतिकरण है बड़ी समस्या : सवाल यह उठता है कि आखिर कोई प्रदर्शन हिंसा के रास्ते पर कब चल पड़ता है। उनका मकसद विरोध से आगे उपद्रव के रूप में कब बदल जाता है। इस सवाल का जवाब तलाशना शुरू करें तो एक बात उभर कर सामने आती है कि जैसे ही किसी प्रदर्शन का राजनीतिकरण होता है, उस आंदोलन के भीतर असामाजिक तत्व, उपद्रवियों, राष्ट्र के विपरीत चलने वालों की संख्या बढ़ती जाती है तो यहां हिंसा की गुंजाइश बढ़ जाती है। राजनीतिकरण का मतलब यहां राजनेताओं द्वारा प्रदर्शनों को समर्थन देना बिल्कुल नहीं है। यदि कोई राजनेता किसी प्रदर्शन में जाए तो मुझे नहीं लगता कि इससे किसी को दिक्कत होगी। लेकिन किसी प्रदर्शन का जब असल मुद्दा भटक जाए तब समझा जाना चाहिए कि उसका राजनीतिकरण हो रहा है। गाजीपुर, कुंडली, टीकरी और सिंधु बॉर्डर पर जब प्रदर्शन शुरू हुए तो मुद्दे किसानों से जुड़े बताए गए। लेकिन बहुत जल्द प्रदर्शन में उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की मांग भी उठने लगी। आखिर ऐसा कैसे हुआ? जब प्रदर्शन कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ तो उसमें अन्य मसले कैसे आ गए। वो भी तब जब अदालत में उस मामले की सुनवाई चल रही है।

मुद्दों से भटकाव का खामियाजा : लाल किले में हिंसा की बात करें तो इसके लिए किसी एक पर दोषारोपण नहीं कर सकते। किसान नेताओं ने तर्क दिया कि उन्होंने तय रूट पर ही मार्च निकाला था। लेकिन सच्चाई यह भी है कि उस दिन बड़ी संख्या में बाहर से किसान आए थे और उन्होंने ही हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया। कौन थे ये लोग। अगर ये किसान थे तो इसकी जवाबदेही सीधे-सीधे आयोजकों की बनती है। आखिर गौतम नवलखा, उमर खालिद की रिहाई की मांग कैसे हुई। दीप सिद्धू को भड़काऊ भाषण देने से रोका क्यों नहीं गया। जाहिर है कि प्रदर्शन मूल लक्ष्य से भटक गया।


निगरानी तंत्र है अहम : निगरानी एक बड़ा सवाल है। इस तरह के बड़े प्रदर्शनों की निगरानी के लिए एक तंत्र विकसित होना चाहिए। ताकि प्रदर्शन हिंसक ना बने। हमने 2019-20 में सीएए, एनआरसी के प्रदर्शनों को भी हिंसक होते देखा है।